पांच साल में नहीं शुरू हो सकी जांच की सुविधा

भवन निर्माण के बाद हैंडओवर और संचालन की प्रक्रिया में उलझा प्रोजेक्ट
स्वास्थ्य विभाग और केंद्र सरकार के बीच जवाबदेही का सवाल
झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के नाम पर योजनाएं तो बड़ी-बड़ी बनती हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने की रफ्तार अक्सर सरकारी दावों की पोल खोल देती है। इसकी एक बड़ी मिसाल रांची के इटकी में बन रहा राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल यानी NCDC) है। जिस संस्थान को झारखंड सहित आसपास के राज्यों में संक्रामक और उभरती बीमारियों की पहचान, जांच और निगरानी का महत्वपूर्ण केंद्र बनना था, वह वर्षों बाद भी आम लोगों के लिए अपनी सेवाएं शुरू नहीं कर पाया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब केंद्र के भवन निर्माण पर करीब 13 करोड़ रुपये खर्च किए गए, निर्माण कार्य लगभग पूरा हो गया और 2023 में ही इसके तैयार होने की खबरें सामने आ गई थीं, तो फिर अब तक यहां जांच की सुविधा क्यों शुरू नहीं हुई? क्या तकनीकी औपचारिकताएं बाधा बनीं, क्या भवन का हस्तांतरण नहीं हो पाया, या फिर कर्मचारियों और आधुनिक जांच उपकरणों की व्यवस्था ही नहीं की गई? आखिर इस परियोजना की जिम्मेदारी किसकी है?

2016 में बनी योजना, 2021 के बाद निर्माण की चर्चा, लेकिन संचालन अब भी अधूरा
इटकी में एनसीडीसी शाखा स्थापित करने की योजना अचानक नहीं बनी थी। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की शाखाओं के विस्तार की योजना के तहत झारखंड को भी शामिल किया गया था। एनसीडीसी के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, इटकी सैनिटोरियम परिसर में दो एकड़ जमीन आवंटित की गई। इसके लिए 8 नवंबर 2016 को एमओयू और 6 दिसंबर 2018 को लीज डीड की प्रक्रिया पूरी हुई थी। यानी परियोजना की प्रशासनिक शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी।
इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) के माध्यम से भवन निर्माण कराया गया। जुलाई 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस भवन के निर्माण पर करीब 13 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। उस समय खबर आई थी कि भवन तैयार है, लेकिन विभाग को हस्तांतरित नहीं किए जाने के कारण जांच शुरू नहीं हो पाई है। रिपोर्ट में चहारदीवारी के रंग-रोगन और कुछ अन्य काम अधूरे रहने की बात भी सामने आई थी।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भवन तैयार होने और किसी संस्थान के विधिवत संचालन शुरू होने में बड़ा अंतर होता है। एनसीडीसी जैसे उच्चस्तरीय संस्थान के लिए केवल भवन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रयोगशाला, अत्याधुनिक जांच उपकरण, तकनीकी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, चिकित्साकर्मी, प्रशासनिक कर्मचारी और नियमित संचालन की व्यवस्था भी जरूरी है।
2023 में हैंडओवर नहीं, 2026 में भी निर्माण के टेंडर!
इस परियोजना की सुस्ती का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि 2023 में भवन हस्तांतरण नहीं होने की खबर सामने आई थी, जबकि नवंबर 2026 में भी इसके निर्माण से संबंधित अतिरिक्त कार्यों के टेंडर जारी किए गए हैं।
केंद्रीय लोक निर्माण विभाग से संबंधित अक्टूबर 2026 के टेंडर विवरण में इटकी एनसीडीसी शाखा के लिए दो गार्ड रूम बनाने, खुले परिसर के हिस्से में एमएस ट्रस और पॉलीकार्बोनेट शीट लगाने तथा शेष सिविल और इलेक्ट्रिकल कार्यों का उल्लेख है। इस काम की अनुमानित लागत करीब 39.53 लाख रुपये बताई गई है।
यही नहीं, सितंबर 2026 में एनसीडीसी इटकी के लिए उपकरण, फर्नीचर और आईटी उपकरणों की आपूर्ति तथा स्थापना से संबंधित टेंडर प्रक्रिया भी सामने आई। एक टेंडर का अनुमानित मूल्य करीब 25.30 लाख रुपये दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भवन निर्माण के बाद भी संस्थान को पूरी तरह तैयार करने के लिए अतिरिक्त काम और खरीदारी की प्रक्रिया जारी रही।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भवन समय पर क्यों नहीं खुला, बल्कि यह भी है कि इतने वर्षों बाद भी इसकी बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों को पूरा करने की प्रक्रिया क्यों जारी है?
एनसीडीसी शुरू होता तो झारखंड को क्या मिलता?
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र कोई सामान्य अस्पताल नहीं है। इसका मुख्य काम संक्रामक बीमारियों की निगरानी, रोगों के प्रकोप की जांच, प्रयोगशाला परीक्षण, महामारी संबंधी अध्ययन और स्वास्थ्य विभाग को तकनीकी सहायता देना है।
एनसीडीसी की शाखाएं किसी राज्य में बीमारी के फैलने की स्थिति में त्वरित जांच और प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, इन शाखाओं को निगरानी, आउटब्रेक इन्वेस्टिगेशन, रेफरल और डायग्नोस्टिक सेवाओं के साथ आधुनिक उपकरणों से लैस किया जाना है।
अगर इटकी का केंद्र समय पर शुरू हो गया होता, तो झारखंड को कई मामलों में दूसरे राज्यों या केंद्रीय संस्थानों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, स्वाइन फ्लू और दूसरी उभरती संक्रामक बीमारियों की जांच और निगरानी की क्षमता मजबूत हो सकती थी। बीमारी के प्रकोप की स्थिति में स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक जांच और त्वरित प्रतिक्रिया का तंत्र भी विकसित होता।
कोरोना महामारी ने यह साबित किया था कि किसी भी राज्य के लिए अपनी मजबूत जांच और निगरानी व्यवस्था कितनी जरूरी है। ऐसे समय में इटकी का एनसीडीसी केंद्र झारखंड के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता था।
एनसीडीसी की वेबसाइट पर भी प्रोजेक्ट ‘अपकमिंग ब्रांच’
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की आधिकारिक वेबसाइट पर झारखंड की रांची शाखा को आज भी ‘Upcoming NCDC Branches’ की सूची में रखा गया है। इटकी सैनिटोरियम को आवंटित जमीन और अधिकारी-प्रभारी के रूप में डॉ. तरुण कुमार का नाम दर्ज है। निर्माण की स्थिति ‘Near completion’ बताई गई है।
यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। यदि भवन 2023 में ही तैयार बताया जा चुका था, तो तीन साल बाद भी आधिकारिक वेबसाइट पर इसे आगामी शाखा क्यों दिखाया जा रहा है? क्या निर्माण कार्य पूरी तरह पूरा नहीं हुआ? क्या उपकरणों की स्थापना और तकनीकी परीक्षण बाकी हैं? क्या मानव संसाधन की नियुक्ति और बजट आवंटन में देरी हुई है?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब संबंधित विभागों की ओर से सार्वजनिक रूप से सामने आना जरूरी है।
केंद्र और राज्य के बीच जवाबदेही किसकी?
इस परियोजना में केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। जमीन राज्य सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई, जबकि भवन निर्माण की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के CPWD के माध्यम से पूरी की गई। लेकिन भवन निर्माण के बाद संचालन की जिम्मेदारी, संसाधनों की उपलब्धता और हस्तांतरण की प्रक्रिया किस स्तर पर अटकी, यह स्पष्ट होना बाकी है।
2023 की रिपोर्ट में भवन हैंडओवर नहीं होने को जांच शुरू नहीं होने की प्रमुख वजह बताया गया था। वहीं 2026 के टेंडर बताते हैं कि अतिरिक्त निर्माण, सिविल-इलेक्ट्रिकल कार्य और उपकरणों की व्यवस्था की प्रक्रिया भी काफी बाद तक जारी रही। इन तथ्यों को देखते हुए देरी के पीछे एक से अधिक प्रशासनिक और तकनीकी कारण होने की संभावना है। हालांकि, अंतिम कारणों की पुष्टि के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, एनसीडीसी मुख्यालय, CPWD और झारखंड स्वास्थ्य विभाग का आधिकारिक पक्ष जरूरी है।
पांच साल बाद भी वही सवाल… कब शुरू होगा केंद्र?
झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और आधुनिक जांच केंद्रों की योजनाएं भी सामने आती हैं। लेकिन इटकी का एनसीडीसी बताता है कि निर्माण और वास्तविक संचालन के बीच की दूरी कितनी लंबी हो सकती है।
करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से तैयार बताया गया भवन, वर्षों से लंबित हस्तांतरण, अतिरिक्त निर्माण कार्यों के टेंडर और उपकरणों की खरीद की प्रक्रिया इस परियोजना की सुस्त रफ्तार की कहानी कह रहे हैं।
अब जरूरत है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य का स्वास्थ्य विभाग संयुक्त रूप से स्पष्ट समयसीमा जारी करें। यह बताया जाए कि भवन का हैंडओवर कब होगा, प्रयोगशाला के उपकरण कब स्थापित होंगे, वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति कब होगी और आम जनता को इसका लाभ कब से मिलना शुरू होगा।
आखिर सवाल सिर्फ एक सरकारी भवन के खुलने का नहीं है। सवाल झारखंड की स्वास्थ्य सुरक्षा का है। जिस संस्थान को बीमारियों के खतरे की पहचान समय रहते करनी थी, वह खुद वर्षों से अपनी शुरुआत का इंतजार कर रहा है। क्या इटकी का एनसीडीसी भी सरकारी फाइलों और टेंडरों के बीच उलझकर रह जाएगा?


