सत्ता और जेपीएससी ने मिलकर रौंदा छात्रों का भविष्य
26 साल में 14 परीक्षाएं, अधिकांश में विवाद और भ्रष्टाचार
उम्मीदों से विवादों तक की यात्रा
पंकज
“हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए…”
कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ उस दौर में झारखंड की जनता के दिल की आवाज़ बन गई थीं, जब 15 नवंबर 2000 को एक नए राज्य का जन्म हुआ. यह सिर्फ प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, बल्कि एक उम्मीद थी—अपनी माटी, अपने जंगल, अपने संसाधनों और अपने लोगों के लिए एक नई शुरुआत की उम्मीद थी. झारखंड के निर्माण के साथ एक नई ऊर्जा, युवाओं में जोश , समाज में उम्मीद और शासन से पारदर्शिता की अपेक्षा छुपी थी. अविभाजित बिहार के अनुभव, खासकर चारा घोटाले जैसे मामलों ने यह एहसास गहरा कर दिया था कि इस क्षेत्र के साथ न्याय नहीं हुआ. अलग राज्य बनने का मूल आधार ही यही था कि अब विकास और अवसरों का संतुलित वितरण होगा. पहली जेपीएससी से लेकर अब तक हुई सिविल सेवा परीक्षा पर कभी करप्शन पर विवाद तो कभी आरक्षण को लेकर जेपीएससी के अभ्यर्थियों ने जोरदार आंदोलन किया है. जेपीएससी की विभिन्न परीक्षाओं को लेकर 42 से ज्यादा मामले कोर्ट में चल रहे हैं. वहीं कई एग्जाम की सीबीआई जांच चल रही है.
जेपीएससी को उम्मीदों का संस्थान मानकर इस सपने को साकार करने के लिए बनी एक अहम संस्था माना गया. झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी), इसका उद्देश्य स्पष्ट था—राज्य के विभिन्न विभागों में योग्य और प्रतिभाशाली युवाओं का चयन, वह भी पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से. जेपीएससी की जिम्मेदारियाँ केवल परीक्षा आयोजित करना भर नहीं हैं, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक रीढ़ तैयार करने का काम करता है. यानी, जो अफसर आज निर्णय लेते हैं, नीतियाँ बनाते हैं, और शासन चलाते हैं—उनकी पहली सीढ़ी यही आयोग है. इसलिए, जेपीएससी की विश्वसनीयता सीधे-सीधे राज्य की प्रशासनिक गुणवत्ता से जुड़ी होती है.
राज्य के पहले सीएम और मुख्य सचिव के बीच दरार
झारखंड गठन के बाद वर्ष 2002 में जेपीएससी का गठन हुआ था और वर्ष 2003 में पहली जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की गयी थी. झारखंड लोक सेवा आयोग की ओर से ली गई इस परीक्षा में 64 सीट थी. 2 साल बाद 2005 में 172 सीटों के लिए जेपीएससी ने परीक्षा का आयोजन किया और शुरू से ही जेपीएससी विवादों के घेरे में आ गया. राज्य गठन के बाद यह उम्मीद थी कि नई संस्थाओं की नींव ईमानदारी और पारदर्शिता पर रखी जाएगी. लेकिन जेपीएससी की कहानी शुरू होते ही एक कहावत सच होती दिखी—”सिर मुंडाते ही ओले पड़ना.” आयोग के गठन और उसके सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरुआत से ही विवाद सामने आने लगे. सबसे चर्चित मामला एक ऐसे अधिकारी की नियुक्ति का था, जिनकी योग्यता और छवि दोनों पर सवाल थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और मुख्य सचिव विजय शंकर दूबे के बीच इस नियुक्ति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए। सूत्रों के अनुसार, मुख्य सचिव ने इस नियुक्ति का विरोध किया और इसे रोकने के लिए तत्कालीन राज्यपाल प्रभात कुमार से भी हस्तक्षेप की मांग की.
सिस्टम फेल और पावर गेम शुरु
आखिरकार, राज्यपाल की असहमति के चलते वह नियुक्ति नहीं हो सकी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—क्या झारखंड की सबसे महत्वपूर्ण चयन संस्था की नींव ही विवादों के बीच रखी जा रही थी? इस घटना ने सिस्टम में ‘सिस्टम फेल’ और पावर गेम की शुरुआत कर दी. जेपीएससी से जुड़ी अनियमितताओं की चर्चा समय के साथ और तेज होती गई. भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, परीक्षा परिणामों पर सवाल, और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दे बार-बार सामने आने लगे.
पब्लिक सर्विस के बजाया पर्सनल एडवांटेज
राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में भी अस्थिरता देखने को मिली. झारखंड में अब तक कई मुख्य सचिवों का बदलना, कार्य-संस्कृति पर सवाल उठाता है. आरोप लगे कि कई नियुक्तियाँ योग्यता के बजाय ‘सिस्टम’ और ‘संपर्क’ के आधार पर हुईं.
धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि ‘पावर’ का इस्तेमाल ‘पब्लिक सर्विस’ के बजाय ‘पर्सनल एडवांटेज’ के लिए होने लगा है.
युवा और टूटती उम्मीदें, झारखंड का युवा, जो कभी इस राज्य के निर्माण का सबसे बड़ा समर्थक था, अब सबसे बड़ा सवालकर्ता बनता जा रहा है. हर साल हजारों छात्र जेपीएससी की तैयारी करते हैं, सालों की मेहनत लगाते हैं, लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में हो, तो भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है.
कई अभ्यर्थियों का कहना है कि सिर्फ परीक्षा पास करना ही काफी नहीं है, बल्कि सिस्टम को भी पार करना पड़ता है—और यही सबसे बड़ी चुनौती है.
