रांची के मोरहाबादी स्थित बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम में पिछले तीन-चार साल से अभ्यास कर रहे दर्जन भर से ज्यादा एथलेटिक्स खिलाड़ियों की शिकायत एक साधारण सी मांग से शुरू होती है — “हमारा जिम फिर से खोल दीजिए।” लेकिन जिस तरह यह मामला आगे बढ़ा है, वह सिर्फ एक बंद जिम की कहानी नहीं रह गया है। यह भारत में खेल ढांचे की उस बुनियादी उपेक्षा की कहानी है, जिसकी वजह से लाखों प्रतिभाशाली बच्चे कभी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच ही नहीं पाते।
खिलाड़ियों की शिकायत: बार-बार मांगी अनुमति, बार-बार बंद हुआ जिम
मामले की शुरुआत खिलाड़ियों द्वारा 17 जून 2026 को झारखंड के खेल मंत्री को लिखे गए एक हस्तलिखित पत्र से समझी जा सकती है, जिस पर स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की मुहर और प्राप्ति संख्या दर्ज है। पत्र में खिलाड़ी लिखते हैं कि वे तीन-चार वर्षों से बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम में एथलेटिक्स का अभ्यास कर रहे हैं और अपने प्रदेश तथा देश का नाम रोशन करना चाहते हैं। लेकिन उनकी शिकायत है कि आज तक उन्हें एथलेटिक्स से जुड़े कोई खेल उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए, न ही स्टेडियम का जिम उनके लिए नियमित रूप से खोला जाता है।
पत्र के मुताबिक, खिलाड़ी बार-बार निदेशालय से जिम के लिए अनुमति मांगते हैं। कभी-कभी अनुमति मिल भी जाती है और कुछ दिन सब ठीक चलता है, लेकिन एक-दो महीने बाद बिना किसी सूचना के जिम फिर बंद कर दिया जाता है। खिलाड़ियों का कहना है कि इससे उनकी ट्रेनिंग और फिटनेस पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है, और बिना जिम व सही उपकरण के वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीटों का मुकाबला नहीं कर सकते। पत्र में एक बेहद मार्मिक सवाल भी है — “आप ही बताइए कि हम खिलाड़ी क्या करें और कहां जाएं?” खिलाड़ियों ने स्टेडियम का जिम स्थायी रूप से खोलने और भाला, गोला, चक्का, बैटन, हर्डल्स, जंप मैट जैसे बुनियादी उपकरण इस्तेमाल करने की अनुमति देने की गुजारिश की है।
अधिकारी की कथित प्रतिक्रिया: “स्पोर्ट्स मिनिस्टर समझे”
खिलाड़ियों का आरोप है कि जब उन्होंने बार-बार जिम दोबारा शुरू कराने की मांग स्टेडियम प्रबंधन के सामने रखी और इस संबंध में स्टेडियम के निदेशक, आईएएस अधिकारी छवि रंजन से बात की गई, तो उन्हें कथित तौर पर यह जवाब मिला कि “स्पोर्ट्स मिनिस्टर समझे।” यह टिप्पणी वीडियो में खिलाड़ियों द्वारा साझा की गई है और अब तक प्रशासन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यह ध्यान रहे कि यह अभी तक खिलाड़ियों का आरोप मात्र है, जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती, लेकिन अगर यह सही है तो यह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने वाले रवैये का एक चिंताजनक उदाहरण है।
अगर खिलाड़ियों का आरोप सही है, तो यह टिप्पणी अपने आप में बताती है कि जमीनी स्तर पर खेल प्रशासन में जवाबदेही की कितनी कमी है। एक स्टेडियम का निदेशक अगर खिलाड़ियों की समस्या सुनकर उसे मंत्री के पाले में डालकर बात टाल देता है, तो सवाल उठता है कि रोजमर्रा के प्रशासनिक फैसले — जैसे जिम कब खुलेगा, उपकरण कब मिलेंगे — लेने के लिए स्टेडियम प्रबंधन को किस बात का इंतजार है।
अधिकारियों से कुछ सीधे सवाल
- क्या बिरसा मुंडा स्टेडियम का जिम पिछले तीन-चार वर्षों में बार-बार बिना सूचना के बंद क्यों किया गया?
- क्या एथलेटिक्स के लिए जरूरी बुनियादी उपकरण — भाला, गोला, चक्का, हर्डल्स, जंप मैट — उपलब्ध कराने में इतनी देरी की कोई ठोस वजह है?
- अगर जिम और उपकरण से जुड़े फैसले वाकई सिर्फ खेल मंत्री के स्तर पर होने हैं, तो क्या स्टेडियम प्रबंधन ने कभी मंत्रालय को औपचारिक रूप से इसकी सिफारिश भेजी?
- क्या राज्य सरकार यह बताएगी कि खिलाड़ियों के 17 जून 2026 के पत्र पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
- जिन खिलाड़ियों ने वर्षों की मेहनत सिर्फ इसलिए गंवाई कि उन्हें ट्रेनिंग सुविधा नहीं मिली, उनकी भरपाई कौन करेगा?
ये सवाल सिर्फ प्रशासनिक औपचारिकता के नहीं हैं। हर महीने जो ट्रेनिंग रुकती है, वह किसी खिलाड़ी के करियर के उस सीमित समय से निकल जाती है जब शरीर सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी होता है। इस देरी की भरपाई कोई माफी या आश्वासन नहीं कर सकता।
भारत में खेल की व्यापक उपेक्षा — और फुटबॉल का वह सवाल जो हर बार पूछा जाता है
रांची का यह मामला अकेला नहीं है। यह भारत के उस बड़े ढांचागत संकट का एक छोटा-सा नमूना भर है, जहां जिले और छोटे शहरों के स्टेडियम अक्सर बुनियादी रखरखाव, कोचिंग स्टाफ, और आधुनिक उपकरणों के अभाव में जूझते रहते हैं। मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों से आने वाले खिलाड़ियों के पास निजी अकादमियों या महंगी ट्रेनिंग सुविधाओं का विकल्प नहीं होता — उनके लिए सरकारी स्टेडियम ही एकमात्र सहारा होता है। जब वही सहारा जिम बंद होने और उपकरणों की कमी जैसी वजहों से छिन जाता है, तो प्रतिभा वहीं दम तोड़ देती है, मीडिया की सुर्खियों में आए बिना।
यही वजह है कि दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत आज तक फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाया है। यह सिर्फ प्रतिभा की कमी का मामला नहीं है — भारत में फुटबॉल खेलने वाले बच्चों की कोई कमी नहीं है। असली समस्या ढांचागत है: जमीनी स्तर पर स्काउटिंग और तराशने की व्यवस्था कमजोर है, जिलों के स्टेडियमों में बुनियादी सुविधाएं अनियमित रहती हैं, कोचिंग ढांचा असंगठित है, और जब खिलाड़ी अपनी समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाते हैं, तो अक्सर उन्हें टाल दिया जाता है या फाइलों में उलझा दिया जाता है। जब एक स्टेडियम के निदेशक की प्राथमिकता सूची में जिम खुला रखना सबसे ऊपर नहीं होता, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि क्यों भारतीय खेल — चाहे फुटबॉल हो या एथलेटिक्स — वैश्विक स्तर पर अपनी आबादी के अनुपात में कहीं पीछे छूट जाते हैं।
रांची के इन एथलीटों की मांग बेहद छोटी है — एक चालू जिम, कुछ बुनियादी उपकरण, और एक ऐसा प्रशासन जो उनकी बात सुने। लेकिन इस छोटी-सी मांग का पूरा न होना यह दिखाता है कि भारत में खेल के प्रति गंभीरता अभी भी भाषणों और नारों से आगे नहीं बढ़ पाई है। जब तक जमीनी स्तर पर यह उपेक्षा नहीं बदलेगी, तब तक ओलंपिक पदक हों या विश्व कप का सपना — दोनों दूर की कौड़ी ही बने रहेंगे।


