झारखंड में इस वक्त जब हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के नाम का तूफान चल रहा है भाजपा ने प्रदेश प्रभारी के रुप में मध्य प्रदेश की आरक्षित सीट से सांसद गजेन्द्र पटेल के नाम का ऐलान कर अपनी मंशा साफ कर दी है। आदिवासी और कुड़मी वोट को अपने पाले में करने की यह रणनीति कितनी कारगर साबित हो पाती है यह तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन गजेन्द्र पटेल के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा की पैठ फिर से स्थापित करने की होगी। भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा फेरबदल करते हुए गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का नया प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। 23 सितंबर 2026 को घोषित नई सूची में झारखंड समेत कई राज्यों के संगठनात्मक प्रभारियों में बदलाव किया गया है।
गजेंद्र पटेल को कमान क्यों ?
मध्य प्रदेश के खरगोन से सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का नया प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया है। वह डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जगह यह जिम्मेदारी संभालेंगे। भाजपा आलाकमान द्वारा गजेंद्र पटेल को झारखंड की कमान सौंपने के पीछे जो मुख्य रणनीतिक और संगठनात्मक कारण चर्चा में हैंं…
आदिवासी बहुल राज्य में मजबूत आदिवासी चेहरा:
झारखंड एक प्रमुख आदिवासी बहुल राज्य है। गजेंद्र पटेल खुद मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र (खरगोन) से आते हैं और एक वरिष्ठ आदिवासी नेता हैं। पार्टी ने उन्हें झारखंड में जनजातीय (ST) जनाधार और संगठन को साधने के उद्देश्य से आगे किया है।
गहरा संगठनात्मक अनुभव:
गजेंद्र पटेल की पृष्ठभूमि आरएसएस (RSS), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), युवा मोर्चा और वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ी रही है। इसके अलावा वे भाजपा अनुसूचित जनजाति (ST) मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री भी रह चुके हैं। वनवासी कल्याण आश्रम और एसटी मोर्चा में काम करने के कारण उनके पास आदिवासी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर संगठन विस्तार का लंबा अनुभव है।
केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास और राष्ट्रीय महामंत्री का पद:
18वीं लोकसभा में लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए गजेंद्र पटेल भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में राष्ट्रीय महामंत्री के महत्वपूर्ण पद पर हैं। केंद्रीय संगठन में उच्च पद पर होने के कारण वे केंद्रीय नेतृत्व और राज्य इकाई के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सकते हैं।
पार्टी कैडर में नया उत्साह और बेहतर समन्वय:
झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन (JMM-कांग्रेस) के खिलाफ पार्टी को नए सिरे से संगठित करने और गुटबाजी को दूर कर कार्यकर्ताओं में समन्वय बनाने के लिए एक ऊर्जावान और रणनीतिक नेता की आवश्यकता थी।
गजेंद्र पटेल के साथ पार्टी ने सौरभ सिंह (छत्तीसगढ़) और निवेदिता सिंह (बिहार) को झारखंड का सह-प्रभारी नियुक्त किया है, ताकि पड़ोसी राज्यों के राजनीतिक अनुभव का लाभ उठाकर झारखंड संगठन को और अधिक सक्रिय बनाया जा सके।
कौन हैं गजेन्द्र पटेल ?
गजेंद्र पटेल का जन्म 16 फरवरी 1975 को मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में हुआ था। बीए-एलएलबी की पढ़ाई करने वाले पटेल बचपन से आरएसएस की शाखा से जुड़े रहे और 1990 में ABVP से अपना संगठनात्मक सफर शुरू किया। बाद में युवा मोर्चा, वनवासी कल्याण परिषद और भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा में सक्रिय रहे। 2019 और 2024 में वे मध्य प्रदेश की आरक्षित खरगोन सीट से लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए। इससे पहले वे भगवानपुरा से विधायक भी रहे। संसद में उनकी उपस्थिति 97% रही है और उन्होंने रेल कनेक्टिविटी, आदिवासी क्षेत्रों में मेडिकल सुविधाओं जैसे मुद्दे उठाए हैं। 17 अगस्त 2026 को उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया था।
जनता पर जलवा कायम करने में पूरी तरह विफल साबित हुई रघुवर दास सरकार
झारखंड में पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा की सीटों में कमी दर्ज हुई है। 2014 में भाजपा ने 37 सीटों पर जीत दर्जकर राज्य की सत्ता के सबसे बड़े दावेदार के रुप में झारखंड गठन के बाद पहली बार कब्जा जमाया। लेकिन, 2019 में पार्टी को जबदस्त हार का सामना करना पड़ा। विधायको की संख्या सीधे 37 से घटकर 25 रह गयी और 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 21 सीटों पर ही सिमट गयी। आखिर 2014 से लेकर 2019 तक एनडीए के शासनकाल में ऐसी क्या गलतियां हो गयीं कि झारखंड की जनता ने भाजपा को सिरे से नकार दिया। रघुवर दास की पूर्ण बहुमत की सरकार जनता पर जलवा कायम करने में पूरी तरह विफल साबित हुई।
अब नजर डालते है झारखंड के पिछले कुछ सालो के प्रदेश प्रभारी और विधानसभा की सीटों पर
अब झारखंड प्रदेश प्रभारी की बात करे तो वर्ष 2014 में झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश प्रभारी त्रिवेंद्र सिंह रावत थे। बता दे अक्टूबर 2014 में उन्हें झारखंड का प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया था। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था और राज्य में पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत के करीब पहुंचकर सरकार बनाई थी। लेकिन उसी साल के शुरुआती महीनों (जनवरी 2014) में भाजपा द्वारा विनोद पांडे को झारखंड का राज्य प्रभारी नियुक्त किया गया था, जिन्हें बाद में अक्टूबर 2014 के आसपास त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा रिप्लेस किए थे।
उसके बाद वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के झारखंड के प्रभारी भूपेंद्र यादव थे। दिसंबर 2018 के अंत में पार्टी द्वारा किए गए संगठनात्मक बदलावों के तहत, मंगल पांडेय को आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए झारखंड का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया गया था। उसके बाद लगातार बीजेपी का प्रदर्शन ख़राब होता गया।
2024 में झारखण्ड प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेयी थे। बता दें, लक्ष्मीकांत वाजपेयी को 2022 में भी झारखंड बीजेपी का प्रभारी बनाया गया थे।
लेकिन उनके नेतृत्व में झारखंड में बीजेपी का प्रदर्शन पूरा डामाडोल नज़र आया। झारखंड विधानसभा चुनाव परिणाम में (कुल 81 सीटें) भाजपा को महज 21 सीटें मिली थी।
गजेंद्र पटेल के सामने क्या होंगी चुनौतियां ?
झारखंड में नए प्रभारी के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की होगी। खासकर खुद आदिवासी हो कर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पार्टी की संगठनात्मक स्थिति को मजबूत करना एक अहम विषय रहेगा। इसके अलावा प्रदेश नेतृत्व, सांसदों, विधायकों, जिला संगठनों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा। विधानसभा चुनाव के आंकड़ों में 2014 से 2024 के बीच आए बदलाव को देखते हुए सीट-दर-सीट संगठन की स्थिति की समीक्षा भी नई टीम के एजेंडे में शामिल हो सकती है।गजेंद्र पटेल की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण हो सकती है। मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र से आने और संगठन में लंबे समय तक काम करने के अनुभव के कारण झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता पर भी नजर रहेगी।
अब देखना दिलचस्प होगा कि झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार के बीच वह कैसे बीजेपी की सीटों में बढ़ोत्तरी कर किस दिशा में आगे ले जाते हैं। फिलहाल उनके सामने सबसे महत्वपूर्ण काम पार्टी के संगठन को मजबूत करना और पिछले तीन विधानसभा चुनावों में सीटों के आंकड़ों में दर्ज बदलाव की पृष्ठभूमि में अगले चुनावी चक्र की रणनीति तैयार करना होगा।
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