संथाल परगना की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी अब सड़क से मैदान तक पहुंच रही है। आदिवासी-मूलवासी एकता मंच के आह्वान पर दुमका के ऐतिहासिक गांधी मैदान में महापंचायत होगी, जिसमें क्षेत्र के कई जिलों से बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने का दावा किया गया है। आयोजकों के अनुसार, यह जुटान केवल एक सभा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चिंताओं को सार्वजनिक मंच पर रखने की कोशिश है।

चार मुद्दे, एक साझा चिंता
मंच ने अपने आह्वान में चार प्रमुख विषयों को केंद्र में रखा है। पहला, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी आशंकाएं। दूसरा, खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, यानी एमएमडीआर कानून, जिसे लेकर आयोजकों की आपत्ति है। तीसरा, परिसीमन, जिसका असर राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। चौथा, इलाके में कथित रूप से बिगड़ती कानून-व्यवस्था।
इसके साथ ही मंच ने गांवों में प्राथमिकी (एफआईआर) के कथित दुरुपयोग और स्थानीय समस्याओं को भी प्रमुखता से उठाने की बात कही है। आयोजकों का तर्क है कि ये सभी विषय अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन इनका असर सीधे आदिवासी और मूलवासी समाज की जमीन, पहचान, प्रतिनिधित्व और भविष्य पर पड़ता है।
“अस्तित्व का सवाल”
मंच का कहना है कि संथाल परगना जैसे क्षेत्र में, जहां आदिवासी और मूलवासी आबादी की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान जमीन और जंगल से गहराई से जुड़ी है, नीतिगत फैसलों का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है। आयोजकों के मुताबिक, मतदाता सूची में बदलाव से लेकर खनन से जुड़े कानूनी प्रावधानों और चुनावी सीमाओं के पुनर्निर्धारण तक, हर प्रक्रिया में समाज की भागीदारी और सहमति सुनिश्चित होनी चाहिए।
क्यों अहम है यह जुटान
संथाल परगना लंबे समय से जमीन, पलायन, पहचान और प्रतिनिधित्व जैसे सवालों पर संवेदनशील रहा है। ऐसे में महापंचायत को स्थानीय राजनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। गांधी मैदान में उमड़ने वाली भीड़ और वहां से उठने वाली मांगें आने वाले दिनों में क्षेत्र के राजनीतिक विमर्श की दिशा तय कर सकती हैं।
हालांकि भीड़ की संख्या को लेकर किए गए दावे आयोजकों के हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था संबंधी तैयारियों पर भी फिलहाल कोई विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।


