नई दिल्ली। चीनी को लेकर केंद्र सरकार की नीति अब सवालों के घेरे में है। वजह यह है कि कुछ महीने पहले तक सरकार देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध होने का अनुमान लगाकर निर्यात की अनुमति दे रही थी, जबकि अब घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए 10 लाख टन चीनी के आयात की जरूरत बताई जा रही है। सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) के दस्तावेजों में दर्ज फैसलों के आधार पर नीति में आए इस बदलाव को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या कहता है सरकारी रिकॉर्ड ?
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 2025-26 चीनी सीजन की शुरुआत में नवंबर 2025 में चीनी मिलों को कुल 15 लाख मीट्रिक टन (LMT) चीनी निर्यात का कोटा आवंटित किया गया था। निर्यात की समयसीमा 30 सितंबर 2026 तक रखी गई थी। इसका मतलब था कि उस समय सरकार के आकलन के मुताबिक घरेलू खपत पूरी करने के बाद भी देश में सीमित मात्रा में चीनी निर्यात के लिए उपलब्ध रहेगी।
इसके बाद फरवरी 2026 में अतिरिक्त 5 लाख टन चीनी के निर्यात की प्रक्रिया शुरू की गई। हालांकि, इस दौरान सभी मिलों को तत्काल कोटा आवंटित नहीं किया गया, बल्कि इच्छुक मिलों से अतिरिक्त निर्यात के लिए सहमति मांगी गई थी।
फिर छह महीने में कैसे बदली स्थिति?
चीनी की उपलब्धता का आकलन केवल उत्पादन से नहीं होता। इसमें घरेलू खपत, गन्ने की उपलब्धता, मिलों की पेराई, मौजूदा स्टॉक और एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने तथा चीनी के इस्तेमाल जैसे कई कारक शामिल होते हैं।
2025-26 सीजन के दौरान उत्पादन अनुमान और वास्तविक उत्पादन, गन्ने की उपलब्धता तथा एथेनॉल उत्पादन से जुड़ी परिस्थितियों ने चीनी के पूरे गणित को प्रभावित किया हो सकता है। ऐसे में सरकार के शुरुआती अनुमान और बाद की वास्तविक स्थिति में अंतर सामने आया है।
घरेलू मांग का दबाव भी अहम
भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उपभोक्ता देशों में शामिल है। घरों के अलावा मिठाई, पेय पदार्थ, बिस्कुट, आइसक्रीम और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में भी बड़ी मात्रा में चीनी की खपत होती है। त्योहारों और शादी के मौसम में मांग बढ़ने से दबाव और बढ़ सकता है।
अब 10 लाख टन आयात क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नवंबर और फरवरी में निर्यात की अनुमति दी जा रही थी, तब क्या आने वाले महीनों की घरेलू जरूरत का सही आकलन किया गया था? सरकार के सामने किसानों और चीनी मिलों के हित में निर्यात तथा उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त घरेलू स्टॉक बनाए रखने के बीच संतुलन की चुनौती रहती है।
अब 10 लाख टन आयात की जरूरत सामने आने के बाद सरकार को स्पष्ट करना होगा कि घरेलू उपलब्धता में कमी कितनी हुई, उत्पादन अनुमान कितना बदला और निर्यात फैसलों का मौजूदा स्थिति पर कितना असर पड़ा। फिलहाल यही बदलाव केंद्र की चीनी नीति को लेकर सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
