रांची। राज्य में जबसे हेमंत सोरेन की सरकार सत्ता में आयी है विपक्ष और नेका प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी का राज्य पुलिस और राज्य की जांच एजेंसियों पर से भरोसा ही उठ गया है. जबकि विनय चौबे से लेकर अभी एल ख्यांगते जैसे प्रतिभाशाली पदाधिकारी सलाखों के पीछे हेमंत सोरेन सरकार में ही भेजे गए हैं. दिन एनडीए के नेता झारखंड से जुड़े किसी मुद्दे की जांच ईडी, सीबीआई या स्वतंत्र एजेंसियों से कराने की मांग को लेकर प्रेस कांफ्रेस करते नजर आते हैं. नेताओं की इस गितिविध के कारण अब राज्य पुलिस और राज्य की जांच एजेंसियां सकते में हैं कि क्या झारखंड के हर मामले की जांच केन्द्रीय जांच एजेंसियां या स्वतंत्र एजेंसी ही करने में सक्षम हैं ? आपको बताते चलें कि राज्य में 2019 से पूर्व एनडीए की ही सरकार रही है और अधिकांश वही पुलिस अधिकारी हैं जो एनडीए के शासनकाल में काम कर चुके हैं. राज्य पुलिस के एक सीनियर पदाधिकारी ने कहा कि राज्य के नेताओं के द्वारा जांच एजेंसियों पर यह अविश्वास मनोबल गिराने वाला साबित हो सकता है.
झारखंड के हर मामले की जांच केन्द्रीय जांच एजेंसियां या स्वतंत्र एजेंसी ही करने में सक्षम ?
शराब घोटाले की जांच को लेकर बाबूलाल मरांडी की जनहित याचिका
क्या है ताजा मामला
झारखंड में हुआ शराब घोटाला एक बार फिर चर्चा में है। विपक्ष के प्रमुख नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की गई है। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई, जहां बाबूलाल मरांडी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सिन्हा और सूरज किशोर प्रसाद ने पक्ष रखा।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर झारखंड की शराब व्यवस्था में ऐसा क्या हुआ कि मामला घोटाले और जांच तक पहुंच गया? इस पूरे प्रकरण में कौन-कौन लोग और कंपनियां जांच के घेरे में आईं? इन सवालों के जवाब के लिए पूरे मामले के फ्लैशबैक में जाना जरूरी है।
घोटाले की शुरुआत कहां से हुई?
मामले की जड़ झारखंड में शराब की खरीद, बिक्री, वितरण और रिटेल दुकानों के संचालन से जुड़ी व्यवस्था है। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि शराब नीति लागू करने के दौरान लिए गए प्रशासनिक फैसलों और अलग-अलग सेवाओं के आवंटन में नियमों का पालन हुआ या नहीं। जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा झारखंड स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी JSBCL से जुड़ा है। शराब की सरकारी वितरण व्यवस्था में JSBCL की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके माध्यम से रिटेल दुकानों के संचालन, मैनपावर, तकनीकी व्यवस्था और अन्य सेवाओं से संबंधित काम कराए जाते हैं।
विनय चौबे की भूमिका जांच के केंद्र में क्यों?
बता दे विनय चौबे उस समय उत्पाद विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर थे। इसी वजह से शराब नीति और उससे जुड़े प्रशासनिक निर्णयों में उनकी भूमिका जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण है। 20 मई 2025 को ACB ने शराब घोटाला मामले में उन्हें गिरफ्तार किया था। लेकिन इस मामले के तार धीरे धीरे विनय चौबे से पूछताछ के बाद परत दर परत खुलने लगी। ACB ने कई अधिकारियों और निजी एजेंसियों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार भी किया। इनमें तत्कालीन संयुक्त आयुक्त उत्पाद गजेंद्र सिंह, JSBCL के अधिकारी सुधीर कुमार दास, सुधीर कुमार और निजी प्लेसमेंट एजेंसी से जुड़े प्रतिनिधि शामिल रहे हैं। बाद में पूर्व उत्पाद आयुक्त अमित प्रकाश की गिरफ्तारी भी हुई।
राज्य को कितना नुकसान हुआ ?
इस मामले में राज्य के खजाने को करीब ₹38 करोड़ के कथित नुकसान हुआ। बता दे चौबे को शराब मामले में बाद में जमानत मिली, लेकिन अन्य मामलों में दर्ज प्राथमिकी के कारण वह तत्काल जेल से बाहर नहीं आ सके। विभिन्न मामलों में जमानत मिलने के बाद 7 अगस्त 2026 को वह करीब 430 दिन जेल में रहने के बाद रिहा हुए।
किन एजेंसियों और कंपनियों को मिला था काम?
जांच के दौरान जिन संस्थाओं और कंपनियों का नाम सामने आया है, उनमें JSBCL, डिजिटल ट्रैक एंड ट्रेस सिस्टम से जुड़ी एजेंसियां, होलोग्राम निर्माण से जुड़े ठेकेदार और निजी कंपनियां शामिल हैं। ACB ने JSBCL के आईटी मैनेजर अमर कुमार मेहता से भी पूछताछ की है। उनसे डिजिटल ट्रैक एंड ट्रेस सिस्टम की मॉनिटरिंग, होलोग्राम निर्माण और निगरानी व्यवस्था के बारे में जानकारी ली गई। जांच एजेंसी यह भी पता लगाया कि विधु गुप्ता को संबंधित काम कैसे मिला और तत्कालीन उत्पाद सचिव विनय चौबे की इसमें क्या भूमिका थी। इसके अलावा नेक्सजेन कंपनी के सीईओ अरुण कुमार सिंह से भी पूछताछ की गई थी। उनसे विनय चौबे और उनके परिवार के सदस्यों के साथ कथित वित्तीय लेन-देन, निवेश और कारोबारी संबंधों से जुड़े सवाल ।
अब आगे क्या?
बाबूलाल मरांडी की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी। राज्य सरकार के रुख और अदालत की आगे की कार्रवाई से यह तय होगा कि मामले की जांच मौजूदा एजेंसी से आगे बढ़ती है या स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग पर अदालत कोई निर्देश देती है।


