वॉशिंगटन, (USA): ईरान और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते से भले ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य व्यापार के लिए फिर से खुल गया हो, लेकिन दुनिया अभी भी एक गंभीर वैश्विक तेल संकट का सामना कर रही है। हाल ही में सामने आई एक वैश्विक रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। पिछले करीब चार महीनों से चले इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार से 115 करोड़ बैरल कच्चे तेल की भारी-भरकम सप्लाई पूरी तरह गायब हो चुकी है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।
तेल उद्योग के जानकारों का कहना है कि इस वैश्विक कमी का असर आने वाले कई महीनों तक बाजार पर साफ दिखाई देगा। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के दौरान मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) से होने वाली तेल की सप्लाई लगभग पूरी तरह ठप रही, जिसके चलते दुनिया के तमाम देशों के रणनीतिक और व्यावसायिक तेल भंडार तेजी से खाली हुए हैं। अकेले पिछले कुछ महीनों के भीतर ही दुनिया भर के स्टॉक से करीब 19 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है। यह आंकड़े न केवल अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंताजनक हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि अगर ऐसी स्थिति बनी रहती है, तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी कितनी प्रभावित हो सकती है।
क्यों गहराया यह वैश्विक तेल संकट?
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उनका रणनीतिक तेल रिजर्व साल 1990 के बाद से अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। वहीं, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका का इमरजेंसी ऑयल रिजर्व भी पिछले 43 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को वर्साय में आयोजित जी7 (G7) बैठक के दौरान इस गंभीर स्थिति को स्वीकार किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर समय रहते यह जंग खत्म नहीं की जाती, तो हमारे पास मौजूद तेल का इमरजेंसी रिजर्व अगले करीब चार हफ्तों में पूरी तरह खत्म हो जाता। यह बयान बताता है कि स्थिति कितनी नाजुक थी और दुनिया कितने बड़े आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी थी।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के संयुक्त आंकड़ों के मुताबिक, इस समय पूरी दुनिया में औसतन 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है। इस लिहाज से हर महीने करीब 309 करोड़ बैरल और सालभर में करीब 3,760 करोड़ बैरल तेल पैदा होता है। इस उत्पादन और खपत के बीच का संतुलन ही दुनिया को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन मौजूदा संघर्ष ने इस संतुलन को बुरी तरह से बिगाड़ दिया है।
हमें याद रखना चाहिए कि तेल की कीमतें सीधे तौर पर हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं, चाहे वह पेट्रोल-डीजल की कीमत हो या माल ढुलाई और खाद्य पदार्थों की लागत। इस वैश्विक तेल संकट का असर हर घर तक पहुंचता है। अधिक जानकारी के लिए, ब्रेंट क्रूड कीमतों पर बढ़ते दबाव के बारे में पढ़ें।
दुनिया की तेल सप्लाई का गणित और इसका असर
आपको बता दें कि अमेरिका वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और अकेले वैश्विक बाजार के करीब 13 फीसदी कच्चे तेल का उत्पादन करता है। अमेरिका के बाद इस सूची में क्रमशः सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक का नंबर आता है। ये पांचों बड़े देश मिलकर दुनिया की कुल तेल सप्लाई का करीब 40 फीसदी हिस्सा संभालते हैं। यही वजह है कि इन शीर्ष देशों में किसी भी तरह का युद्ध, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध या उत्पादन में मामूली कमी भी सीधे तौर पर वैश्विक बाजार और आम जनता के पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बुरी तरह प्रभावित करती है। एक छोटे से देश में हुई घटना भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकती है, और यह वर्तमान स्थिति इसकी एक दर्दनाक मिसाल है।
ब्रेंट क्रूड के दाम गिरे, पर सामान्य होने में लगेगा वक्त
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार ने बेशक बड़ी राहत की सांस ली है। युद्ध के चरम काल के दौरान जो ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था, वह अब तेजी से गिरकर 80 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गया है। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि कीमतों में आई यह गिरावट पूरी कहानी नहीं बयां करती। यह केवल एक तात्कालिक राहत है, वास्तविक चुनौतियां अभी भी बाकी हैं।
वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज के रास्ते को दोबारा खोलने की घोषणा के बाद भी कच्चे तेल की वास्तविक सप्लाई तुरंत सामान्य नहीं होने वाली है। इसके लिए सबसे पहले समुद्री व्यापारिक रास्तों से बिछाई गई बारूदी सुरंगों को पूरी तरह हटाना होगा। इसके बाद समुद्र में फंसे खाली टैंकरों की सुरक्षित वापसी, तेल उत्पादन को पुराने स्तर पर लाने और पूरी ग्लोबल सप्लाई चेन को फिर से पटरी पर दौड़ाने में लंबा वक्त लगेगा। वैश्विक तेल उद्योग से जुड़े दिग्गजों का मानना है कि इस पूरी व्यवस्था को पूरी तरह सामान्य होने में अभी कई महीने लग सकते हैं, तब तक दुनिया के देशों को अपने मौजूदा सीमित तेल भंडार के सहारे ही काम चलाना होगा। आम जनता को भी इस वैश्विक तेल संकट से पूर्ण रूप से राहत की सांस लेने के लिए अभी लंबा इंतजार करना होगा।


