सरकारी बाबू लोग मजा में, आउटसोर्स कर्मी सजा में
महात्मा गांधी ने खादी को आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और स्वावलंबन का प्रतीक बनाया था। लेकिन आज गांधी जी का खादी संकट में है। झारखंड ही नहीं देशभर में खादी उद्झायोग से जुड़े लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। दरअसल, इसमें भी झोल है, जहां एक तरफ सरकारी बाबू लोग खादी की गाढ़ी कमाई का मजा ले रहे हैं, वहीं अपने पसीने से खादी को आसमान की बुलंदियों तक ले जाने वाले कई कई कर्मियों की हालत खस्ता हो गयी है। राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से जुड़े आउटसोर्स कर्मी अपने अधिकार और सम्मान के लिए आंदोलन करने को मजबूर हैं। मंगलवार, 8 सितंबर 2026 से रातू रोड स्थित उद्योग भवन के बोर्ड परिसर में कर्मचारियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है।
इस आंदोलन में सिर्फ रांची के कर्मचारी ही शामिल नहीं हैं। जमशेदपुर और झारखंड के अन्य क्षेत्रों से भी कर्मचारी धरने में पहुंचे हैं। वहीं, लखनऊ से जुड़े कर्मचारी भी ऑनलाइन माध्यम से आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय से उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और अब उनके सामने आंदोलन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
आंदोलनरत कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर पांच प्रमुख बिंदु सामने रखे हैं-
हम सभी को संविदा कर्मी का दर्जा दिया जाए
सामान काम के सामान वेतन दिया जाए
सेवा सुरक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा दिया जाए
ठेका प्रथा के द्वारा शोषण बंद किया जाए
बकाया वेतन का भुगतान किया जाए
आसान भाषा में कहे तो कर्मचारियों का कहना है कि पिछले करीब साढ़े तीन माह से उन्हें वेतन और मानदेय नहीं मिला है। इससे कई परिवारों के सामने आर्थिक संकट और भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई है। कर्मचारियों ने लंबित भुगतान के साथ बोर्ड के रिक्त मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी (CEO) के पद पर जल्द नियुक्ति की मांग की है।
सात साल से अध्यक्ष का पद खाली
कर्मचारियों का कहना है कि बोर्ड में पिछले करीब सात वर्षों से अध्यक्ष का पद खाली है। वहीं, करीब साढ़े तीन महीने से CEO का पद भी रिक्त है। दोनों महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति नहीं होने से बोर्ड की प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था प्रभावित हो रही है। कर्मचारियों के मुताबिक वित्तीय अधिकारी CEO के अधीन हैं, इसलिए CEO की अनुपस्थिति का असर वेतन और मानदेय के भुगतान पर भी पड़ रहा है।
बोर्ड के देशभर में करीब 17 बिक्री केंद्र हैं, जिनमें दिल्ली और लखनऊ के केंद्र भी शामिल हैं। कर्मचारियों के अनुसार इन केंद्रों का बीमा भी पिछले महीने समाप्त हो गया है। ऐसे में किसी घटना या दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
300 महिलाओं और बुनकरों का भी मानदेय अटका
खादी बोर्ड में करीब 300 महिलाओं को छह महीने का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें प्रतिदिन 150 रुपये मानदेय दिया जाता है। प्रशिक्षण पूरा होने पर 10 हजार रुपये की सिलाई मशीन और प्रमाण पत्र दिया जाता है। मशीन की कीमत का 25 प्रतिशत यानी 2500 रुपये महिलाओं को देना होता है। लेकिन पिछले तीन महीने से प्रशिक्षणार्थियों का मानदेय भी लंबित है।
इसके अलावा गढ़वा, आमदा, मरांगहातू और हरिहरगंज समेत कई क्षेत्रों में काम करने वाले बुनकरों को भी मानदेय नहीं मिलने की शिकायत है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कार्मिक सचिव और उद्योग सचिव को पत्र भेजकर अपनी समस्याओं से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस जवाब नहीं मिला है।
आंदोलनरत कर्मियों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती और बकाया भुगतान नहीं किया जाता, तब तक उनका अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा।
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