रांची। बच्चों का इलाज मुफ्त हो रहा है, सरकार खर्च उठा रही है और परिवारों को आर्थिक राहत मिल रही है – यह निश्चित तौर पर अच्छी पहल है। लेकिन इसी पहल के साथ एक सवाल भी खड़ा होता है। आखिर झारखंड में गंभीर हृदय रोग से जूझ रहे बच्चों के इलाज के लिए उन्हें कोच्चि क्यों भेजना पड़ रहा है?
सोमवार को झारखंड के 25 बच्चों को बेहतर हृदय उपचार के लिए केरल के कोच्चि स्थित अमृता अस्पताल भेजा गया। इन बच्चों में दिल में छेद समेत जन्मजात गंभीर हृदय रोग बताए गए हैं। राज्य सरकार इनके इलाज का खर्च उठा रही है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी की मौजूदगी में बच्चों को रांची के हटिया रेलवे स्टेशन से रवाना किया गया।
यह पहली बार नहीं है। इससे पहले 24 अगस्त को 20 बच्चों का पहला बैच कोच्चि भेजा गया था। स्वास्थ्य विभाग ने करीब 100 बच्चों को इस व्यवस्था के तहत इलाज दिलाने की योजना बताई थी। प्रत्येक बच्चे के इलाज पर करीब 10 लाख रुपये तक का खर्च होने की जानकारी सामने आई है।
पहल सराहनीय, लेकिन सवाल व्यवस्था पर
सरकार की इस पहल का सीधा फायदा उन परिवारों को मिल रहा है जो महंगे हृदय उपचार का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं। सरकार इलाज, जांच और अन्य जरूरी खर्च वहन कर रही है। ऐसे में आर्थिक मजबूरी के कारण किसी बच्चे का इलाज न रुकना निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है।
लेकिन यहीं से झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर दूसरा सवाल शुरू होता है।
लेकिन सोचने वाली बात ये है कि डॉक्टर इरफ़ान अंसारी जहां झारखण्ड के स्वास्थ्य उपलब्धियों के गुणगान करते है वहां ऐसी नौबत आखिर आई क्यों? क्यों बच्चों को बहार भेजा जा रहा? क्या झारखण्ड के रिम्स और अन्य सरकारी अस्पतालों में सुविधा उपलब्ध नहीं है या झारखण्ड में चिकित्सक उपलब्ध नहीं है जो उपचार कर सके?
बड़े अस्पताल और बड़ी योजनाएं, फिर गंभीर इलाज के लिए बाहर क्यों?
झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की लगातार बात होती रही है। RIMS को राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में गिना जाता है और यहां गंभीर मरीजों के इलाज के लिए कई विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध हैं। RIMS की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अस्पताल में कार्डियक एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाएं भी उपलब्ध हैं।
गरीब परिवार के लिए दूसरे राज्य में इलाज सिर्फ बीमारी से लड़ाई नहीं होती। उसके साथ यात्रा, परिजनों के रहने, भाषा और लंबे इलाज जैसी कई दूसरी परेशानियां भी जुड़ जाती हैं। सरकार इन बच्चों के मामले में खर्च उठा रही है, लेकिन हर मरीज के लिए ऐसी व्यवस्था कितनी व्यापक हो सकती है, यह सिर्फ पीड़ित के परिवार वाले समझ सकते है।
दबाओ पुरे राज्य का…संसाधन सिमित
RIMS में वेंटिलेटर की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में तकरीबन 40 वेंटिलेटर हैं, जिनमें लगभग 25 से 30 ही कार्यशील स्थिति में बताए जाते हैं। वहीं बच्चों के लिए करीब 15 वेंटिलेटर उपलब्ध होने की बात कही जाती है, जिनमें भी लगभग 10-11 के ही काम करने की स्थिति में होने का दावा किया जा रहा है।
अब जरा सोचिए, जब पूरे झारखंड से गंभीर मरीज इलाज के लिए RIMS पहुंचते हैं, तो इन सीमित संसाधनों पर कितना दबाव रहता होगा। खासकर गंभीर हृदय रोग से जूझ रहे बच्चों के इलाज में केवल वेंटिलेटर ही नहीं, बल्कि बाल हृदय रोग विशेषज्ञ, कार्डियक सर्जरी, ICU और अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं की भी जरूरत होती है।
वही बात करें हृदय रोग विशेषजों कि तो रांची के रिम्स में हार्ट सर्जन कि भारी मात्रा में कमी है। गलती से सर्जन और डॉक्टर मिल भी जाए तो वेटिंग लिस्ट इतनी लम्बी कि शायद इलाज होते होते मरीज लास्ट स्टेज तक पहुंच जाए। महीनों बीत जाते है इलाज की राह में।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य में पर्याप्त संसाधनों और विशेषज्ञ सुविधाओं की कमी भी उन वजहों में शामिल है, जिसके चलते बच्चों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों में भेजना पड़ रहा है?
आखिर जमीन पर कब दिखेगा बदलाव?
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी लगातार स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने और गरीब मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने की बात कर रहे हैं। इस पहल के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को मुफ्त हृदय उपचार दिलाना उसी दिशा में एक कदम है।
क्या स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने का अर्थ यह है कि गंभीर बीमारी में झारखण्ड सरकार पुरे खर्च के साथ इलाज के लिए मरीज को बहार भेज दें ? झारखंड के सरकारी अस्पतालों में गंभीर और जटिल बीमारियों के इलाज की क्षमता कब इतनी मजबूत होगी कि मरीजों को बाहर भेजने की जरूरत ना के बराबर पड़े।
आज 25 बच्चों को कोच्चि भेजा गया है। कल शायद यह संख्या बढ़ सकती है।
सवाल इलाज का नहीं, स्थायी व्यवस्था का है
कोच्चि भेजे गए बच्चों का मुफ्त इलाज होना राहत की खबर है। लेकिन इससे झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठने वाले सवाल खत्म नहीं होते।
अगर राज्य सरकार इलाज का खर्च उठाकर बच्चों को हजारों किलोमीटर दूर भेज सकती है, तो क्या उसी प्रयास का एक हिस्सा झारखंड में अत्याधुनिक बाल हृदय उपचार की स्थायी व्यवस्था खड़ी करने पर नहीं होना चाहिए?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब स्वास्थ्य विभाग और सरकार से सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर दिखने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं के रूप में अपेक्षित होनी चाहिए।
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