“एक सुट्टा दो चाय…मर्द जात हाय हाय!”

“शर्म नहीं है मर्दो में…औरत क्यों है पर्दो में!”
“नारी अपने आप की नहीं किसे के बाप की!”
आखिर चल क्या रहा दिल्ली में?
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों यह नारा सुनाई दे रहा है। हाथों में पोस्टर, जुबान पर नारे और सवालों के साथ बड़ी संख्या में छात्राएं सड़क पर उतर रही हैं।
दरअसल, यह विरोध सिर्फ किसी एक घटना के खिलाफ नहीं है। इसके पीछे महिलाओं की सुरक्षा, रात में बाहर निकलने की आजादी और सार्वजनिक जगहों पर बराबर अधिकार को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस है। हालिया विरोध की शुरुआत दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ गैंगरेप की घटना के बाद हुई।
घटना के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी DDA ने अपने पार्कों की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने के निर्देश दिए। कई गेट वाले पार्कों में सूर्यास्त के बाद चुनिंदा गेटों से प्रवेश, CCTV और रोशनी बढ़ाने, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और रात की निगरानी मजबूत करने जैसे कदमों की बात सामने आई।
यहीं से छात्राओं के बीच एक बड़ा सवाल उठा – अगर कोई जगह असुरक्षित है, तो वहां सुरक्षा बढ़े या महिलाओं का वहां जाना कम किया जाए?
“एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा”
यह नारा महिलाओं के उस अनुभव को व्यंग्य के जरिए सामने ला रहा है, जिसमें सामान्य तरीके से बाहर निकलना भी कई बार असहजता, छेड़छाड़ या डर से जुड़ा है।
प्रदर्शन में “हम औरतें आजाद हैं”, “रातों पर भी हक है हमारा”, “Hum leke rahenge azaadi” और “Girls just wanna have fundamental rights” जैसे नारे भी सुनाई दिए।
छात्राओं का कहना है कि उन्हें यह तय करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि किस समय घर से निकलना है, किस रास्ते से जाना है और किस जगह पर नहीं जाना है।
यही वजह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों की छात्राएं प्रदर्शन में शामिल हुईं।
उनके पोस्टरों में लिखा है – “रातों पर भी हक है हमारा।”
कुछ छात्राओं ने कहा कि महिलाओं को सुरक्षित रखने का मतलब उन्हें घर में रहने की सलाह देना नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, सड़क, पार्क, सार्वजनिक परिवहन और दूसरे public spaces महिलाओं के लिए भी उतने ही हैं जितने पुरुषों के लिए।
यह सवाल आज का नहीं है…
दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ऐसी बहस पहली बार नहीं हो रही।
16 दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद देशभर में महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था, कानून और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की आजादी को लेकर बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए थे।
उस समय भी सवाल यही था कि महिलाएं कब और कितनी सुरक्षित तरीके से सार्वजनिक जगहों पर जा सकती हैं?
2012 के बाद कानूनों में बदलाव हुए, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई स्तरों पर कदम उठाए गए और महिलाओं की सुरक्षा लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनी रही।
लेकिन 2026 में दिल्ली की छात्राओं का प्रदर्शन दिखाता है कि सुरक्षा और महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही का सवाल अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
लड़कियां आखिर चाहती क्या हैं?
प्रदर्शनकारियों की मांगों में मुख्य रूप से सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाने पर जोर है।
वे बेहतर street lighting, CCTV, पुलिस पेट्रोलिंग, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और कॉलेजों के आसपास बेहतर सुरक्षा व्यवस्था की मांग कर रही हैं।
उनका सवाल यह है कि अगर किसी सड़क पर अंधेरा है तो वहां लाइट क्यों न लगाई जाए? अगर किसी इलाके में CCTV नहीं है तो उसे क्यों न लगाया जाए? अगर किसी जगह पर सुरक्षा की समस्या है तो वहां पुलिस की मौजूदगी क्यों न बढ़ाई जाए?
यानी उनके अनुसार समाधान यह नहीं होना चाहिए कि “लड़कियां वहां मत जाओ।”
समाधान यह होना चाहिए कि “वह जगह ऐसी बनाओ जहां लड़कियां भी बिना डर जा सकें।”
पार्क से सड़क, सड़क से बस तक…
इस बहस को सिर्फ आस्था कुंज पार्क तक सीमित नहीं किया जा सकता।
महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा का सवाल सड़क, बस, मेट्रो, बाजार, कॉलेज और काम से घर लौटने वाले रास्तों तक फैला है।
हाल के दिनों में बिहार के जमुई में कोचिंग से लौट रहे किशोर-किशोरी के साथ मारपीट और ग्रेटर नोएडा से चलने वाली बस में किशोरी के साथ गैंगरेप जैसे मामले भी सामने आए हैं।
जगह अलग हैं। लेकिन इन घटनाओं के बाद छात्राओं के बीच एक सवाल बार-बार सामने आ रहा है – महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या उनकी आवाजाही पर पाबंदी जरूरी है, या सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है?
प्रदर्शन में शामिल छात्राओं का कहना है कि वे सुरक्षित माहौल चाहती हैं, लेकिन साथ ही सार्वजनिक जगहों पर सामान्य तरीके से आने-जाने की स्वतंत्रता भी बनाए रखना चाहती हैं। उनके मुताबिक, रात में बाहर निकलना हो या दिन में किसी सार्वजनिक जगह पर जाना, सुरक्षा की चिंता उनके रोजमर्रा के फैसलों का हिस्सा नहीं होनी चाहिए।
इन प्रदर्शनों के जरिए छात्राएं अपनी मांग और अनुभव सामने रख रही हैं।
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