रंगदारी के साम्राज्य पर दोहरी चोट की तैयारी

रेड कॉर्नर नोटिस के बावजूद कैसे बच जाते हैं अपराधी
झारखंड के अपराध की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले और पुलिस के लिए चुनौती बने अपराधियों के खिलाफ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर शिकंजा कसने की कोशिश तेज हुई है लेकिन यह कितनी सफल होगी यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कुख्यात अपराधी प्रिंस खान के खिलाफ पिछले चार वर्षों से इंटरपोल की नोटिस जारी है, लेकिन अब तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।इसी कड़ी में अब कुख्यात अपराधी राहुल सिंह और राहुल दुबे के खिलाफ भी इंटरपोल की नोटिस जारी होने की खबर है। सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की यह पहल इन अपराधियों तक कानून का हाथ पहुंचा पाएगी? या फिर प्रिंस खान की तरह राहुल सिंह और राहुल दुबे के मामले में भी नोटिस जारी होना सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा? आखिर विदेश में बैठकर आपराधिक नेटवर्क चलाने के आरोपों से घिरे इन अपराधियों की वापसी कब होगी? क्या संबंधित देशों की एजेंसियों के साथ समन्वय, लोकेशन ट्रेसिंग और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया में तेजी आएगी? झारखंड पुलिस की चुनौती अब सिर्फ इन अपराधियों की तलाश नहीं, बल्कि उनके नेटवर्क, फंडिंग और स्थानीय सहयोगियों तक पहुंचने की भी है। इंटरपोल की नोटिस के बाद उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन असली सवाल गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का है।
स्थानीय स्तर पर अपने गुर्गों के जरिए कारोबारियों और ठेकेदारों को निशाना बनाने वाले इन गैंगस्टरों के लिए विदेश में छिपकर रहना आसान हो गया है। रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने के बाद इंटरपोल के सदस्य देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों को इनकी तलाश और संभावित गिरफ्तारी के संबंध में सूचना दी जा सकती है। हालांकि, किसी अपराधी की गिरफ्तारी और भारत वापसी संबंधित देश के कानूनों तथा कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
झारखंड के कुख्यात गैंगस्टर प्रिंस खान के खिलाफ करीब चार साल पहले इंटरपोल की ओर से रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था। पुलिस ने उसका पासपोर्ट भी रद्द करा दिया था, लेकिन इतने लंबे समय बाद भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। विदेश में छिपे प्रिंस खान तक भारतीय एजेंसियों की पहुंच अब तक नहीं बन पाना पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है।
प्रिंस खान पर झारखंड में रंगदारी, धमकी और संगठित आपराधिक गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर आरोप हैं। आरोप है कि वह विदेश में रहकर अपने नेटवर्क के जरिए स्थानीय स्तर पर आपराधिक गतिविधियां संचालित करता रहा है। रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने और पासपोर्ट रद्द होने के बावजूद उसकी गिरफ्तारी नहीं हो पाना कई सवाल खड़े करता है।
विदेश में बैठकर स्थानीय नेटवर्क चलाने का आरोप
पुलिस जांच के अनुसार, राहुल सिंह और राहुल दुबे विदेश में रहकर झारखंड में अपने आपराधिक नेटवर्क को सक्रिय रखने की कोशिश कर रहे थे। इनके संपर्क स्थानीय गुर्गों, शूटरों और हथियार सप्लायरों से बताए जाते हैं। पुलिस के मुताबिक, इनके निशाने पर मुख्य रूप से बड़े कारोबारी, कोयला व्यापारी, ठेकेदार और कंस्ट्रक्शन कंपनियां रहती हैं। रंगदारी की मांग पूरी नहीं होने पर धमकी देने और निर्माण स्थलों पर फायरिंग जैसी घटनाओं के जरिए दबाव बनाने के आरोप भी इन गिरोहों पर हैं।
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन गिरोहों के उन स्थानीय सदस्यों की पहचान करना और उन्हें गिरफ्तार करना है, जो विदेश में बैठे सरगनाओं के निर्देश पर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं। रेड कॉर्नर नोटिस के साथ स्थानीय नेटवर्क पर कार्रवाई को जोड़कर पुलिस इन गिरोहों की गतिविधियों को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही है।
अमन साहू की मौत के बाद राहुल सिंह ने बढ़ाया नेटवर्क
राहुल सिंह का नाम झारखंड के कुख्यात गैंगस्टर अमन साहू के गिरोह से जुड़ा रहा है। वह कभी इस गिरोह का प्रमुख सहयोगी माना जाता था। मार्च 2025 में पुलिस मुठभेड़ में अमन साहू की मौत के बाद राहुल सिंह ने गिरोह की कमान संभालने का दावा किया। इसके बाद उसका नेटवर्क रांची, रामगढ़, पलामू, बोकारो, चतरा, हजारीबाग और लातेहार जैसे जिलों तक सक्रिय बताया गया।
इन जिलों में कोयला कारोबार, औद्योगिक गतिविधियों, निर्माण कार्यों और ठेकेदारी से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। पुलिस के लिए चुनौती केवल मुख्य सरगना तक पहुंचना नहीं, बल्कि उसके नाम पर सक्रिय स्थानीय अपराधियों और रंगदारी वसूलने वाले नेटवर्क को भी खत्म करना है।
होटल फायरिंग के बाद राहुल दुबे गैंग पर पुलिस का शिकंजा
दूसरी ओर, राहुल दुबे का गिरोह भी हाल के दिनों में पुलिस की जांच के केंद्र में रहा है। 29 अक्टूबर की रात हजारीबाग के मटवारी स्थित एके इंटरनेशनल होटल पर फायरिंग की घटना हुई थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर राहुल दुबे के नाम से जिम्मेदारी लेने वाली पोस्ट सामने आई और होटल संचालक को धमकी दिए जाने की बात भी सामने आई।
इस मामले के बाद रांची पुलिस ने 30 अक्टूबर को कार्रवाई करते हुए मुठभेड़ के बाद गिरोह के पांच कथित शूटरों और मुख्य हथियार सप्लायर जियाउल हबीब को गिरफ्तार किया था। इस कार्रवाई को गिरोह के स्थानीय नेटवर्क पर पुलिस की बड़ी चोट के तौर पर देखा जा रहा है। अब राहुल दुबे के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने से जांच का दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।
रेड कॉर्नर नोटिस के बाद प्रत्यर्पण की राह
रेड कॉर्नर नोटिस किसी अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट की तरह नहीं होता, बल्कि यह इंटरपोल के सदस्य देशों से किसी वांछित व्यक्ति का पता लगाने और संबंधित देश के कानून के तहत उसकी संभावित अस्थायी गिरफ्तारी का अनुरोध होता है। इसके आधार पर भारत सरकार संबंधित देश के साथ प्रत्यर्पण की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। इसके लिए आवश्यक दस्तावेज, आरोपों से जुड़े साक्ष्य और कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।
झारखंड पुलिस की इस कार्रवाई के दो अहम पहलू हैं। पहला, विदेश में छिपे कथित सरगनाओं तक पहुंचने के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का सहयोग लेना और दूसरा, राज्य के भीतर उनके स्थानीय नेटवर्क को कमजोर करना। यदि दोनों मोर्चों पर कार्रवाई सफल रहती है तो रंगदारी और संगठित अपराध से जुड़े गिरोहों की गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि रेड कॉर्नर नोटिस के बाद दोनों आरोपियों की तलाश और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।


