रंगमंच, सिनेमा और भारतीय क्रांति गीतों के अमिट हस्ताक्षर पीयूष मिश्रा के ये कालजयी बोल आज सिर्फ किसी कविता का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि सड़कों पर अपने हक, पारदर्शी परीक्षाओं और रोजगार की मांग कर रहे युवाओं के जीवन की कड़वी और जीवंत हकीकत बन चुके हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के खिलाफ जारी छात्रों के प्रदर्शन को जब प्रसिद्ध रंगकर्मी, अभिनेता और गीतकार पीयूष मिश्रा का साथ मिला, तो इस आंदोलन में केवल वैचारिक ताकत ही नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक और नैतिक बल भी जुड़ गया। पीयूष मिश्रा ने न केवल छात्रों से मुलाकात की और उनकी मांगों को जायज ठहराया, बल्कि उनके साथ बैठकर उनके संघर्ष का हिस्सा बनने का ऐलान भी किया।
क्रांति, कविता और संघर्ष: जब आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंचे पीयूष मिश्रा, जीवंत हुई ‘चांद और रोटी’ की पंक्तियां
”एक बगल में चांद होगा, एक बगल में रोटियां…
एक बगल में नींद होगी, एक बगल में लोरियां...”
‘आरम्भ है प्रचंड’ से ‘जीत की हवस नहीं’ तक: संघर्ष का नया प्रतीक
पीयूष मिश्रा का गीत ‘आरम्भ है प्रचंड’ सालों से आंदोलनों, युवाओं के जोश और परिवर्तन की चाह का अनधिकृत राष्ट्रगान रहा है। इसकी लाइन ‘जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िंदगी है ठोकरों पे मार दो…’ आज सड़कों पर रातें बिता रहे उन युवाओं के जज्बे को हूबहू बयां करती है, जो अपने भविष्य और स्वाभिमान के लिए व्यवस्था की बेरुखी से टकरा रहे हैं।
जब पीयूष मिश्रा खुद इन आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंचे, तो वहां का माहौल भावनात्मक और ऊर्जा से भर गया। छात्रों ने तालियों और नारों के बीच उनके ही गीतों से उनका स्वागत किया। पीयूष मिश्रा ने छात्रों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि यह संघर्ष केवल परीक्षा या नौकरी का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सम्मान और पारदर्शिता का है
‘एक बगल में चांद, एक बगल में रोटियां’: सड़कों पर उतरी कविता की कड़वी सच्चाई
कविताओं में जब चांद और रोटी का जिक्र आता है, तो वह आदर्शवादी लगता है, लेकिन रांची के राजभवन और मुख्य सड़कों पर धरना दे रहे युवाओं के लिए यह दैनिक जीवन का सच बन चुका है।
एक तरफ सपने (चांद): महीनों की कड़ी मेहनत, बड़े अफसर या कर्मचारी बनने की उम्मीद और परिवार का नाम रोशन करने का सपना।
दूसरी तरफ संघर्ष (रोटियां): सड़कों पर टेंट के नीचे गुजारी जा रही रातें, अनशन, खाने-पीने का अभाव और अनिश्चित भविष्य की चिंता।
प्रदर्शन स्थल पर छात्रों के हाथों में किताबें, पेट में भूख और आंखों में बदलाव की चमक देखकर पीयूष मिश्रा भी भावुक नज़र आए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब देश का युवा सड़क पर रातें काटने को मजबूर हो जाए, तो समाज के हर वर्ग को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए।
पीयूष मिश्रा का संदेश:
“मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि मुंबई में बैठकर हम खामोश थे। मैं यहां किसी नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक कलाकार और नागरिक के रूप में आपके साथ बैठने आया हूं। आपकी लड़ाई जायज है और जब तक अहिंसक और अनुशासित तरीके से हक़ की आवाज़ उठाई जाएगी, देश का हर संवेदनशील व्यक्ति आपके साथ खड़ा रहेगा।”
आंदोलन को मिला नैतिक और रसद का सहारा
पीयूष मिश्रा ने केवल मंच पर खड़े होकर भाषण देने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने आंदोलन कर रहे छात्रों को चिकित्सा, राशन, गद्दे और वित्तीय सहायता (Financial Support) प्रदान करने का भरोसा दिया।
उन्होंने अपने साथी कलाकारों और नागरिक समाज से अपील की कि वे आगे आएं और इन संघर्षरत छात्रों की मदद करें। इसके साथ ही उन्होंने छात्रों से यह खास अपील भी की कि वे अपने आंदोलन की पवित्रता, शांति और अनुशासन को बनाए रखें और इसमें किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप या अराजकता को हावी न होने दें।
क्यों सुलग रही है छात्रों के गुस्से की आग?
झारखंड की राजधानी रांची सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) जैसी प्रमुख भर्ती परीक्षाओं में धांधली, कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में देरी के आरोपों को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलनरत हैं।
छात्रों की मुख्य मांगे हैं:
कथित पेपर लीक और गड़बड़ियों की CBI और ED से निष्पक्ष जांच।
पूरी चयन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता।
दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई और समयबद्ध परीक्षा कैलेंडर।
हालांकि सरकार और प्रशासन की ओर से प्रतिनिधिमंडलों से बातचीत की कोशिशें की गई हैं, लेकिन जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक छात्रों का सत्याग्रह जारी रखने का संकल्प कायम है।
जब कला सड़कों पर उतरकर क्रांति बन जाती है
इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हुआ है, तब-तब कला और साहित्य ने उसे दिशा और धार दी है। पीयूष मिश्रा का आंदोलनकारी छात्रों के बीच जाना इस बात की याद दिलाता है कि फिल्में और गीत केवल थिएटरों और एयरकंडीशंड कमरों के लिए नहीं होते—उनकी असली कसौटी ज़मीन होती है।
’आरम्भ है प्रचंड’ के सुरों के साथ अब रांची और देश के अन्य हिस्सों में गूंज रहा यह छात्र आंदोलन प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि जब सपने (चांद) और अस्तित्व (रोटी) पर बात आ जाए, तो युवा पीछे हटने वाले नहीं हैं
