रांची: झारखंड में स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए चलाया जा रहा हाउसहोल्ड सर्वे कई जिलों में तय समय पर पूरा नहीं हो सका। स्थिति यह है कि राज्य के 14 जिलों के 1,322 स्कूलों में सर्वे अधूरा है। इनमें 870 स्कूल ऐसे हैं, जहां सर्वे शुरू तक नहीं हुआ, जबकि 452 स्कूलों में काम शुरू होने के बाद बीच में रुक गया।

सर्वे की धीमी प्रगति को लेकर अब विभाग ने जिम्मेदारी तय करनी शुरू कर दी है। राज्य परियोजना निदेशक शशि रंजन ने कुल 2,470 शिक्षकों और 56 अधिकारियों को शोकॉज नोटिस जारी किया है। सभी को 28 सितंबर तक स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया है। तय समय पर जवाब नहीं देने पर वेतन रोकने की कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
दुमका और पलामू में सबसे ज्यादा स्कूल पीछे
जिलावार आंकड़ों में दुमका सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां 535 स्कूलों में सर्वे पूरा नहीं हुआ है। इसके बाद पलामू के 379 और पाकुड़ के 140 स्कूल हैं।
वहीं देवघर में 57, गोड्डा में 51, गिरिडीह में 45 और लोहरदगा में 34 स्कूलों में सर्वे अधूरा है। साहिबगंज के 30, पश्चिमी सिंहभूम के 27, गुमला के नौ और खूंटी के सात स्कूल भी तय लक्ष्य पूरा नहीं कर सके हैं। लातेहार के चार तथा धनबाद और गढ़वा के दो-दो स्कूलों में भी सर्वे का काम बाकी है।
1,930 शिक्षकों ने शुरू ही नहीं किया सर्वे
राज्य स्तर पर सर्वे पूरा नहीं कर पाने वाले 2,470 शिक्षकों में 1,930 ने काम शुरू ही नहीं किया, जबकि 540 शिक्षकों ने सर्वे शुरू करने के बाद उसे पूरा नहीं किया।
शिक्षकों की संख्या के मामले में भी दुमका सबसे आगे है, जहां 1,027 शिक्षक सर्वे पूरा नहीं कर सके। पलामू में 722 और पाकुड़ में 278 शिक्षक इस सूची में शामिल हैं।
एक बार पहले भी मांगा गया था जवाब
सर्वे की धीमी रफ्तार को लेकर राज्य कार्यालय की ओर से 27 अगस्त को भी जिलों से स्पष्टीकरण मांगा गया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, रांची को छोड़कर किसी अन्य जिले के जिला शिक्षा अधीक्षक की ओर से जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद विभाग ने दोबारा जिम्मेदारी तय करते हुए संबंधित अधिकारियों और शिक्षकों को शोकॉज जारी किया।
सर्वे के बाद बच्चों को स्कूल तक लाने की चुनौती
हाउसहोल्ड सर्वे का मकसद सिर्फ स्कूल से बाहर बच्चों की संख्या जुटाना नहीं, बल्कि उनकी पहचान के बाद उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ना भी है। इसके लिए एसएमसी और पीटीएम स्तर पर भी जिम्मेदारी तय की गई है।
हालांकि, बैठकों के बावजूद ड्रॉप बॉक्स में दर्ज ड्रॉपआउट बच्चों और पहले से चिह्नित स्कूल से बाहर बच्चों की सूची पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो सकी। अभिभावकों से संपर्क कर बच्चों का दोबारा नामांकन कराने की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ी।
विभाग ने इसे गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों और शिक्षकों से जवाब मांगा है। अब 28 सितंबर तक मिलने वाले स्पष्टीकरण के बाद यह स्पष्ट होगा कि सर्वे का काम तय समय पर पूरा नहीं होने के पीछे क्या वजह रही और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।
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