Thursday, October 15

रांची। झारखंड में चिकित्सकों की विभिन्न मांगों को लेकर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े 10 प्रमुख चिकित्सा संगठनों ने संयुक्त आंदोलन का ऐलान किया है। इसके तहत चिकित्सक 20 अक्टूबर तक काला बिल्ला लगाकर विरोध दर्ज करा रहे हैं। इसके बाद 21 अक्टूबर को धरना-प्रदर्शन और सांकेतिक कार्य बहिष्कार किया जाएगा। वहीं, मांगें पूरी नहीं होने पर 22 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार शुरू करने की घोषणा की गई है। हालांकि, आंदोलन के दौरान मरीजों के हितों को ध्यान में रखते हुए आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह जारी रखने की बात कही गई है।

राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने, चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और मरीजों को सुलभ, गुणवत्तापूर्ण एवं किफायती इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इन संगठनों ने संयुक्त चिकित्सा आंदोलन की शुरुआत की है। इसे जॉइंट मेडिकल मूवमेंट नाम दिया गया है। आंदोलन के माध्यम से चिकित्सक सरकार का ध्यान स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।

20 अक्टूबर तक काला बिल्ला लगाकर विरोध

आंदोलन के पहले चरण में 13 अक्टूबर से चिकित्सक काला बिल्ला लगाकर काम कर रहे हैं। यह विरोध 20 अक्टूबर तक जारी रहेगा। इसके बाद 21 अक्टूबर को धरना-प्रदर्शन और सांकेतिक कार्य बहिष्कार का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। आंदोलन के अगले चरण में 22 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार शुरू करने की तैयारी है।

आईएमए के अध्यक्ष डॉ. जुनैद ने बताया कि चिकित्सक पहले चरण में काला बिल्ला लगाकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। इसके बाद 21 अक्टूबर को धरना-प्रदर्शन किया जाएगा और 22 अक्टूबर से कार्य बहिष्कार शुरू होगा। चिकित्सक संगठनों का कहना है कि उनकी मांगें स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने और चिकित्सा सेवाओं में सुधार से जुड़ी हैं।

झारखंड में डॉक्टर प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की मांग

आईएमए गोड्डा इकाई के सचिव डॉ. आकाश कुमार ने बताया कि कई राज्यों में डॉक्टर प्रोटेक्शन एक्ट लागू हो चुका है, लेकिन झारखंड में अब तक इसे लागू नहीं किया गया है। चिकित्सकों का मानना है कि चिकित्सा कार्य के दौरान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस कानून का प्रभावी कार्यान्वयन जरूरी है।

संगठनों ने चिकित्सकों और स्वास्थ्य संस्थानों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को मजबूत करने की मांग उठाई है। इसके साथ ही महिला चिकित्सकों की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। महिला विंग ने रात्रि सेवा के दौरान महिला डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। संगठनों का कहना है कि सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराना स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आयुष्मान योजना और अस्पतालों से जुड़े मुद्दे भी शामिल

संयुक्त चिकित्सा आंदोलन के तहत आयुष्मान भारत योजना से संबंधित समस्याओं को भी उठाया गया है। चिकित्सक संगठनों ने योजना के तहत समय पर प्री-अप्रूवल, उचित पैकेज दरें और अस्पतालों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इन प्रक्रियाओं में समयबद्धता और पारदर्शिता रहने से मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने तथा अस्पतालों के संचालन में सहूलियत होगी।

इसके अलावा क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट में व्यावहारिक संशोधन करने की मांग की गई है। संगठनों का कहना है कि नियमों को इस तरह व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए, जिससे छोटे और मध्यम अस्पतालों पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़े और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी बनी रहे।

मरीजों के हितों को ध्यान में रखने का दावा

चिकित्सा संगठनों ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन केवल चिकित्सकों के हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना और राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना भी है। इसी कारण आंदोलन के दौरान आपातकालीन सेवाएं पूरी तरह जारी रखने की बात कही गई है।

हालांकि, 22 अक्टूबर से प्रस्तावित अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार का स्वास्थ्य सेवाओं पर कितना असर पड़ेगा, यह आंदोलन के स्वरूप और संबंधित संस्थानों की भागीदारी पर निर्भर करेगा। फिलहाल चिकित्सक संगठनों ने चरणबद्ध कार्यक्रम के जरिए सरकार तक अपनी मांगें पहुंचाने की तैयारी की है। अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या कदम उठाती है और आंदोलन को टालने के लिए कोई पहल होती है या नहीं।

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