Tuesday, October 13

रांची: किसी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचने वाला मरीज और उसका परिवार सबसे पहले भरोसा लेकर जाता है – कि डॉक्टर उसकी हालत समझेंगे और समय पर जरूरी इलाज मिलेगा। लेकिन रांची के मेदांता अस्पताल से जुड़े एक मामले ने इसी भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मेदांता अस्पताल के दो डॉक्टर्स पर मौत बांटने के आरोप लग रहे हैं. ये वो डाक्टर्स हैं जिनके नाम और शाख के कारण दूर दराज के लोग इलाज के लिए मेदांता पहुंचते हैं लेकिन बदले में मिलने लगी है मौत।

जिस अस्पताल में एक पूर्व IPS के साथ चिकित्सा पद्धतियों को फॉलो नहीं होने के कारण उनकी मौत हो जाए वहां एक आम आदमी भला की भला क्या हालत होती होगी यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

मामला 75 वर्षीय पूर्व आईपीएस अधिकारी मदन मोहन ओझा की मौत से जुड़ा है, जिसमें उनके बेटे निशांत शेखर ने अस्पताल और डॉक्टरों पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं।

मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है। 14 अगस्त 2026 को रांची की अदालत ने इस मामले में डॉक्टर नीरज प्रसाद और डॉक्टर तेजवीर सिंह के खिलाफ संज्ञान लेते हुए समन जारी करने का निर्देश दिया है। यानी अब यह मामला केवल परिवार के आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ चुका है।

सीने में दर्द और सांस की तकलीफ के बाद मेदांता पहुंचे थे मदन मोहन ओझा

परिजनों के मुताबिक, 2 अप्रैल 2025 को तबीयत बिगड़ने के बाद मदन मोहन ओझा को रांची के मेदांता अस्पताल लाया गया था। उन्हें सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी और बेचैनी की शिकायत थी। परिवार का कहना है कि इससे ठीक एक दिन पहले यानी 1 अप्रैल को उन्हें हार्ट अटैक आया था, इसलिए उनकी हालत को लेकर परिजन पहले से चिंतित थे।

ओझा की उम्र करीब 75 वर्ष थी और वे अपनी पत्नी तथा बेटे के साथ अस्पताल पहुंचे थे। परिवार का आरोप है कि गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने मरीज को ICU या कार्डियक इमरजेंसी में भर्ती करने का आग्रह किया, लेकिन उनकी मांग पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई।

परिजनों के अनुसार, मरीज को कई घंटे तक OPD में ही रखा गया। इसी दौरान उनकी हालत बिगड़ती चली गई। परिवार का दावा है कि इलाज कर रहे डॉक्टरों से बार-बार मरीज को ICU में शिफ्ट करने की मांग की गई, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

कार्डियक इमरजेंसी की जगह दूसरी यूनिट में भेजने का आरोप

मामले में परिवार की ओर से एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। बेटे निशांत शेखर के मुताबिक, उनके पिता की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें कार्डियक इमरजेंसी में तत्काल चिकित्सा मिलनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें न्यूरो और ऑर्थोपेडिक विभाग की ओर भेज दिया गया।

परिवार का कहना है कि जिस समय मरीज को तत्काल और विशेषज्ञ चिकित्सा की जरूरत थी, उस दौरान इलाज में हुई देरी उनकी हालत पर भारी पड़ी।

आरोप है कि करीब साढ़े चार बजे के आसपास मदन मोहन ओझा की ओपीडी में ही मौत हो गई।

क्या CGHS कार्ड बना वजह? परिवार ने उठाया गंभीर सवाल

इस पूरे मामले में CGHS कार्ड भी एक अहम मुद्दा बनकर सामने आया है। मदन मोहन ओझा CGHS के लाभार्थी थे। उनके बेटे का आरोप है कि CGHS कार्ड के कारण अस्पताल प्रशासन ने मरीज को भर्ती करने और आवश्यक उपचार देने में रुचि नहीं दिखाई।

परिवार की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों में अलग नजर से देखा जाता है?

परिवार ने कानूनी रास्ता अपनाया

मदन मोहन ओझा की मौत के बाद उनके बेटे निशांत शेखर ने मामले को लेकर कानूनी कार्रवाई शुरू की। परिवार की ओर से डॉक्टरों को 30 अप्रैल 2025 को कानूनी नोटिस भेजे जाने की बात कही गई है।

अब 14 अगस्त 2026 को अदालत द्वारा डॉक्टर नीरज प्रसाद और डॉक्टर तेजवीर सिंह के खिलाफ संज्ञान लिए जाने के बाद मामले में आगे न्यायिक कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

आए दिन आरोप लगते हैं लेकिन मामले दबा दिए जाते हैं:

डॉक्टर नीरज प्रसाद का नाम इससे पहले भी सामने आया था

मदन मोहन ओझा का मामला सामने आने के बाद मेदांता और डॉक्टर नीरज प्रसाद से जुड़ा एक पुराना मामला भी चर्चा में आ गया है।

यह मामला एक महिला मरीज की मौत से जुड़ा था। महिला के बेटे मोहम्मद शमीम ने मेदांता अस्पताल और डॉक्टरों पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया था। इस मामले में उन्होंने ओरमांझी थाना में लिखित शिकायत भी दी थी।

पुराने मामले में परिवार ने लगाया था इलाज में लापरवाही का आरोप

उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, महिला को सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी और गंभीर डायबिटीज की शिकायत थी। उन्हें 13 सितंबर को कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नीरज प्रसाद की देखरेख में भर्ती कराया गया था और क्रिटिकल केयर यूनिट में इलाज किया गया था।

मरीज के बेटे मोहम्मद शमीम ने आरोप लगाया था कि उनकी मां का इलाज ठीक से नहीं किया गया और इसी वजह से उनकी मौत हुई। परिवार ने इसे चिकित्सा लापरवाही का मामला बताया था।

दो अलग मामले, एक ही डॉक्टर का नाम

यहीं से पूरा मामला और गंभीर सवाल खड़े करता है। एक तरफ मदन मोहन ओझा की मौत का मामला है, जिसमें परिवार ने इलाज में देरी, आईसीयू में भर्ती नहीं करने और उचित चिकित्सा नहीं मिलने के आरोप लगाए हैं और अब अदालत ने दो डॉक्टरों के खिलाफ संज्ञान लिया है।

दूसरी तरफ मोहम्मद शमीम की मां की मौत का पुराना मामला है, जिसमें परिवार ने डॉक्टर और अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाया था, जबकि अस्पताल ने इन आरोपों को खारिज किया था। इस मामले में भी डॉक्टर नीरज प्रसाद का नाम सामने आया था।

मदन मोहन ओझा के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मरीज को पहले ही हार्ट अटैक आ चुका था और वह सीने में दर्द, सांस की तकलीफ और बेचैनी की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचा था, तो उसकी स्थिति का आकलन किस स्तर पर किया गया? उसे तत्काल कार्डियक इमरजेंसी में भर्ती क्यों नहीं करवाया गया ? परिजनों द्वारा आईसीयू में भर्ती करने की मांग पर पर्याप्त गंभीरता क्यों नहीं दिखाई गई? क्या CGHS जैसे सरकारी स्वास्थ्य कवरेज वाले मरीज के साथ इलाज की प्रक्रिया में भेदभाव किया जाता है ?

मरीज अस्पताल में सिर्फ इलाज के लिए नहीं, भरोसे के लिए भी पहुंचता है। मदन मोहन ओझा के परिवार द्वारा लगाए गए आरोप और अदालत की ओर से मामले में आगे बढ़ी कार्रवाई इस भरोसे की कसौटी पर मेदांता की व्यवस्था को खड़ा करते नज़र आ रही है।

अब सवाल सिर्फ एक परिवार के इंसाफ का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या निजी अस्पताल में इलाज कराने वाला हर मरीज, चाहे वह CGHS कार्डधारी हो या सामान्य भुगतान करने वाला, उसे समान प्राथमिकता और समय पर जरूरी चिकित्सा मिलती है?

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