करीब 11 बजे पैतृक गांव पहुंचेगा पार्थिव शरीर, घर में अंतिम दर्शन के बाद नाड़ी दरहा घाट ले जाया जाएगा; प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था संभाली
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को आज, गुरुवार को उनके पैतृक गांव नेमरा में अंतिम विदाई दी जाएगी। उनके अंतिम संस्कार को लेकर रामगढ़ जिला प्रशासन और पुलिस ने तैयारियां तेज कर दी हैं। रूपी सोरेन का पार्थिव शरीर गुरुवार सुबह रांची से नेमरा के लिए रवाना होगा और करीब 11 बजे नेमरा पहुंचने की जानकारी है। इसके बाद पैतृक आवास पर अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि का सिलसिला चलेगा।
पैतृक गांव में पारंपरिक रीति-रिवाजों के बाद पार्थिव शरीर को नाड़ी दरहा घाट ले जाया जाएगा, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। प्रशासन ने गांव से लेकर अंतिम संस्कार स्थल तक सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था की है। अधिकारियों की तैनाती के साथ रास्ते और आसपास के इलाकों में भी आवश्यक इंतजाम किए जा रहे हैं।
एक साल में सोरेन परिवार ने खोईं दो बड़ी छांव
रूपी सोरेन की अंतिम विदाई ऐसे समय हो रही है, जब करीब एक साल पहले ही उनके जीवनसाथी और झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता शिबू सोरेन को भी नेमरा की मिट्टी में अंतिम विदाई दी गई थी। अगस्त 2025 में शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव में हुआ था। अब लगभग एक वर्ष बाद उसी गांव में रूपी सोरेन की चिता सजेगी।
इस वजह से नेमरा में आज का दिन सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी बेहद भावुक होने वाला है, जिनका जुड़ाव सोरेन परिवार और झारखंड आंदोलन के इतिहास से रहा है।
अस्पताल में चल रहा था इलाज
रूपी सोरेन का पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य खराब था। उन्हें सांस लेने में परेशानी के बाद 18 सितंबर 2026 को रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। करीब 20 दिनों तक इलाज के बाद बुधवार, 7 अक्टूबर की शाम उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही परिवार, समर्थकों और झारखंड के राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।
निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर देर रात रांची स्थित मोरहाबादी आवास लाया गया, जहां परिजनों और शुभचिंतकों ने अंतिम दर्शन किए। गुरुवार को उन्हें उनके पैतृक गांव नेमरा ले जाया जा रहा है।
1962 में शिबू सोरेन के साथ शुरू हुई थी जीवन की नई यात्रा
रूपी सोरेन का विवाह 1 जनवरी 1962 को शिबू सोरेन के साथ हुआ था। विवाह के बाद उन्होंने ऐसे दौर में परिवार की जिम्मेदारी संभाली, जब शिबू सोरेन झारखंड के अलग राज्य और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संघर्षों में लगातार सक्रिय रहते थे।
परिवार की जिम्मेदारी मुख्य रूप से रूपी सोरेन के कंधों पर रही। उन्होंने अपने बच्चों—दुर्गा सोरेन, अंजली सोरेन, हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन—का पालन-पोषण किया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान रूपी सोरेन ने घर और परिवार को संभाले रखा।
बेटे दुर्गा सोरेन को खोने का दर्द भी सहा
रूपी सोरेन के जीवन में दुखों का सिलसिला भी कम नहीं रहा। वर्ष 2009 में बड़े बेटे दुर्गा सोरेन के असामयिक निधन का सदमा उन्होंने झेला। इसके बाद अगस्त 2025 में पति शिबू सोरेन का निधन हुआ। इन लगातार पारिवारिक दुखों के बीच भी वह परिवार की वरिष्ठ सदस्य के रूप में बनी रहीं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मां के निधन के बाद उन्हें अपनी सबसे बड़ी छांव बताया। उनके निधन से परिवार के साथ-साथ झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी गहरा शोक है।
पति के सम्मान का आखिरी बड़ा सार्वजनिक क्षण
रूपी सोरेन के जीवन का एक भावुक अध्याय इसी वर्ष जून में देखने को मिला था। शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था और उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति भवन में उनकी ओर से यह सम्मान ग्रहण किया था।
उस समय उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसके बावजूद उन्होंने पति का सम्मान स्वयं ग्रहण किया। कुछ ही महीनों बाद अब वह भी इस दुनिया से विदा हो गईं।
नेमरा में फिर जुटेगा जनसमूह, लेकिन इस बार विदाई एक मां की
नेमरा के उसी पैतृक आंगन में आज फिर लोगों की भीड़ जुटेगी, जहां कुछ समय पहले तक रूपी सोरेन परिवार के बीच मौजूद थीं। अब उसी आंगन में लोग उन्हें अंतिम बार देखने और श्रद्धांजलि देने पहुंचेंगे।
उनकी अंतिम यात्रा में परिवार, शुभचिंतकों और बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के पहुंचने की संभावना है। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए सड़क से लेकर गांव और अंतिम संस्कार स्थल तक व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी की है।
रूपी सोरेन का जीवन किसी बड़े राजनीतिक पद से ज्यादा परिवार, संघर्ष और त्याग की कहानी रहा। उन्होंने एक ऐसे दौर में परिवार को संभाला, जब उनके पति झारखंड के आंदोलन में वर्षों तक सक्रिय रहे। पति और बड़े बेटे को खोने का दर्द सहने के बाद अब वह भी अपने पीछे एक ऐसा परिवार और स्मृतियां छोड़ गई हैं, जिनसे झारखंड की राजनीति और सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा है।
आज नेमरा उन्हें अंतिम विदाई देगा। मिट्टी से जुड़ी वह मां, जिसने दशकों तक परिवार को संभाले रखा, अब उसी मिट्टी में अंतिम बार लौटेगी।


