लिट्टीपाड़ा (पाकुड़): साल 2025 में झारखंड अपनी युवा अवस्था का जश्न मना रहा था। राज्य गठन के बाद विकास, बदलाव और नई संभावनाओं की बातें हो रही थीं। लेकिन इसी युवा झारखंड की एक तस्वीर ऐसी भी है, जो विकास के दावों से बिल्कुल अलग कहानी बयां कर रही है। सवाल यह है कि क्या यही है युवा झारखंड, जहां आज भी किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि खटिया का सहारा लेना पड़ता है?
पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड स्थित मासधारी गांव की तस्वीर इसी हकीकत को सामने ला रही है। गुरुवार को गांव में रहने वाले पीरका पहाड़िया की 25 वर्षीय गर्भवती पत्नी बागी पहाड़िन को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। परिजन उन्हें अस्पताल पहुंचाना चाहते थे, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस पहुंचने का रास्ता ही नहीं था। ऐसे में ग्रामीणों ने खटिया को ही एंबुलेंस बनाया और गर्भवती महिला को उस पर लिटाकर करीब चार किलोमीटर तक कंधों पर ढोते हुए मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई।
जब सड़क ही नहीं है तो गांव तक एंबुलेंस कैसे पहुंचेगी?
ग्राम प्रधान बैदा पहाड़िया के अनुसार, मासधारी गांव से मुख्य सड़क की दूरी करीब चार किलोमीटर है। सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन सबसे मुश्किल वक्त तब आता है, जब कोई अचानक बीमार पड़ जाता है या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू होती है। ऐसी आपात स्थिति में ग्रामीणों के पास खटिया पर मरीज को लादकर पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
जरा सोचिए, जिस वक्त किसी मरीज को तत्काल इलाज की जरूरत होती है, उस वक्त उसके परिजनों को अस्पताल पहुंचने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। गांव के लोग बीमारी के समय इस बात को लेकर भी चिंतित रहते हैं कि अगर अचानक अस्पताल जाने की जरूरत पड़ गई, तो उन्हें मुख्य सड़क तक कैसे पहुंचाया जाएगा।
झारखंड में पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी तस्वीरें…
मासधारी गांव की यह तस्वीर कोई पहली घटना नहीं है। झारखंड के अलग-अलग जिलों से पहले भी ऐसी कई तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, जहां सड़क के अभाव में गर्भवती महिलाओं और बीमार मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अपने कंधों का सहारा लेना पड़ा है। इनमें कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जो ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
घाघरा प्रखंड की कुहीपाट पंचायत के गुनिया गांव में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को एक गर्भवती महिला को दउरी में बैठाकर कंधों के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ा था। वहीं, चतरा जिले के कुंदा प्रखंड स्थित बुटकुइया गांव में 28 वर्षीय रीता देवी को प्रसव पीड़ा के दौरान एंबुलेंस नहीं मिल सकी। ऐसे में ग्रामीणों ने उन्हें खाट पर लिटाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसी तरह गुमला के एक गांव में 24 वर्षीय बृन्दावती देवी की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों ने उन्हें गेडुवा भार में बैठाकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल ढोया और फिर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचाया।
इन घटनाओं में जगह और मरीज अलग-अलग थे, लेकिन परेशानी एक जैसी। कहीं दउरी, कहीं खटिया तो कहीं गेडुवा भार ही एंबुलेंस बन गया।
युवा झारखंड, लेकिन गांवों तक कब पहुंचेगा विकास?
झारखंड को अलग राज्य बने 25 साल से अधिक हो चुके हैं। इन वर्षों में राज्य ने कई क्षेत्रों में आगे बढ़ने की कोशिश की है, लेकिन मासधारी जैसे गांवों की तस्वीर बताती है कि बुनियादी सुविधाओं की पहुंच अब भी एक बड़ी चुनौती है। सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने का सबसे जरूरी रास्ता भी है। जब गांव तक सड़क ही नहीं होगी, तो एंबुलेंस वहां पहुंचेगी कैसे? और जब एंबुलेंस नहीं पहुंचेगी, तो आपात स्थिति में मरीजों को समय पर अस्पताल कैसे पहुंचाया जाएगा?
यह समस्या सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और आम लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ी है। किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान चार किलोमीटर तक खटिया पर ढोना पड़े, तो यह तस्वीर विकास की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
सरकार की नजर कब पड़ेगी इन गांवों पर?
मासधारी गांव के लोगों के लिए सड़क और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी एक बड़ी जरूरत हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन की नजर उनकी समस्याओं पर पड़ेगी और उन्हें भी वे बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी, जो किसी भी नागरिक के लिए जरूरी हैं।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एक गर्भवती महिला को चार किलोमीटर तक खटिया पर क्यों ढोना पड़ा। बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बीमारी और आपात स्थिति का मतलब खटिया के सहारे अस्पताल तक पहुंचना रहेगा?
