-सुहागिन महिलाओं ने मां को सिंदूर अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना की
रांची। आंखों में आंसू, चेहरे पर मां के अगले साल फिर लौटने की उम्मीद और दिल में बिछड़ने का दर्द. लाल सिंदूर से सजे चेहरे और नम आंखों के बीच जब महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाया, तो पूरा माहौल भावनाओं से भर उठा. किसी ने मां के चरणों में शीश झुकाया, तो किसी ने हाथ जोड़कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की. ढाक की गूंज, शंखनाद और मां दुर्गा के जयकारों के बीच सिंदूर खेला की रस्म निभायी गयी. राजधानी रांची के दुर्गाबाड़ी, हरिमति मंदिर व जगन्नाथनगर सर्वोजनिन दुर्गापूजा समिति सेक्टर-2 स्थित पंडाल में बुधवार को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला. महिलाओं ने मां को सिंदूर अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना की और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर प्रेम और अपनत्व का संदेश दिया. लेकिन इस उल्लास के बीच विदाई की घड़ी आते ही हर चेहरा भावुक हो उठा, उन्हें विदा करते समय भक्तों की आंखें नम हो गयीं. मां से अगले बरस फिर आने का आग्रह करते हुए सभी ने भारी मन से विदाई दी.
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा?
सिंदूर खेला बंगाली दुर्गा पूजा की एक प्रमुख परंपरा है। बंगाली भाषा में ‘सिंदूर खेला’ का अर्थ सिंदूर के साथ उत्सव मनाना है। विजयादशमी के दिन पूजा के प्रमुख अनुष्ठान पूरे होने के बाद महिलाएं मां दुर्गा का वरण करती हैं। इस रस्म को ‘देवी बरण’ भी कहा जाता है।
परंपरा के अनुसार, महिलाएं मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके साथ मिठाई और अन्य पारंपरिक भेंट भी चढ़ाई जाती हैं। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं एक-दूसरे की मांग, माथे और पारंपरिक चूड़ियों पर भी सिंदूर लगाती हैं।
इस रस्म में सिंदूर को सुहाग, सौभाग्य और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। हालांकि, अलग-अलग पूजा समितियों और क्षेत्रों में इस परंपरा को निभाने के तरीके में अंतर हो सकता है।
मां दुर्गा की विदाई के समय ही क्यों होता है सिंदूर खेला?
सिंदूर खेला को समझने के लिए बंगाल में मां दुर्गा की पूजा से जुड़ी एक भावनात्मक मान्यता को जानना जरूरी है। बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को केवल शक्ति की देवी ही नहीं, बल्कि अपने मायके आने वाली बेटी के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता के अनुसार, दुर्गा पूजा के दिनों में देवी अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं और उत्सव के समापन पर उन्हें विदा किया जाता है।
विजयादशमी का दिन इसी विदाई का प्रतीक है। जैसे मायके से विदा होने वाली बेटी को परिवार की महिलाएं स्नेह, आशीर्वाद और शुभकामनाओं के साथ विदा करती हैं, वैसे ही मां दुर्गा को भी सम्मानपूर्वक विदाई देने की परंपरा निभाई जाती है।
इसी भाव के साथ महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं और उनके सुखमय लौटने की कामना करती हैं। इसके बाद आपस में सिंदूर लगाकर एक-दूसरे के जीवन में सुख, शांति और खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। इस तरह सिंदूर खेला में खुशी और विदाई का भाव एक साथ दिखाई देता है। ]
सिंदूर खेला में सिंदूर लगाने का क्या है महत्व?
हिंदू परंपराओं में सिंदूर को विवाहित महिलाओं के सुहाग से जोड़कर देखा जाता है। बंगाली समाज में सिंदूर खेला के दौरान इसे सौभाग्य, मंगल और समृद्धि की कामना के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर उनसे परिवार की खुशहाली और सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाने का उद्देश्य भी शुभकामनाएं साझा करना और आपसी स्नेह व्यक्त करना है।
हालांकि, पति की लंबी उम्र या सुख-समृद्धि से जुड़ी बातें धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं हैं। इन्हें किसी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
लाल और सफेद साड़ी पहनने की क्या है वजह?
सिंदूर खेला के दौरान कई महिलाएं सफेद साड़ी पर लाल किनारा पहनती हैं। बंगाल में इस तरह की साड़ी को ‘लाल पार शादा साड़ी’ कहा जाता है। यह परिधान बंगाली सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक उत्सवी वेशभूषा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सफेद और लाल रंग का यह मेल दुर्गा पूजा के दौरान खास तौर पर दिखाई देता है। सिंदूर के लाल रंग के साथ पारंपरिक साड़ी का संयोजन इस रस्म की पहचान बन गया है। हालांकि, इसे पहनना हर जगह अनिवार्य नहीं है; परंपराएं परिवार, क्षेत्र और पूजा समिति के अनुसार बदल सकती हैं।
क्या केवल विवाहित महिलाएं ही सिंदूर खेला में शामिल हो सकती हैं?
परंपरागत रूप से सिंदूर खेला में विवाहित महिलाओं की भागीदारी प्रमुख रही है। इसकी वजह सिंदूर का सुहाग और वैवाहिक जीवन से जुड़ा पारंपरिक महत्व है। लेकिन समय के साथ इस परंपरा को लेकर दृष्टिकोण में बदलाव भी देखने को मिल रहा है।
कुछ स्थानों पर अविवाहित महिलाएं भी उत्सव में शामिल हो रही हैं। ऐसे आयोजनों में सिंदूर खेला को केवल वैवाहिक स्थिति तक सीमित न रखकर महिला एकजुटता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक उत्सव के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि, यह बदलाव सभी पूजा पंडालों में समान रूप से नहीं अपनाया गया है।
सिंदूर खेला में छिपा है विदाई और मिलन का संदेश
सिंदूर खेला दुर्गा पूजा के समापन का एक भावनात्मक पड़ाव है। एक ओर मां दुर्गा को विदा करने का भाव होता है, तो दूसरी ओर अगले वर्ष उनके फिर से आगमन की प्रतीक्षा भी जुड़ी रहती है। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं, मिठाई बांटती हैं और उत्सव की खुशियां साझा करती हैं।
इस परंपरा की खासियत यही है कि इसमें धार्मिक आस्था के साथ बंगाल की पारिवारिक संस्कृति और सामाजिक संबंधों की झलक भी मिलती है। सिंदूर खेला इसलिए केवल सिंदूर लगाने की रस्म नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, बेटी की विदाई से जुड़ी भावनाओं और सामूहिक उत्सव का प्रतीक भी है।


