Friday, October 2

असम से जुड़ा आदिवासी अधिकारों का मुद्दा पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचा है। सात महाद्वीपों की 26 आदिवासी जनजातियों के प्रतिनिधि केन्या में एकत्रित हुए और कार्यकर्ता प्रणब डोले की गिरफ्तारी तथा काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े भूमि अधिकारों के मुद्दे पर अपनी आवाज उठाई। इन प्रतिनिधियों ने डोले की रिहाई और काजीरंगा के पास भूमि विवाद में शामिल आदिवासी परिवारों के लिए न्याय की मांग की।

कौन हैं प्रणब डोले?

प्रणब डोले असम के गोलाघाट जिले से जुड़े आदिवासी और भूमि अधिकार कार्यकर्ता हैं। वह Greater Kaziranga Land and Human Rights Protection Committee (GKLHRPC) के संयोजक के तौर पर काजीरंगा क्षेत्र में स्थानीय और आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बोकाखाट सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार उनकी उम्र 40 वर्ष है और उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), मुंबई से सोशल वर्क में एमए किया है।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

प्रणब डोले काजीरंगा के पास प्रस्तावित एक लग्जरी होटल परियोजना का विरोध कर रहे थे। ग्रेटर काजीरंगा भूमि एवं मानवाधिकार संरक्षण समिति के संयोजक डोले को 12 जुलाई 2026 को इंग्ले पत्थर में हुए इन्हीं विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। अधिकारियों ने प्रदर्शनों के दौरान कथित अपराधों के लिए उन पर मामले दर्ज किए।

कोर्ट से जमानत, फिर लगा NSA

घटनाक्रम में उस समय नया मोड़ आया जब कोर्ट से जमानत मिलने के अगले ही दिन असम सरकार ने डोले के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लगा दिया। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी और काजीरंगा से जुड़े भूमि अधिकार विवाद को लेकर विरोध और तेज हो गया।

भूमि अधिकारों को लेकर व्यापक बहस

कई स्वदेशी और आदिवासी परिवारों का दावा है कि वे पीढ़ियों से इस विवादित भूमि पर खेती और उसका उपयोग करते आ रहे हैं। यह मुद्दा काजीरंगा क्षेत्र में स्वदेशी भूमि अधिकारों, सामुदायिक सहमति और विकास को लेकर एक बड़ी बहस में बदल गया है।

‘Save Kaziranga’ अभियान के तहत जारी है मांग

अब ‘Save Kaziranga’ कैंपेन के जरिए प्रणब डोले की रिहाई, स्थानीय समुदायों के भूमि अधिकारों और काजीरंगा की सुरक्षा की मांग उठाई जा रही है। सितंबर में असम में भी उनकी रिहाई को लेकर प्रदर्शन हो चुके हैं, जिससे यह मुद्दा राज्य के भीतर भी लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।

केन्या में जताई गई एकजुटता

केन्या में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्वदेशी प्रतिनिधियों की बैठक में डोले और प्रभावित परिवारों के प्रति एकजुटता व्यक्त की गई। डोले के समर्थकों का कहना है कि उनका अभियान स्वदेशी और आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों और हितों की रक्षा पर केंद्रित है।

केन्या में व्यक्त की गई इस एकजुटता ने काजीरंगा भूमि विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वदेशी अधिकार आयाम दे दिया है, जिससे असम के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षित भूभागों में से एक के आसपास रहने वाले समुदायों की चिंताओं पर वैश्विक ध्यान आकर्षित हुआ है।

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