तीन दशक तक झारखंड के कोयला अंचल में दहशत का दूसरा नाम रहा टीएसपीसी सुप्रीमो ब्रजेश गंझू आखिरकार उत्तर प्रदेश एटीएस की गोलियों का शिकार बन गया। असली नाम गोपाल सिंह भोक्ता, लेकिन इलाके में उसे रंजन जी, दुलारचंद गंझू और मास्टर साहब जैसे कई नामों से जाना जाता था — पहचान बदलती रही, लेकिन खौफ हमेशा एक जैसा बना रहा।
पुलिस के लिए यह मुठभेड़ बड़ी कामयाबी भले हो, लेकिन इसकी जड़ें कहीं गहरी हैं — आम्रपाली कोयला क्षेत्र को उग्रवाद-मुक्त बनाने की केंद्र सरकार की मुहिम से। धनबाद में अभियान की सफलता के बाद अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की नजर सीधे चतरा-लातेहार पर टिकी है। हालांकि ब्रजेश खुद पिछले कुछ वर्षों से मैदान से दूर था, पर उसके गुर्गों की बनाई कमेटियों के जरिए टेरर फंडिंग बदस्तूर जारी रही — यही वजह है कि गृह मंत्रालय ने साफ निर्देश दिया: चतरा-लातेहार को भयमुक्त करना है।
लावालौंग के जंगल से निकला कमांडर
चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र के लुटू सोडावन गांव का यह शख्स कभी इलाके में समानांतर सत्ता चलाता था — विकास और प्रशासन की जगह डर और हिंसा का अपना तंत्र। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि उसके खिलाफ विभिन्न थानों में कुल 44 आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, सुरक्षाबलों पर हमला, हथियार लूट, रंगदारी, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ आर्म्स एक्ट, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, यूएपीए और सीएलए एक्ट जैसी गंभीर धाराएं शामिल थीं।
90 के दशक से शुरू हुआ खूनी सफर
ब्रजेश का आपराधिक करियर 1996 से दर्ज होना शुरू हुआ, जब सिमरिया थाने में हत्या और अपहरण के आरोप में पहला मामला दर्ज हुआ। उसी साल एक और केस जुड़ा — हत्या और चोरी का। 1998 आते-आते उसने रुख और खतरनाक कर लिया: पुलिस बल पर हमला, आगजनी और विस्फोटक अधिनियम के तहत दो अलग मामले दर्ज हुए। महज दो साल के भीतर सिमरिया और आसपास के इलाकों में उसका नाम सुनकर व्यापारी और ग्रामीण थर्राने लगे थे।
जब जवानों की जान ली गई
पुलिस फाइलों में दर्ज सबसे भयावह वारदातों में से एक लावालौंग के कोलकोले क्षेत्र की है। ब्रजेश की अगुआई में उग्रवादियों के एक सशस्त्र दस्ते ने पुलिस गश्ती दल पर घात लगाकर हमला किया। इस हमले में बीएमपी-6 के दो जवान शहीद हुए, और हमलावर उनके एसएलआर व राइफल लूटकर फरार हो गए। इस एक वारदात ने उसे राज्य के सबसे बड़े उग्रवादी कमांडरों की सूची में ला खड़ा किया।
मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतारे गए ग्रामीण
ब्रजेश का नेटवर्क सिर्फ रंगदारी तक सीमित नहीं था — संगठन के खिलाफ बोलने वाली या पुलिस की मदद करने वाली हर आवाज को कुचला जाता था।
- फरवरी 2025: टंडवा के लेम्बुआ जंगल के पास भुनेश्वर साव की हत्या — आरोप था पुलिस मुखबिरी और कोर्ट में गवाही देने का।
- जुलाई 2018: पत्थलगड्ढा के मेरमगड़ा गांव में लेवी न चुकाने पर मनरेगा ठेकेदार नागेश्वर गंझू की पीट-पीटकर हत्या; दो अन्य ग्रामीण भी बुरी तरह घायल हुए।
- नवंबर 2017: पिपरवार के करमाटांड़ में प्रतिद्वंद्वी संगठन जेजेएमपी के सदस्य प्रदीप महतो की गोली मारकर हत्या।
- अप्रैल 2014: कटकमसांडी के कुसुम्बा गांव में दो ग्रामीणों — बादल मुंडा और अशोक उरांव — की गोली मारकर हत्या।
- मार्च 2012: एंटरगंज के कुसनाटी में भाकपा माओवादी कमांडर के परिवार के घर को बम से उड़ाया गया, आग लगाई गई और तीन ग्रामीणों को माओवादी समर्थक बताकर पीटा गया।
- नवंबर 2010: वशिष्टनगर के बोबे गांव में ग्रामीण रघुनाथ यादव की गोली मारकर हत्या।
चतरा से हजारीबाग तक फैला मुकदमों का जाल
ब्रजेश के खिलाफ दर्ज मामलों की भौगोलिक फैलाव खुद बताती है कि उसका खौफ किसी एक इलाके तक सीमित नहीं था:
- टंडवा थाना — रंगदारी, हत्या के प्रयास, यूएपीए और आर्म्स एक्ट से जुड़े दर्जनों मामले, जिनमें 1990 और 2000 के दशक से लेकर 2025 तक के केस दर्ज हैं।
- सिमरिया थाना — 1996 से 2018 तक फैले कई मामले।
- लावालौंग थाना — अपहरण और रंगदारी से जुड़े मुकदमे।
- पिपरवार थाना — करमाटांड़ हत्याकांड समेत आर्थिक अपराध के केस।
- गिद्धौर व चतरा सदर थाना — रंगदारी और आर्म्स एक्ट के मामले।
- अन्य थाने — कटकमसांडी (हजारीबाग), कुंदा, मयूरहंड, वशिष्टनगर, राजपुर और एंटरगंज में भी दर्ज गंभीर अपराध।
कोयला हब से करोड़ों की उगाही
टंडवा, पिपरवार और सिमरिया जैसे इलाके झारखंड के प्रमुख कोयला और औद्योगिक हब हैं। ब्रजेश और उसके संगठन टीएसपीसी ने यहां चलने वाली रेल लाइनों, कोयला ढुलाई और चतरा-हजारीबाग मार्ग की निर्माण परियोजनाओं को निशाना बनाकर करोड़ों की अवैध वसूली का तंत्र खड़ा किया। 2021 से 2025 के बीच दर्ज मामले बताते हैं कि हाल के वर्षों में भी वह फोन पर धमकियां देकर, काम रुकवाकर और ठेकेदारों पर हमले कराकर रंगदारी वसूलने की कोशिशों में सक्रिय रहा — भले ही वह मैदान से दूर बनारस में छिपा बैठा था।
आखिरी शिकंजा
झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर की संयुक्त टीमें लंबे समय से उसके ठिकानों की तलाश में जुटी थीं। पुलिस को भनक लगी कि ब्रजेश बनारस में रह रहा है, जिसके बाद यूपी पुलिस के साथ समन्वय शुरू हुआ। रविवार तड़के, 44 से ज्यादा संगीन मामलों में वांछित इस उग्रवादी सरगना की कहानी एटीएस की गोलियों में हमेशा के लिए खत्म हो गई। अब पुलिस की अगली कार्रवाई उसकी अवैध संपत्तियों को जब्त करने और बचे हुए नेटवर्क को ध्वस्त करने पर केंद्रित है।



