चतरा: आम्रपाली कोल परियोजना में स्थानीय रैयतों की करीब 42 एकड़ जमीन पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए दावा करने का मामला सामने आने के बाद अब संघमित्रा परियोजना में भी जमीन के कागजात को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि संघमित्रा परियोजना शुरू होने से पहले ही जमीन से जुड़े दागी माफिया सक्रिय हो गए हैं। सरादु गांव के रैयतों की जमीन पर दावा करने के लिए फर्जी कागजात तैयार किए गए हैं। जब जमीन पर वास्तविक रैयतों का जोत-दखल और कब्जा है, तो फिर बाहरी लोग फर्जी दस्तावेजों के सहारे उस पर अपना दावा कैसे ठोक रहे हैं?
आम्रपाली परियोजना क्षेत्र में करीब 42 एकड़ जमीन पर बाहरी लोगों द्वारा फर्जी कागजात के आधार पर दावा किए जाने का मामला ग्रामसभा में उजागर हुआ था। अब इसी तर्ज पर संघमित्रा परियोजना क्षेत्र में भी रैयतों की जमीन पर कब्जा जमाने की तैयारी की जा रही है। आरोप है कि मगध परियोजना से जुड़े दागी माफिया सरादु गांव के रैयतों की जमीन पर दावा करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कर चुके हैं।
हजारीबाग में तैयार हुए फर्जी जमीन के कागजात, दो करोड़ की ठगी का आरोप
संघमित्रा परियोजना के सरादु गांव की जमीन से जुड़े फर्जी दस्तावेज हजारीबाग में तैयार कराए जाने का आरोप है। इसी जमीन के आधार पर परियोजना में नौकरी और मुआवजा दिलाने का लालच देकर करीब दो करोड़ रुपये की ठगी किए जाने की बात सामने आई है। मामले का खुलासा तब हुआ, जब कुछ बाहरी लोग फर्जी कागजात लेकर सरादु गांव पहुंचे और ग्रामीणों से जमीन के संबंध में जानकारी लेने लगे। पूछताछ के दौरान मगध परियोजना से जुड़े एक दागी आरोपी का नाम सामने आया।
जब जमीन के वास्तविक मालिक गांव में मौजूद हैं, तो बाहरी लोगों के पास उन्हीं जमीनों के कागजात कहां से आए? अगर नौकरी और मुआवजे के नाम पर करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ है, तो इस पूरे खेल में शामिल लोगों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
ग्रामीणों को रातोंरात अमीर बनाने का सपना…
संघमित्रा कोल परियोजना को लेकर गतिविधियां तेज होते ही जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े का मामला भी सामने आने लगा है। आरोप है कि फर्जी कागजात के सहारे ग्रामीणों को नौकरी, मुआवजे और परियोजना में मालिकाना हक दिलाने का सपना दिखाया जा रहा है। उन्हें रातोंरात अमीर बनने का लालच देकर इस खेल में शामिल करने की कोशिश की जा रही है। इससे उन रैयतों के अधिकारों पर सवाल खड़ा हो गया है, जिनकी जमीन पर पीढ़ियों से उनका कब्जा रहा है।
ग्रामीणों की जमीन से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन आखिर किस स्तर पर किया जा रहा है? फर्जी कागजात के सहारे नौकरी और मुआवजा हासिल करने की कोशिश हो रही है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
अब देखना होगा कि संघमित्रा परियोजना में जमीन के नाम पर चल रहे इस खेल की पूरी परत कब खुलेगी और सरादु के वास्तविक रैयतों को उनका हक कौन दिलाएगा?
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