Saturday, October 24

रांची। झारखंड में खेती-किसानी के इतिहास, परंपरागत कृषि पद्धतियों और आधुनिक तकनीकों को एक ही स्थान पर देखने-समझने का अवसर मिलने वाला है। राजधानी रांची के कांके रोड स्थित कृषि निदेशालय परिसर में राज्य का पहला कृषि संग्रहालय आकार ले रहा है। कृषि भवन के पास लक्ष्मी निवास कोठी में बन रहा यह संग्रहालय लगभग तैयार हो चुका है। इसके 15 नवंबर को लोकार्पण की तैयारी की जा रही है। संग्रहालय में प्राचीन समय से लेकर वर्तमान दौर तक कृषि क्षेत्र में हुए बदलावों, खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों और आधुनिक कृषि तकनीकों के विभिन्न मॉडल प्रदर्शित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य लोगों को कृषि की विकास यात्रा से परिचित कराने के साथ खेती के नए तरीकों की जानकारी देना भी है।

पारंपरिक खेती से आधुनिक तकनीक तक का सफर

इस कृषि संग्रहालय की खासियत यह होगी कि यहां खेती के पुराने तौर-तरीकों और आधुनिक तकनीकों को एक साथ समझा जा सकेगा। प्राचीन कृषि उपकरणों से लेकर आज इस्तेमाल होने वाली उन्नत तकनीकों तक के नमूने और मॉडल रखे जाएंगे। इससे लोगों को यह जानने का मौका मिलेगा कि समय के साथ खेती के तरीकों में किस तरह बदलाव आया है और कृषि क्षेत्र ने तकनीकी विकास के जरिए किस प्रकार नई संभावनाएं विकसित की हैं।

झारखंड जैसे राज्य में, जहां कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बड़ी आबादी की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है, वहां इस तरह का संग्रहालय खेती से जुड़ी जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। किसान, विद्यार्थी और कृषि में रुचि रखने वाले लोग यहां आकर विभिन्न कृषि पद्धतियों को करीब से समझ सकेंगे।

सीढ़ीदार खेती और पशुपालन के मॉडल भी होंगे आकर्षण

संग्रहालय परिसर में झारखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए खेती के अलग-अलग मॉडल तैयार किए जा रहे हैं। इनमें पठारी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेत बनाकर खेती करने की पद्धति को भी प्रदर्शित किया जाएगा। इसके साथ ही खेती और पशुपालन को एक साथ अपनाने की व्यवस्था का मॉडल भी तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि कृषि के साथ पशुपालन को जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने और आर्थिक विकास के अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

इसके अलावा पॉलीहाउस खेती के मॉडल भी लोगों को आकर्षित करेंगे। इन मॉडलों के माध्यम से नियंत्रित वातावरण में फसल उत्पादन और खेती के वैकल्पिक तरीकों की जानकारी दी जाएगी। आधुनिक कृषि पद्धतियों को समझने के इच्छुक लोगों के लिए यह एक उपयोगी शैक्षणिक केंद्र साबित हो सकता है।

ऑर्गेनिक फार्मिंग से ड्रिप इरिगेशन तक की मिलेगी जानकारी

कृषि निदेशालय परिसर में बन रहे इस संग्रहालय में जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग, एकीकृत कृषि प्रणाली यानी इंटीग्रेटेड फार्मिंग, जैविक खाद तैयार करने की तकनीक, पॉलीहाउस फार्मिंग और ड्रिप इरिगेशन सहित कई विषयों पर मॉडल तैयार किए जा रहे हैं।

इन मॉडलों के जरिए खेती की विभिन्न पद्धतियों और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को समझने में मदद मिलेगी। जैविक खाद बनाने की तकनीक के प्रदर्शन से कृषि अपशिष्ट के उपयोग और जैविक खेती की प्रक्रिया की जानकारी मिल सकेगी। वहीं, ड्रिप इरिगेशन का मॉडल पानी के नियंत्रित और लक्षित इस्तेमाल वाली सिंचाई पद्धति को समझने का अवसर देगा।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग के मॉडल में खेती के साथ अन्य कृषि आधारित गतिविधियों को जोड़ने की अवधारणा को प्रदर्शित किया जाएगा। इस तरह संग्रहालय केवल कृषि इतिहास को संजोने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आधुनिक खेती की तकनीकों और संभावनाओं से भी लोगों को परिचित कराएगा।

वेस्टेज धातु से तैयार होगी अन्नदाता की प्रतिमा

संग्रहालय में प्रवेश करते ही आगंतुकों को वेस्टेज धातु से तैयार की जा रही अन्नदाता की प्रतिमा दिखाई देगी। कृषि निदेशक के अनुसार, इस प्रतिमा में गेहूं की बाली और कृषि औजारों के साथ किसान का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। इसके पूरा होने के बाद यह संग्रहालय के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो सकती है। प्रतिमा के माध्यम से खेती-किसानी और अन्न उत्पादन में किसानों की भूमिका को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया जाएगा।

कृषि शिक्षा और शोध के लिए भी होगा उपयोगी

राज्य का पहला कृषि संग्रहालय होने के कारण यह कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यहां प्रदर्शित उपकरणों और मॉडलों के जरिए कृषि के पारंपरिक स्वरूप, आधुनिक तकनीकों तथा खेती की विभिन्न प्रणालियों को समझने में सहायता मिलेगी।

15 नवंबर को प्रस्तावित लोकार्पण के साथ इस संग्रहालय के शुरू होने की उम्मीद है। इसके माध्यम से झारखंड की कृषि विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को खेती के बदलते स्वरूप से परिचित कराने की दिशा में पहल होगी। यदि इसे नियमित शैक्षणिक गतिविधियों और किसानों के प्रशिक्षण से जोड़ा जाता है, तो यह कृषि ज्ञान के प्रसार का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बन सकता है।

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