Friday, October 16

गुमला: तस्वीर गुमला के एक ऐसे गांव की है, जहां सड़क आज भी सिर्फ एक जरूरत नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का रास्ता बनी हुई है। जब गांव में कोई बीमार पड़ता है तो एंबुलेंस के पहुंचने का इंतजार नहीं किया जा सकता। मरीज को पहले ग्रामीणों के कंधों पर गांव से बाहर निकालना पड़ता है। इसके बाद कहीं जाकर उसे वाहन और अस्पताल की सुविधा मिल पाती है।

रायडीह प्रखंड के सुरसांग थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत पो, कोब्जा के राजस्व ग्राम रमजा कर बेन्दवाकोना गांव में विकास की जमीनी हकीकत कुछ ऐसी ही है। गांव में पक्की सड़क नहीं है। बिजली की सुविधा नहीं है और पेयजल की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब किसी ग्रामीण को अचानक इलाज की जरूरत पड़ती है।

बीमार महिला को कंधों पर लेकर निकले ग्रामीण

हाल ही में 24 वर्षीय बृन्दावती देवी, पति गणेश सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिवार के सामने उन्हें तत्काल सदर अस्पताल गुमला ले जाने की जरूरत थी। लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण कोई वाहन वहां तक नहीं पहुंच सकता था।

आखिरकार ग्रामीणों ने गेडुवा भार तैयार किया और बृन्दावती देवी को उसमें बैठाकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल ढोया। ऊबड़-खाबड़ रास्ते और पगडंडियों को पार करने के बाद ग्रामीण उन्हें मुख्य सड़क तक लेकर पहुंचे। वहां से निजी वाहन की मदद से उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

यह सिर्फ एक मरीज को अस्पताल पहुंचाने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर भी है, जहां इलाज तक पहुंचने से पहले मरीज और उसके परिवार को सड़क की लड़ाई लड़नी पड़ती है।

जिस मरीज के घर तक एंबुलेंस पहुंचनी चाहिए थी, उसे अस्पताल की राह पकड़ने के लिए पहले ग्रामीणों के कंधों का सहारा लेना पड़ा।

न सड़क, न बिजली, न साफ पानी

ग्रामीण ब्रजनाथ सिंह के अनुसार, बेन्दवाकोना में आज भी बिजली की सुविधा नहीं पहुंची है। शाम ढलते ही घरों में डिबरी की रोशनी ही सहारा बनती है। पेयजल की स्थिति भी बेहतर नहीं है। ग्रामीण डाड़ी-चुआं के पानी पर निर्भर हैं।

बारिश के दिनों में गांव की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। कच्चे और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर आना-जाना ग्रामीणों के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसे में बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिला, बुजुर्ग या छोटे बच्चों को गांव से बाहर ले जाना किसी जोखिम से कम नहीं है।

विकास के दावों के बीच कई सवाल खड़ा करती है यह तस्वीर

सरकार गांव-गांव तक सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती है। ग्रामीण इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाएं भी चल रही हैं। लेकिन बेन्दवाकोना की तस्वीर इन दावों के सामने कई सवाल खड़े करती है।

अगर आज भी एक बीमार महिला को दो किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ रहा है, तो विकास की उन योजनाओं का लाभ इस गांव तक कब पहुंचेगा?

आखिर कितनी और ऐसी तस्वीरों के बाद गांव तक सड़क पहुंचेगी? कब ग्रामीणों को यह भरोसा मिलेगा कि बीमारी की स्थिति में एंबुलेंस उनके दरवाजे तक पहुंच सकती है? और कब डिबरी की जगह घरों में बिजली की रोशनी और डाड़ी-चुआं की जगह सुरक्षित पेयजल उपलब्ध होगा?

बेन्दवाकोना के ग्रामीणों की परेशानी सिर्फ सुविधाओं की कमी नहीं है। यह उस दूरी की कहानी है, जो आज भी गांव और सरकारी दावों के बीच बनी हुई है। सरकार की योजनाएं कागज पर कितनी भी मजबूत क्यों न हों, जब तक उनका असर गांव की पगडंडी तक नहीं पहुंचता, तब तक विकास का दावा अधूरा ही रहेगा।

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