रांची, 20 अगस्त 2026। रिम्स से जुड़े कथित जमीन और भ्रष्टाचार मामले में गुरुवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया। मामले में गिरफ्तार डेवलपर शुभम साबू को अदालत से जमानत मिल गई। जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की कार्रवाई को लेकर कई सवाल भी उठाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि मामले में अब तक सिर्फ निजी लोगों के खिलाफ ही कार्रवाई क्यों की गई, जबकि कथित तौर पर संबंधित सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ रही है। कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल किया कि निजी व्यक्तियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, लेकिन जिन सरकारी अधिकारियों पर अपने कर्तव्यों के निर्वहन में भूमिका होने की बात कही जा रही है, उनके खिलाफ अब तक कोई समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मामले को करीब आठ महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। कोर्ट की इस टिप्पणी से जांच के दायरे और कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
सरकारी दस्तावेजों के आधार पर किया गया था डेवलपमेंट एग्रीमेंट
शुभम साबू की ओर से अदालत में पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित जमीन को लेकर रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर डेवलपमेंट एग्रीमेंट किया गया था। बचाव पक्ष के मुताबिक, सेल डीड पर सरकारी प्रमाणीकरण और सील मौजूद थी। दस्तावेज में यह भी दर्ज था कि संबंधित जमीन न तो अधिग्रहण के अधीन थी और न ही वन भूमि थी।
बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि संबंधित प्लॉट के लिए Non-Encumbrance Certificate (NEC) जारी किया गया था। दलील दी गई कि डेवलपर ने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों पर भरोसा करते हुए ही जमीन से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधि आगे बढ़ाई।
‘सरकारी रिकॉर्ड गलत होने का अनुमान कैसे लगाया जाए?’
बचाव पक्ष की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि जब जमीन से जुड़े दस्तावेज पंजीकृत थे, उन पर सरकारी स्तर पर प्रमाणीकरण मौजूद था और NEC भी जारी किया गया था, तो डेवलपर के पास यह मानने का कोई आधार नहीं था कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी गलत है।
वकील ने यह भी दलील दी कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में कोई गलती या अनियमितता थी, तो उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, जिन्होंने संबंधित दस्तावेज तैयार किए, उनका सत्यापन किया या उन्हें जारी किया।
सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों से यह सवाल प्रमुखता से सामने आया कि अगर मामले में सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है, तो उनके खिलाफ अब तक गिरफ्तारी या अन्य कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि शुभम साबू की गिरफ्तारी के जरिए उन अधिकारियों की भूमिका से ध्यान हटाया गया, जिनकी कथित भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं की गई। हालांकि, यह बचाव पक्ष की दलील है और इसका स्वतंत्र सत्यापन या अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
जमानत के बाद जांच पर बढ़ा दबाव
शुभम साबू को जमानत मिलने और सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों के बाद रिम्स जमीन मामला एक बार फिर चर्चा में है। कोर्ट के सवालों ने जांच एजेंसी की कार्रवाई के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच को भी केंद्र में ला दिया है।
अब निगाहें ACB की आगे की कार्रवाई पर हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसी मामले में सरकारी अधिकारियों की भूमिका की किस स्तर तक जांच करती है और यदि उनकी जिम्मेदारी सामने आती है तो उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
रिम्स जैसी महत्वपूर्ण सरकारी स्वास्थ्य संस्था से जुड़ी जमीन के मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग भी अहम हो गई है। फिलहाल मामले में अदालत के आदेश और आगे की जांच का इंतजार है। आरोपों और बचाव पक्ष की दलीलों पर अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
इसे भी पढ़े – हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: JPSC 11वीं-13वीं और फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति रद्द करने पर रोक


