हर साल 28 जुलाई से 3 अगस्त तक रहता है शहीदी सप्ताह
वर्षों बाद ना आतंक, ना हिंसा…चारों तरफ शांति
तारीख 3 अगस्त…आज नक्सलियों के शहीदी सप्ताह का आखिरी दिन है..नक्सलियों का शहीदी सप्ताह जो हर साल 28 जुलाई से 3 अगस्त तक मनाया जाता है. आपको इस बार यह बात इसलिए महत्वपूर्ण नहीं लगी क्योंकि झारखंड से आतंकियों का सफाया किया जा चुका है. हर साल 27 जुलाई को मीडिया की सूर्खियों में नक्सलियों का शहीदी सप्ताह रहता था. पर्चे फेके जाते थे, पुलिस मुख्यालय की तरफ से अलर्ट जारी किया जाता था, रेलवे पटरियां, पुलिस चेकपोस्ट पर सुरक्षा बढ़ाई जाती थी इसके अलावा पूरा राज्य करीब करीब सील कर दिया जाता था. इसके बावजूद भी राज्य के किसी ना किसी कोने से नक्सली हिंसा की खबर आती ही रही है. लेकिन, इस बार य पूरा सप्ताह शांति से गुजर गया जो यह साबित करता है कि झारखंड से नक्सलियों की जड़ें खोद दी गयी हैं. राज्य में नक्सलियों के शीर्ष नेता या तो पकड़े जा चुके हैं या मारे जा चुके हैं. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि वर्ष 2026 में आत्मसमर्पण, मुठभेड़ों, शीर्ष कमांडरों की गिरफ्तारी और लगातार चल रहे अभियानों ने झारखंड में नक्सली संगठन के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है.
सशक्त नेतृत्व, सुदृढ़ इच्छाशक्ति और ठोस निणर्य से हुआ संभव
झारखंड को नक्सलियों से मुक्त करना इतना आसान नहीं था. इसके लिए सशक्त नेतृत्व सुदृढ़ इच्छाशक्ति और ठोस निणर्य की जरुरत थी तभी जाकर यह संभव हो पाता. इस पूरे अभियान को तेजी में लाने का श्रेय झारखंड पुलिस की डीजीपी तदाशा मिश्रा और सीआरपीएफ के आईजी साकेत कुमार सिंह और उनकी पूरी टीम को जाता है. नक्सलियों के गढ़ में अपने स्पाई की इंट्री से लेकर उनके सरेंडर, गिरफ्तारी और इनकाउंटर तक झारखंड पुलिस ने जबरदस्त काम किया. पूर्व आईजी आपरेशन अमोल वेणुकांत होमकर, वर्तमान आईजी आपरेशन नरेन्द्र कुमार सिंह, एसटीएफ आईजी अनूप बिरथरे ने इस पूरे अभियान मेें जबरदस्त भूमिका निभाई. खास तौर पर नक्सलग्रस्त जिलों की कमान संभालने वाले एसपी अधिकारी जैसे चाईंबासा एसपी अमित रेणु, गिरीडीह एसपी डा. विमल कुमार समेत कई आईपीएस अधिकारियों ने दिन रात काम किया.
शहीदी सप्ताह से जुड़ी मुख्य बातें
- हर साल 28 जुलाई से 3 अगस्त
- उद्देश्य: मुठभेड़ों या अन्य कारणों में मारे गए नक्सलियों को श्रद्धांजलि देना, ग्रामीणों के बीच जनसभाएं करना, और संगठन का प्रचार करना.
- गतिविधियाँ: पोस्टर-बैनर लगाना, पर्चे बांटना, और सरकारी संपत्ति (सड़क, पुल, रेलवे) को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करना.
- यह एक विवादास्पद अभियान रहा है, जिसमें माओवादी अपने मारे गए साथियों को याद करते हैं, नए कैडर जुटाने का प्रयास करते हैं, और अक्सर हिंसा व तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम देते हैं.
सुरक्षा और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
- हाई अलर्ट: इस अवधि के दौरान झारखंड, छत्तीसगढ़ और अन्य प्रभावित राज्यों में पुलिस मुख्यालय और सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) पूरी तरह सतर्क रहते हैं.
- सख्ती: सुरक्षा बलों की पैनी नजर और लगातार अभियानों के कारण हाल के वर्षों में इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों का प्रभाव कमजोर हुआ है और कई इलाकों में यह बेअसर साबित हुआ है.
नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारू मजूमदार समेत 150 नक्सलियों को करते हैं याद
1971 से 72 के बीच पश्चिम बंगाल में पुलिस कार्रवाई में नक्सल आंदोलन के संस्थापक नेता चारू मजूमदार और सरोज दत्त की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी, जबकि 150 अन्य नक्सली मारे गए थे. इन सबके मौत की तिथियां 28 जुलाई से 13 अगस्त के बीच है. इसके बाद से इन सभी की मौत को माओवादी शहादत बताते हुए माओवादी शहादत सप्ताह मनाकर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश करते रहे हैं. माओवादी बताते हैं कि उनके आंदोलन को कुचलने के लिए एक साजिश के तहत उनके बड़े नेताओं की हत्या की गई. इसलिए इन तिथियों को अपने आंदोलन को और तेज कर यह बताने की कोशिश होती है कि आंदोलन अब भी मरा नहीं है. अपने नेताओं को लाल सलाम कह इस दौरान माओवादी उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं.
28 जुलाई को हुई थी चारू मजूमदार की मौत
25 मई 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी बेंगाईजोत में जोतदारों के हक में सशस्त्र आंदोलन का शुभारंभ हुआ था. इस आंदोलन को कुचलने के लिए 16 जुलाई 1972 को चारू मजूमदार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. 28 जुलाई 72 को उन्हें मृत घोषित किया गया. माओवादी नेताओं का आरोप रहा है चारू मजूमदार की मौत कैसे हुए इस रहस्य पर से भी पुलिस ने कभी पर्दा नहीं उठाया. साथ ही उन्हें गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट भी नहीं ले जाया गया. इसी प्रकार 5 अगस्त 1971 को नक्सली आंदोलन के राज्य सचिव सरोज दत्त मारे गए. माओवादी कहते रहे हैं को कोलकाता मैदान में गला काटकर मार डाला गया. इसे फिल्म अभिनेता उत्तम कुमार ने अपनी आंखों से देखा था. इसी प्रकार काशीपुर बरानगर में 1971 में 150 अन्य नक्सली भी मारे गए थे. यह घटना 12 व 13 अगस्त को हुई थी. शहीद सप्ताह में इन सबको श्रद्धांजलि दी जाती है.
सारंडा के बीहड़ों में शांति की बयार
एक समय था जब सारंडा के बीहड़ों में अक्सर बम धमाकों की आवाज सुनाई पड़ती थी इस बार सारंडा के बीहड़ों में शांति की बयार बर रही है. विकास की रफ्तार को तेज करने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं. सारंडा में सक्रिय अधिकांश नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, कई गिरफ्तार कर लिए गए तो कई एनकाउंटर में मारे गए. नक्सलियों के पोलित ब्यूरो सदस्यों से लेकर कैडर तक के लोगों ने हथियार डाल दिए हैं.
नक्सलियों का कब्जा खत्म
एशिया के सबसे बड़े साल वन क्षेत्र सारंडा का नाम सुनते ही लोगों के मन में दहशत पैदा हो जाती थी. घने जंगलों में आए दिन आईईडी और लैंडमाइंस के धमाके गूंजते थे. नक्सलियों ने सुरक्षाबलों की आवाजाही रोकने और पूरे इलाके में अपना खौफ कायम रखने के लिए सड़कों, पगडंडियों और जंगल के रास्ते में बड़ी संख्या में विस्फोटक दबा रखे थे. लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के लगातार अभियानों के बाद नक्सलियों का सारंडा पर कब्जा लगभग समाप्त हो गया है.
बिना हैंडलर बेकार हो जाते है विस्फोटक: सीआरपीएफ आईजी
सीआरपीएफ आईजी साकेत सिंह ने बताया कि नक्सलियों के द्वारा जमीन के नीचे जो भी आईईडी प्लांट किए जाते हैं, उसमे सर्किट और बैटरी भी होते हैं. अगर बैटरी को छह महीने तक बदला न जाए तो विस्फोटक अपने आप निष्क्रिय हो जाते हैं. किसी भी विस्फोटक में धमाका करने के लिए उसके हैंडलर और बैटरी की जरूरत होती है. अगर बैटरी नहीं बदली जाए तो साल छह महीने में विस्फोटक अपने आप निष्क्रिय हो जाते हैं. इसके अलावा मिट्टी के अंदर पड़े रहने से कई आईईडी और अन्य विस्फोटकों की क्षमता कमजोर हो जाती है. नमी, बारिश और मौसम के प्रभाव से उनके इलेक्ट्रॉनिक हिस्से और डेटोनेशन सिस्टम खराब होने लगते हैं, हालांकि पुलिस अफसरों का यह भी कहना है कि ऐसे विस्फोटकों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता. अधिकारियों का कहना है कि सारंडा में नक्सलियों का प्रभाव खत्म हो चुका है. जिन इलाकों में कभी नक्सलियों की समानांतर व्यवस्था चलती थी, वहां अब सड़क, पुल, स्कूल, मोबाइल टावर और अन्य विकास कार्य तेजी से हो रहे हैं. ग्रामीण अब बिना किसी बड़े डर के अपने दैनिक कार्य कर रहे हैं और जंगल के भीतर भी प्रशासन की पहुंच पहले की तुलना में काफी बढ़ी है.
2021 से लेकर 2026 तक चला जबरदस्त अभियान
सारंडा में झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए लगातार अभियानों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है. सुरक्षा में लगे जवान यह जानते थे कि जब तक नक्सलियों के द्वारा लगाए गए आईईडी बमों को निष्क्रिय नहीं किया जाएगा, तब तक उन तक पहुंचना बेहद मुश्किल भरा काम है. यही वजह है कि साल 2021 से लेकर 2026 तक झारखंड जगुआर के आधा दर्जन बम निरोधक दस्ते ने जबरदस्त काम किया, विस्फोटक खोजने में दक्ष डॉग स्क्वॉड के साथ सैकड़ों की संख्या में बम को जंगल से खोजा गया और उन्हें नष्ट किया गया. इस दौरान कई जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी, कई घायल हुए, जबकि बेहद ट्रेंड डॉग स्क्वायड के कुछ डॉग भी शहीद हुए.
2,163 आईईडी और 1,903 किलो विस्फोटक नष्ट
वर्ष 2021 से 30 जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के ठिकानों और जंगलों से बड़ी मात्रा में आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस), लैंड माइंस, विस्फोटक सामग्री और हथियार बरामद किए हैं. इन बरामदगियों ने कई बड़े नक्सली हमलों को होने से पहले ही विफल कर दिया था.आंकड़ों के मुताबिक, छह वर्षों में 2163 आईईडी और लैंड माइंस बरामद किए गए. इसके अलावा 1903 किलोग्राम विस्फोटक पदार्थ भी जब्त किया गया.
50 नक्सलियों के आत्मसमर्पण, 17 के एनकाउंटर
वर्ष 2026 में सुरक्षाबलों के लगातार अभियानों ने नक्सल संगठन की कमर तोड़ दी है. एक ओर जहां करीब 50 सक्रिय नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, वहीं अलग-अलग अभियानों में 17 नक्सली मारे गए. इसके साथ ही एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी ने संगठन को बड़ा झटका दिया है.पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इन घटनाओं के बाद सारंडा में नक्सलियों की संगठित मौजूदगी लगभग समाप्त हो चुकी है, जो कुछेक नक्सली बचे हैं, वे भी लगातार जंगल छोड़कर दूसरे राज्यों की ओर भाग रहे हैं या छिपने को मजबूर हैं. खुफिया एजेंसियों के अनुसार, एक करोड़ रुपये का इनामी माओवादी असीम मंडल भी अपने कुछ साथियों के साथ सारंडा छोड़ चुका है. लगातार चल रहे ऑपरेशन, सुरक्षाबलों की बढ़ती घेराबंदी और संगठन के कमजोर होते नेटवर्क के कारण उसने अपना सुरक्षित ठिकाना छोड़ दिया है.
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