गिरिडीह/रांची : झारखण्ड के गिरिडीह जिले के मधुबन स्थित जुग जाहेरथान में आयोजित संताली समाज के मरांग बुरु धोरोमगढ़ सम्मेलन का गुरुवार को अंतिम दिन है। सम्मेलन में देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। इसका आयोजन मरांग बुरु बचाव संघर्ष समिति की ओर से किया गया है। गुरुवार को गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी मरांग बुरु धोरोमगढ़ पहुंचीं और सम्मेलन में शामिल हुईं।
आदिवासी समाज की आस्था और परंपरा का प्रतीक है मरांग बुरु
मरांग बुरु का शाब्दिक अर्थ है ‘महान पर्वत’। संथाल आदिवासी समाज में मरांग बुरु को सर्वोच्च आराध्य देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। संथाल समाज में मरांग बुरु की पूजा और उनसे जुड़ी मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। कल्पना सोरेन ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए आदिवासी समाज के लोगों की आस्था और परंपरा के साथ मरांग बुरु धोरोमगढ़ सम्मेलन में शामिल होना सौभाग्य की बात है। मरांग बुरु केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि हमारी आस्था, परंपरा, पहचान और अस्तित्व का आधार है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़े विश्वासों में निहित है। ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर देते हैं।
आस्था और अधिकारों को लेकर उठाए सवाल
कल्पना सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज की आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रमाण केवल कागजों और दस्तावेजों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी समाज की आस्था और उसकी पुरानी परंपराओं का प्रमाण केवल कागजों के जरिए ही दिया जा सकता है?
उन्होंने मरांग बुरु को आदिवासी समाज की आस्था और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि इसकी सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता को समझना जरूरी है।
सम्मेलन में देश-विदेश से पहुंचे लोग
मरांग बुरु धोरोमगढ़ सम्मेलन में देश के विभिन्न क्षेत्रों के साथ विदेशों से भी लोग पहुंचे हैं। सम्मेलन के माध्यम से संताली समाज की धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चर्चा की जा रही है।
आयोजन का उद्देश्य मरांग बुरु की धार्मिक-सांस्कृतिक महत्ता को सामने लाना और आदिवासी समाज की आस्था एवं परंपराओं के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
