हजारीबाग के अपर समाहर्ता की रिपोर्ट से खुलासा
नियमों की अनदेखी: मूल लीजधारी और उत्तराधिकारी की मौत के बाद लावारिस पड़ी थी जमीन, सादे एग्रीमेंट और पावर ऑफ अटॉर्नी से खरीद-बिक्री का खेल बेनकाब
कार्रवाई की तैयारी: अपर समाहर्ता ने प्रमंडलीय आयुक्त को भूमि पुनर्ग्रहण (Resumption) के लिए भेजा प्रस्ताव, एफआईआर के बाद अब पूरी तरह जब्त होगी संपत्ति
जिस जमीन पर पूर्व मंत्री योगेन्द्र साव दावा कर रहे हैं..राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं…सरकारी काम में बाधा डालते हुए सीओ से लेकर तमान पदाधिकारियों को मां बहन की गालियां दे रहे हैं ..वह जमीन दरअसल उनकी है ही नहीं। हजारीबाग के अपर समाहर्ता द्वारा जारी रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद इस खासमहाल की कीमती जमीन को फिर से सरकार द्वारा पुनर्ग्रहित किया जाएगा। हजारीबाग शहर के सबसे प्राइम लोकेशन (कैंटोनमेंट क्षेत्र) में स्थित खास महाल की आधा एकड़ (50 डिसमिल) बहुमूल्य भूमि को सरकार द्वारा वापस अधिग्रहीत करने की बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। हजारीबाग के अपर समाहर्ता (अपर जिला मजिस्ट्रेट) ने खास महाल नियमावली और लीज शर्तों के गंभीर उल्लंघन के मामले में इस जमीन को सरकार में पुर्नग्रहित करने की अनुशंसा करते हुए फाइल उपायुक्त के माध्यम से उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त को भेज दी है।
प्रशासन की इस आक्रामक कार्रवाई से हजारीबाग के भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के बीच हड़कंप मच गया है। जिस जमीन पर पिछले कई सालों से सादे एग्रीमेंट, फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी और अवैध चहारदीवारी के सहारे कब्जे की साजिश रची जा रही थी, वह अब हमेशा के लिए सरकारी खाते में वापस दर्ज होने जा रही है।
क्या है पूरा मामला: 1988 की लीज और नियमों का उल्लंघन
दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, मौजा-कैन्टोनमेन्ट (थाना नं. 157, होल्डिंग नं. 302, प्लॉट नं. 872/1235, 873/1336 एवं 893/1337) की कुल 0.50 एकड़ जमीन 06 मार्च 1988 को मोहम्मद अहसान (पिता स्व० मोहम्मद सामुएल) के नाम पर लीज की गई थी। इस लीज की वैधता 31 मार्च 2008 को ही समाप्त हो चुकी थी।
जांच में यह बात सामने आई कि लीज की अवधि समाप्त होने से पहले 1995 में ही मूल लीजधारी ने दलजीत सिंह नामक व्यक्ति को पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) दे दी थी, जिन्होंने 2007 में लीज नवीनीकरण (Case No. 155/2007-08) का आवेदन दिया। हालांकि, आवश्यक दस्तावेज, परिवार वृक्ष, वंशावली और तय शुल्क जमा न करने के कारण लीज नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी ही नहीं हो सकी।
इसी बीच 1997 में ही मूल लीजधारी मो० अहसान की मृत्यु हो गई। कानूनन लीजधारी की मौत के साथ ही दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी स्वतः रद्द हो जाती है, लेकिन इसके बावजूद फर्जीवाड़े का खेल जारी रहा।
सादे एग्रीमेंट और लावारिस संपत्ति का फर्जीवाड़ा
सदर एसडीओ द्वारा जारी वंशावली के अनुसार, लीजधारी की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी पुत्री नाजिश कौशर थीं। लेकिन लीज भूमि पर किसी भी वैध वारिस ने न तो कभी निवास किया और न ही 2008 के बाद से सरकार को कोई लगान (टैक्स) चुकाया। अंतिम बार लगान रसीद वर्ष 1992-93 में ही कटी थी।
जांच रिपोर्ट के चौंकाने वाले तथ्यों के मुताबिक:
सादा एग्रीमेंट: नाजिश कौशर ने बिना नामांतरण (म्यूटेशन) कराए ही 23 सितंबर 2016 को मानस कुमार (सारले, हजारीबाग) के साथ जमीन का एक ‘सादा एग्रीमेंट’ कर लिया।
नोटरी का अथॉरिटी लेटर: 18 अगस्त 2017 को पटना में एक नोटरी पब्लिक के समक्ष ‘लेटर ऑफ ऑथराइजेशन’ बनाकर मानस कुमार को दे दिया गया।
अवैध किराया वसूली: जांच में पाया गया कि जर्जर मकान पर लघु सिंचाई प्रमंडल का बोर्ड लगा था और वहां विभाग का सामान रखा था, जिसका किराया वसूला जा रहा था, जबकि लीजधारी का परिवार वहां रहता ही नहीं था।
बाद में नाजिश कौशर की भी मृत्यु हो गई और उनके बाद इस जमीन पर दावा करने वाला कोई वैध वारिस नहीं बचा।
अवैध बाउंड्री से कब्जे का प्रयास, दर्ज हुई एफआईआर
जमीन के लावारिस और खाली पड़े होने का फायदा उठाकर भू-माफियाओं ने इस पर गिद्ध दृष्टि जमा ली। 10 नवंबर 2023 को खास महाल कर्मचारी ने रिपोर्ट दी कि कुछ भू-माफिया रातों-रात चहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) बनाकर जमीन हड़पने की कोशिश कर रहे हैं।
इसके बाद तत्कालीन अपर समाहर्ता के निर्देश पर अंचलाधिकारी (CO) सदर ने ‘झारखंड भूमि अतिक्रमण अधिनियम’ के तहत कार्रवाई करते हुए टीम भेजी। मौके से अवैध बाउंड्री को ध्वस्त किया गया और अतिक्रमणकारियों तथा घुसपैठियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई गई।
सरकारी वकील की राय और कारण बताओ नोटिस
मामले की कानूनी जटिलताओं को देखते हुए खास महाल अधिकारी ने सरकारी वकील (Government Pleader) से कानूनी परामर्श मांगा। सरकारी वकील ने अपने मंतव्य में स्पष्ट कहा:
”मूल लीजधारी की मृत्यु हो चुकी है और उनका कोई वारिस जमीन पर नहीं रहता। जमीन वीरान पड़ी है और गैर-कानूनी तरीके से तीसरे पक्षों द्वारा निर्माण कराया जा रहा है। यह लीज की शर्तों का गंभीर उल्लंघन है, इसलिए जमीन को सरकार में वापस अधिग्रहीत करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।”
इसके बाद प्रशासन ने ज्ञापांक 199 दिनांक 12.09.2024 के तहत नोटिस जारी कर लीजधारी के पक्ष को अपना जवाब देने का मौका दिया। चूंकि वहां कोई नहीं रहता था, इसलिए नोटिस को मकान पर चस्पा (Notice Paste) किया गया। लेकिन निर्धारित समय सीमा के भीतर न तो कोई उपस्थित हुआ और न ही कोई जवाब दाखिल किया गया।
अपर समाहर्ता का अंतिम आदेश: ‘पब्लिक पर्पस’ के लिए पुनर्ग्रहण
खास महाल मैनुअल 1953 के नियम 170(1) और धारा 21 के अनुसार, यदि लीज भूमि का उपयोग उस उद्देश्य के लिए बंद हो जाए जिसके लिए वह दी गई थी, तो सरकार को उसे वापस लेने का पूर्ण अधिकार है।
तमाम रिपोर्ट, लीज शर्तों के उल्लंघन, अवैध कब्जे की कोशिशों और नोटिस का जवाब न मिलने के आधार पर अपर समाहर्ता, हजारीबाग ने अनुशंसा की है कि कैंटोनमेंट मौजा की इस 50 डिसिमिल जमीन को जनहित (Public Purpose) के लिए सरकार के अधीन पुर्नग्रहित (Resume) कर लिया जाए। उपायुक्त हजारीबाग के हस्ताक्षर के बाद अब यह फाइल प्रमंडलीय आयुक्त को भेजी जा रही है, जहां से अंतिम मुहर लगते ही यह जमीन हमेशा के लिए राज्य सरकार के पूर्ण नियंत्रण में आ जाएगी



