झारखंड की समृद्ध जनजातीय संस्कृति में दशाई पर्व का विशेष स्थान है। संताल समुदाय के बीच प्रचलित यह पर्व केवल उत्सव और मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों, पारंपरिक लोकगीतों, नृत्य और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा है। दुर्गापूजा और दशहरा के समय मनाए जाने वाले इस पर्व में पारंपरिक वेशभूषा धारण कर युवक गांव-गांव घूमते हैं और लोकनृत्य तथा संगीत के माध्यम से अपनी परंपरा को जीवंत रखते हैं।
लोकगीत और पारंपरिक नृत्य हैं दशाई पर्व की पहचान
दशाई पर्व के दौरान संताल समाज के युवक पारंपरिक वेशभूषा में सजकर समूह में नृत्य करते हैं। इस अवसर पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकगीतों का विशेष महत्व होता है। कुछ क्षेत्रों में नर्तक सिर पर मोरपंख सजाते हैं, पैरों में घुंघरू बांधते हैं और हाथों में पारंपरिक वाद्ययंत्र लेकर घर-घर पहुंचते हैं। उनकी प्रस्तुतियां ग्रामीण जीवन में उत्सव का माहौल बनाती हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती हैं।
संताल समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा पर्व
दशाई पर्व की उत्पत्ति को लेकर संताल समुदाय में प्रचलित लोककथाएं इसकी खास पहचान हैं। झारखंड पर्यटन विभाग की एक सांस्कृतिक प्रस्तुति के अनुसार, इस पर्व से जुड़ी एक लोककथा में आयान, काजल, देवी और दुर्गा नामक पात्रों की खोज का प्रसंग मिलता है। इस कथा को संताल समाज के संघर्ष और अपने लोगों को खोजने की सामूहिक स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, पर्व की उत्पत्ति और उससे जुड़ी कथाओं के अलग-अलग स्थानीय रूप भी प्रचलित हैं।
वर्षा ऋतु की विदाई और प्रकृति से भी जुड़ा है दशाई
दशाई पर्व के नाम की व्याख्या संथाली भाषा के शब्दों से भी की जाती है। झारखंड पर्यटन विभाग की सांस्कृतिक पत्रिका में प्रकाशित विवरण के अनुसार, ‘दाक’ का अर्थ पानी और ‘साय’ का संबंध समाप्त होने से जोड़ा गया है। इस तरह दशाई को वर्षा ऋतु की समाप्ति से जोड़कर देखा जाता है। धान के खेतों और ग्रामीण परिवेश से जुड़ा यह पर्व संताल समाज के प्रकृति-आधारित जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी प्रस्तुत करता है।
विलुप्त होती परंपरा को बचाने की जरूरत
बदलते समय के साथ पारंपरिक लोककलाओं और जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। दशाई नृत्य के संरक्षण के लिए झारखंड में प्रशिक्षण और प्रलेखन की पहल भी की गई है। भारतीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से संबंधित एक दस्तावेज में इस परंपरा को संरक्षित रखने के उद्देश्य से प्रशिक्षण कार्यक्रम का उल्लेख मिलता है। वहीं, यूनेस्को के सांस्कृतिक नीति संबंधी दस्तावेज में झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में दशाई सहित पारंपरिक जनजातीय कला रूपों के पुनर्जीवन के प्रयासों का जिक्र है।
सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का संदेश
दशाई पर्व संताल समाज की उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें लोकगीत, नृत्य और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपराएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह पर्व याद दिलाता है कि लोक-संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की पहचान भी है। इस परंपरा को सहेजना झारखंड की विविध सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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