चाईबासा, झारखंड: कोल्हान विश्वविद्यालय के क्लस्टर सिस्टम के तहत जमशेदपुर, घाटशिला और चाईबासा के विभिन्न महाविद्यालयों से बांग्ला विषय हटाने के प्रस्ताव ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश पैदा कर दिया है। छात्रों के भविष्य और बंगालीभाषी समाज की सांस्कृतिक पहचान पर मंडराते इस संकट को लेकर झारखंड बांग्लाभाषी उन्नयन समिति ने कड़ा विरोध जताया है। समिति के राज्य पदाधिकारियों ने गुरुवार को विश्वविद्यालय की कुलपति को एक ज्ञापन सौंपकर इस महत्वपूर्ण विषय की पढ़ाई को पूर्ववत जारी रखने की मांग की, ताकि हजारों छात्रों का भविष्य अंधकार में न डूब जाए।
बांग्ला विषय: कोल्हान की सांस्कृतिक धरोहर पर संकट
समिति ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा है कि कोल्हान क्षेत्र में बांग्ला केवल एक भाषा नहीं, बल्कि यहाँ की मिट्टी, संस्कृति और लोगों की पहचान का अभिन्न हिस्सा है। वर्षों से, बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बांग्ला भाषा एवं साहित्य का गहन अध्ययन करते आ रहे हैं। इस विषय को अचानक हटाने का प्रस्ताव न केवल उन छात्रों के सपनों को तोड़ देगा जो इसमें अपना भविष्य देख रहे हैं, बल्कि इससे पूरे बांग्लाभाषी समाज की भावनाओं को भी गहरा आघात लगेगा। यह एक ऐसा फैसला है जो क्षेत्र की समृद्ध भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला है।
छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ क्यों?
कोल्हान विश्वविद्यालय से संबद्ध कई महाविद्यालयों में बांग्ला विषय का अध्ययन-अध्यापन दशकों से नियमित रूप से होता रहा है। हर साल सैकड़ों छात्र-छात्राएँ इस विषय को अपनी उच्च शिक्षा के लिए चुनते हैं, चाहे वह स्नातक स्तर हो या स्नातकोत्तर। उनके लिए यह सिर्फ एक विषय नहीं, बल्कि करियर बनाने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम है। ऐसे में विश्वविद्यालय का यह कदम छात्रों के भविष्य के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ जैसा प्रतीत होता है। छात्र अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के अपने अधिकार को लेकर चिंतित हैं।
समिति के पदाधिकारियों ने जोर देते हुए कहा कि यह प्रस्ताव नई शिक्षा नीति-2020 के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया गया है, ताकि छात्र अपनी जड़ों से जुड़े रहें और अपनी भाषा में बेहतर ढंग से सीख सकें। इसके अलावा, झारखंड सरकार भी राज्य की क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कई बार दोहरा चुकी है। ऐसे में विश्वविद्यालय का यह निर्णय शिक्षा नीति और राज्य सरकार की मंशा के विपरीत है, और इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सरकार और विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी
झारखंड बांग्लाभाषी उन्नयन समिति ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पुरजोर आग्रह किया है कि वे जमशेदपुर, घाटशिला और चाईबासा के सभी संबंधित महाविद्यालयों में बांग्ला विषय की पढ़ाई को पहले की तरह ही जारी रखें। समिति ने यह भी मांग की कि इसके अध्ययन-अध्यापन की निरंतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और इस विषय के लिए पर्याप्त शिक्षकों और संसाधनों का प्रावधान किया जाए। उनका मानना है कि बांग्लाभाषी विद्यार्थियों और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस और निर्णायक कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है। यह केवल एक भाषाई मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दा भी है।
मातृभाषा का महत्व और छात्रों की आवाज़
मातृभाषा का महत्व किसी भी समाज के लिए अतुलनीय होता है। यह सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और पहचान का वाहक होती है। जब किसी भाषा को शिक्षा व्यवस्था से हटाने की बात आती है, तो इसका सीधा असर उस समुदाय की आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। बांग्ला विषय को हटाने का यह प्रस्ताव हजारों छात्रों को अपनी मातृभाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर से वंचित कर देगा, जिससे उनकी शैक्षणिक यात्रा और भविष्य की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। समिति ने यह भी इंगित किया कि इस क्षेत्र में बांग्ला बोलने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है, और उनके हितों को नजरअंदाज करना अनुचित है।
संघर्ष अभी जारी है, और छात्रों तथा भाषाई संगठनों ने अपनी आवाज़ बुलंद कर दी है। वे चाहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ इस मामले पर विचार करे। समिति के सचिव राजेश राय ने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर गंभीरता से मनन करेगा और विद्यार्थियों के हितों के साथ-साथ भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए एक सकारात्मक निर्णय लेगा। उन्होंने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि विश्वविद्यालय छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने के बजाय, उन्हें अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करेगा।”
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा में शिक्षा के महत्व पर जोर देती है। ऐसे में कोल्हान विश्वविद्यालय का यह कदम कहीं न कहीं इस नीति की भावना के विरुद्ध भी जाता दिख रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस बढ़ते विरोध और छात्रों की जायज मांगों पर क्या रुख अपनाता है। स्थानीय समुदाय और छात्र संगठन पूरी तरह से लामबंद हैं और अपने अधिकारों के लिए अंतिम दम तक संघर्ष करने को तैयार हैं।


