रांची: ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक झंडे, आदिवासी रीति-रिवाज और अलग-अलग गांवों से जुटते प्रतिनिधि… झारखंड का मुड़मा जतरा अपनी इन्हीं खास परंपराओं के लिए जाना जाता है। रांची से करीब 30 किलोमीटर दूर मांडर में 27 और 28 अक्टूबर को लगने वाले इस जतरा में आदिवासी संस्कृति के कई रंग देखने को मिलेंगे। लेकिन इस मेले की सबसे बड़ी पहचान क्या है? आखिर यहां 40 पड़हा के प्रतिनिधि क्यों जुटते हैं?
मुड़मा जतरा को केवल खरीदारी और मनोरंजन के मेले के रूप में नहीं देखा जाता। इसकी पहचान उरांव आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक एकता से जुड़ी है। अलग-अलग पड़हा के प्रतिनिधियों का जुटना और पारंपरिक झंडों का मिलन इस आयोजन को खास बनाता है।
मुड़मा जतरा की कहानी क्या है?
मुड़मा जतरा की शुरुआत को लेकर एक लोककथा प्रचलित है। इसके अनुसार, मुगलों के आक्रमण के बाद उरांव समुदाय के लोगों को रोहतासगढ़ छोड़ना पड़ा था। वे सोन नदी पार कर पलामू के रास्ते छोटानागपुर पहुंचे। यहां मुड़मा क्षेत्र में उनकी मुलाकात पहले से रह रहे मुंडा समुदाय के सरदारों से हुई।
लोकमान्यता के मुताबिक, मुंडा सरदारों ने उरांव समुदाय के लोगों को पश्चिमी वन क्षेत्र में बसने और खेती करने की अनुमति दी थी। इस कथा को दोनों समुदायों के बीच सहयोग और भाईचारे की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह मौखिक परंपरा पर आधारित विवरण है और इसके सभी घटनाक्रमों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है।
40 पड़हा की परंपरा क्यों है महत्वपूर्ण?
पड़हा छोटानागपुर क्षेत्र के उरांव आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है। इसमें कई गांव एक सामाजिक संगठन के रूप में जुड़े होते हैं। पुराने समय में इस व्यवस्था के जरिए सामाजिक विवादों को सुलझाने, रीति-रिवाजों को बनाए रखने और गांवों के बीच तालमेल कायम करने में मदद मिलती थी।
पड़हा व्यवस्था में पड़हा राजा, दीवान, महतो, कोटवार और पाहन जैसे पारंपरिक पदों का उल्लेख मिलता है। इनकी जिम्मेदारियां स्थानीय परंपराओं के अनुसार तय होती हैं। पड़हा राजा नेतृत्व करते हैं, जबकि पाहन धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।
मुड़मा जतरा में 40 पड़हा के प्रतिनिधियों का एक साथ जुटना इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। अलग-अलग गांवों की भागीदारी से यह आयोजन सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनता है।
जतरा खूंटा पर होती है पारंपरिक पूजा
मुड़मा जतरा में जतरा खूंटा का विशेष महत्व है। इसे शक्ति खूंटा भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, इसे सखुआ यानी साल के पेड़ के तने से तैयार किया जाता है। यहां सरना धर्मगुरु और अलग-अलग पड़हा के पाहन पूजा-अर्चना करते हैं।
इस पूजा में प्रकृति, पूर्वजों और सामुदायिक आस्था से जुड़ी मान्यताओं को महत्व दिया जाता है। जतरा खूंटा इस आयोजन का प्रमुख धार्मिक केंद्र माना जाता है। इससे जुड़ी कुछ परंपराओं में पशु बलि का भी उल्लेख मिलता है, हालांकि वर्तमान में इस प्रथा का स्वरूप आयोजकों से सत्यापित किया जाना चाहिए।
झंडा मिलन में दिखते हैं आदिवासी परंपरा के रंग
मुड़मा जतरा में अलग-अलग गांवों के लोग अपने पारंपरिक परिधानों और प्रतीकों के साथ पहुंचते हैं। इन सांस्कृतिक समूहों को खोड़हा कहा जाता है। विभिन्न पड़हा के प्रतिनिधि अपने झंडों के साथ शामिल होते हैं और झंडा मिलन इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण बनता है।
मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप के बीच होने वाले इस आयोजन में हाथी, घोड़े, बाघ, मगरमच्छ, मछली, नाव और छाता जैसे प्रतीक भी देखने को मिलते हैं। ये प्रतीक अलग-अलग समूहों की पारंपरिक पहचान से जुड़े बताए जाते हैं।
लकड़ी के हाथी-घोड़े से जुड़ी है खास मान्यता
मुड़मा जतरा में लकड़ी से बने हाथी और घोड़े भी आकर्षण का हिस्सा होते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन पर बैठने का अधिकार पड़हा राजा और कुछ अन्य पारंपरिक पदाधिकारियों को ही होता है। इस परंपरा को उनके सामाजिक पद और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है।
मेले में पूजा के साथ होती है खरीदारी
मुड़मा जतरा में धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ खरीदारी भी होती है। यहां कृषि उपकरण, बर्तन, कंबल और घरेलू उपयोग की कई वस्तुओं की दुकानें लगती हैं। आसपास के ग्रामीणों के लिए यह अपनी जरूरत का सामान खरीदने और दूसरे इलाकों से आए लोगों से मिलने का अवसर होता है।
मुड़मा जतरा की खासियत यही है कि यहां धार्मिक आस्था, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और ग्रामीण बाजार एक साथ नजर आते हैं। 27 और 28 अक्टूबर को मांडर में लगने वाला यह जतरा 40 पड़हा की परंपरा, झंडा मिलन और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर देगा।
