CCL ढोरी में 12वां वेतन बोर्ड को लेकर भड़का आक्रोश
झारखंड के बर्मो (Bermo) अनुमंडल के ढोरी क्षेत्र में कोयला कर्मियों का सब्र अब जवाब देने लगा है। 12वें वेतन बोर्ड (JBCCI-XII) के गठन में हो रही लगातार देरी ने मजदूरों के भीतर गहरा आक्रोश भर दिया है। बुधवार को सीसीएल ढोरी क्षेत्र के एएसडीओसीएम परियोजना के कैन्टीन में संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में एक विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य जल्द से जल्द 12वां वेतन बोर्ड जेबीसीसीआई 12 का गठन करने की मांग को प्रबंधन और केंद्र सरकार तक पहुंचाना था। इस बैठक की अध्यक्षता जवाहर लाल यादव ने की, जिसमें सैकड़ों कोयला मजदूरों ने अपनी आवाज बुलंद की।
कल्याणी परियोजना में एक प्रभावी पिट मीटिंग के बाद, संयुक्त ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि सीसीएल ढोरी महाप्रबंधक कार्यालय पहुंचे। यहां मुख्य गेट पर जोरदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने प्रबंधन को एक मांग पत्र सौंपा। इस दौरान मजदूरों ने साफ संदेश दिया कि वेतन समझौते में अब किसी भी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह प्रदर्शन न केवल उनकी एकजुटता को दर्शाता है, बल्कि उनके दृढ़ संकल्प का भी प्रमाण है कि वे अपने अधिकारों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
क्या है 12वां वेतन बोर्ड और इसका महत्व?
जेबीसीसीआई (Joint Bipartite Committee for the Coal Industry) कोयला उद्योग के कर्मचारियों के वेतन और सेवा शर्तों पर बातचीत के लिए गठित एक द्विपक्षीय समिति है। 11वें राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौते की अवधि काफी पहले ही समाप्त हो चुकी है, और अब 12वें वेतन बोर्ड के गठन की प्रक्रिया में असामान्य देरी हुई है। यह देरी देश भर के लाखों कोयला कर्मियों के लिए चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि वेतन समझौता ही उनके और उनके परिवारों के जीवन स्तर को निर्धारित करता है। महंगाई के इस दौर में, एक नया और संशोधित वेतन समझौता उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय सरकार और कोल इंडिया प्रबंधन की ओर से इस मामले पर स्पष्टता और तेजी की कमी ने मजदूरों में निराशा पैदा की है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि यह कोयला कर्मियों के साथ घोर अन्याय है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा में अहम योगदान देते हैं। उनकी मेहनत और समर्पण के बिना, देश की अर्थव्यवस्था का पहिया चलना मुश्किल है, फिर भी उनके हक को दबाया जा रहा है।
आंदोलन की चेतावनी और यूनियनों का अटल रुख
संयुक्त ट्रेड यूनियनों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही वेतन समझौते की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो उनका आंदोलन चरणबद्ध तरीके से और तेज किया जाएगा। यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि कोयला मजदूरों की भविष्य की रणनीति का एक संकेत है। यूनियन नेताओं ने दो टूक कहा है कि कोयला कर्मियों के अधिकारों से अब किसी भी तरह का समझौता नहीं होगा। उन्होंने सरकार और प्रबंधन से अपील की है कि वे इस मामले की गंभीरता को समझें और तत्काल कार्रवाई करें।
इस प्रदर्शन में कई प्रमुख यूनियन नेता और पदाधिकारी मौजूद थे, जिन्होंने एकजुटता का परिचय दिया। इनमें एटक के महामंत्री लखन लाल महतो, झाकोमयू के रिजनल सचिव जयनारायण महतो, आरसीएमयू के क्षेत्रीय सचिव शिवनंदन चौहान, सीएमयू के एरिया सचिव आर उनेश और जमसं के ढ़ोरी क्षेत्रीय सचिव विकास कुमार सिंह शामिल थे। इनके अलावा, जितेंद्र दूबे, गणेश मल्लाह, जयराम सिह, महफूज आलम, राजू भूखिया, आनंद विश्वकर्मा, प्रमोद सिंह, शशि सिंह, बैजनाथ सिंह, धीरज पांडेय, मुरारी सिंह, भीम महतो, रवि शंकर ठाकुर, नरेश प्रसाद महतो, मोहम्मद कलीमुद्दीन, मोहम्मद क्यूम खान, मोहम्मद कलीम खान, प्रकाश महतो, चंदन तिवारथा, जयनाथ मेहता, बनवीर मिश्रा जैसे अनेक ऊर्जावान कर्मी भी इस विरोध प्रदर्शन में मुख्य रूप से उपस्थित थे। यह दर्शाता है कि यह विरोध केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे कोयला समुदाय की भावना का प्रतिनिधित्व करता है।
आर्थिक बोझ और भविष्य की चिंता
वेतन बोर्ड में देरी से कोयला कर्मियों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। उनके परिवारों की दैनिक ज़रूरतें, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा असर पड़ रहा है। वेतन वृद्धि का इंतजार कर रहे मजदूरों को लगातार बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनका जीवनयापन मुश्किल हो गया है। कई कर्मियों ने बताया कि वे कब से इस बढ़ोतरी का इंतजार कर रहे हैं और अब तो उनका धैर्य जवाब दे चुका है। यह देरी उनके भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित कर रही है, चाहे वह घर बनाने की बात हो या कोई अन्य निवेश।
भारतीय कोयला उद्योग में श्रमिक संबंध हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, मजबूत यूनियनों ने श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान स्थिति इन श्रमिक संबंधों पर दबाव डाल रही है। प्रबंधन और सरकार को यह समझना होगा कि एक संतुष्ट कार्यबल ही उत्पादकता और स्थिरता की कुंजी है। यदि यह गतिरोध जारी रहता है, तो इसका असर न केवल कोयला उत्पादन पर पड़ेगा, बल्कि देश के आर्थिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कोल इंडिया जैसे विशाल निगम के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों के हितों को प्राथमिकता दे। आप कोल इंडिया के बारे में अधिक जानकारी उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर प्राप्त कर सकते हैं।
आगे क्या?
अब गेंद कोल इंडिया प्रबंधन और केंद्र सरकार के पाले में है। कोयला कर्मी अपनी मांगों पर अडिग हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेंगे। यदि समय रहते कोई समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन और भी बड़ा रूप ले सकता है, जिससे कोयला उत्पादन और आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ना तय है। पूरे देश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार और प्रबंधन इस ज्वलंत मुद्दे को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाते हैं, या कोयला कर्मियों का गुस्सा एक बड़े आंदोलन में बदल जाएगा।
