देश में खेलों के प्रति जोश और जुनून पैदा करने के लिए हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को समर्पित है, जिन्होंने अपने असाधारण खेल कौशल से पूरी दुनिया को भारत की ताकत का लोहा मनवाया। आज उनकी 121वीं जयंती है और इस खास मौके पर राष्ट्रीय खेल दिवस को 28 से 30 अगस्त 2026 तक देशव्यापी अभियान के रूप में मनाया जा रहा है, जिसकी थीम ‘खेलेगा भारत, जीतेगा भारत’ रखी गई है।
क्यों मनाया जाता है यह दिन
नेशनल स्पोर्ट्स डे के मौके पर मेजर ध्यानचंद के जीवन और खेलों में उनके अतुलनीय योगदान को याद किया जाता है। इस दिन देशभर में स्कूल, कॉलेज और अन्य संस्थानों में बच्चों और युवाओं के लिए खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, ताकि उनमें खेलों के प्रति रुचि जागृत हो सके। इसके साथ ही उन्हें हॉकी के इस दिग्गज खिलाड़ी की उपलब्धियों और उनके संघर्ष की कहानी से भी अवगत कराया जाता है, जिससे नई पीढ़ी प्रेरणा ले सके।
कौन थे मेजर ध्यानचंद
29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद (प्रयागराज) के एक राजपूत परिवार में जन्मे ध्यानचंद अपने पिता समेश्वर सिंह की तरह भारतीय सेना में भर्ती हुए, जहां उन्हें हॉकी से गहरा लगाव हो गया। उनका असली नाम ध्यान सिंह था, लेकिन चांदनी रात में अभ्यास करने की आदत के चलते उनके साथियों ने उन्हें ‘ध्यानचंद’ नाम दे दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
22 साल के करियर में जड़े 400 गोल
1926 से 1948 तक चले अपने शानदार करियर में ध्यानचंद ने 400 गोल दागे और भारत को लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए। 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में उन्होंने अकेले 14 गोल कर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। 1932 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारतीय टीम ने फाइनल में मजबूत अमेरिका को हराकर एक बार फिर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। वहीं 1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनकी कप्तानी में भारत ने फाइनल मुकाबले में जर्मनी को 8-1 के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी।
पद्म भूषण से सम्मान, हिटलर के प्रस्ताव को किया अस्वीकार
उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए 2002 में दिल्ली के राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद हॉकी स्टेडियम कर दिया गया। 1956 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया और आज भी उनके नाम पर खेल रत्न पुरस्कार दिया जाता है, जो भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान माना जाता है। एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि बर्लिन ओलंपिक में उनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने उन्हें जर्मन सेना में ऊंचा पद और वहां की नागरिकता देने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन देशभक्ति से ओतप्रोत ध्यानचंद ने इस लुभावने प्रस्ताव को ठुकराते हुए साफ कहा कि वे सिर्फ भारत के लिए ही खेलेंगे।
इसे भी पढ़े – आज से शुरू हुई रिम्स में MBBS की 250 सीटों पर नामांकन प्रक्रिया


