रांची: POCSO अधिनियम के तहत दर्ज चार अलग-अलग मामलों में अदालत के फैसले ने एक बार फिर पुलिस जांच और अभियोजन की तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार मामलों में से एक में आरोपी दोषी ठहराया गया, जबकि तीन मामलों में आरोपियों को अदालत से बरी कर दिया गया।
हालांकि अदालत का फैसला अपने स्तर पर अंतिम है, लेकिन लगातार मामलों में आरोपियों के बरी होने से पुलिस की केस डायरी, साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया और अभियोजन की पैरवी पर चर्चा स्वाभाविक है।
चार मामलों का क्या रहा नतीजा?
POCSO केस संख्या 98/2025 में अदालत ने सुनवाई पूरी करने के बाद आरोपी शनिचर महाली को दोषी ठहराया। इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा।
वहीं POCSO केस संख्या 9/2025 में नामजद आरोपी अनुराग होरो और गोल्डन को अदालत ने बरी कर दिया।
POCSO केस संख्या 111/2025 में आरोपी प्रभात को भी अदालत से राहत मिली और उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
जबकि POCSO केस संख्या 51/2026 में सुनवाई के बाद आरोपी मिराज अंसारी, आनंद कुमार समेत अन्य आरोपियों को भी अदालत ने बरी कर दिया।
एक केस में दोषसिद्धि, तीन में बरी… सवाल जांच पर
चार मामलों के नतीजों को एक साथ देखें तो तस्वीर यह है कि एक मामले में दोष साबित हुआ, जबकि तीन मामलों में अभियोजन आरोपों को अदालत के स्तर पर साबित नहीं कर सका।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की जांच को लेकर खड़ा होता है।
क्या FIR दर्ज करने के बाद पुलिस ने घटनास्थल से लेकर दस्तावेजी और वैज्ञानिक साक्ष्यों तक हर पहलू की गंभीरता से जांच की थी?
POCSO जैसे मामलों में जांच की जिम्मेदारी और बड़ी
POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में पुलिस की जांच की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों में सिर्फ प्राथमिकी दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं होता। जांच एजेंसी को उपलब्ध साक्ष्यों को इस तरह सुरक्षित और दस्तावेजीकृत करना होता है कि अदालत के सामने पूरा मामला मजबूती से रखा जा सके।
तीन मामलों में आरोपियों के बरी होने के बाद अब यह देखना जरूरी है कि इन मामलों में पुलिस की जांच के दौरान कहां कमी रह गई।
सवाल सिर्फ बरी होने का नहीं, जांच की गुणवत्ता का है
एक ही अवधि में POCSO के चार मामलों में अलग-अलग फैसले सामने आने के बाद अब पुलिस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है कि संवेदनशील मामलों की जांच में कहीं कोई कमी तो नहीं रह रही।
क्योंकि POCSO मामले में सिर्फ आरोपी को गिरफ्तार करना पुलिस की कार्रवाई का अंत नहीं है-अदालत में आरोप साबित होना ही जांच की असली परीक्षा है।
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