रांची। किसी मामले में हथियार की बरामदगी का दावा करना और अदालत में आरोपी के खिलाफ उसे विश्वसनीय साक्ष्य के रूप में साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं। जमशेदपुर के अखिलेश सिंह से जुड़े करीब दो दशक पुराने आर्म्स एक्ट मामले में झारखंड हाईकोर्ट का फैसला इसी कानूनी पहलू को सामने लाता है। अदालत ने हथियार बरामदगी के मामले में अखिलेश सिंह को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या अभियोजन पक्ष आरोपी की कथित स्वीकारोक्ति और हथियार की बरामदगी के आधार पर उसके खिलाफ आरोपों को भरोसेमंद तरीके से साबित कर पाया था।
बरामदगी के दावे के बाद भी क्यों नहीं साबित हुआ आरोप?
मामला सिदगोड़ा थाना कांड संख्या 86/2004 से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, 9 अक्टूबर 2004 की रात पूछताछ के दौरान अखिलेश सिंह ने एक क्वार्टर में पिस्टल और कारतूस छिपाकर रखने की जानकारी दी थी। इसके बाद पुलिस टीम ने रात करीब तीन बजे क्वार्टर नंबर 59 में छापेमारी की थी।
पुलिस ने ताला तोड़कर परिसर की तलाशी लेने और बेडरूम की रैक से प्लास्टिक में लिपटी नौ एमएम की पिस्टल बरामद करने का दावा किया था। पुलिस के मुताबिक, पिस्टल की मैगजीन में 12 कारतूस भी मिले थे। इसके बाद आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
हालांकि, अदालत में किसी वस्तु की बरामदगी का विवरण पेश करना ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होता है कि बरामद वस्तु और आरोपी के बीच कानूनी रूप से विश्वसनीय संबंध स्थापित होता है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य इस संबंध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
पांच पुलिसकर्मियों की गवाही भी नहीं आई काम
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पांच पुलिसकर्मियों की गवाही कराई थी। ये सभी कथित छापेमारी दल का हिस्सा थे। पुलिस ने बरामदगी से संबंधित दस्तावेज और स्वीकारोक्ति के कुछ हिस्से भी अदालत में पेश किए थे।
इसके बावजूद जमशेदपुर के 12वें अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 12 अगस्त 2021 को अखिलेश सिंह को बरी कर दिया था। निचली अदालत के फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और निचली अदालत के फैसले पर विचार किया गया। अदालत ने पाया कि कथित स्वीकारोक्ति प्रमाणित नहीं हुई थी। इसके अलावा, जिस परिसर से हथियार बरामद करने का दावा किया गया, उस पर अखिलेश सिंह का नियंत्रण भी साबित नहीं हो सका।
आरोपी का परिसर पर नियंत्रण साबित करना क्यों था अहम?
इस मामले में परिसर पर नियंत्रण का सवाल महत्वपूर्ण रहा। किसी स्थान से हथियार मिलने मात्र से यह स्वतः साबित नहीं हो जाता कि उस हथियार पर किसी खास व्यक्ति का कब्जा था या उसे उसी ने वहां रखा था। अभियोजन पक्ष को परिस्थितियों और साक्ष्यों के जरिए आरोपी तथा बरामद हथियार के बीच संबंध स्थापित करना होता है।
हाईकोर्ट के सामने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कथित स्वीकारोक्ति और परिसर पर नियंत्रण से जुड़ी कमियां दूर नहीं हो सकीं। ऐसे में हथियार की बरामदगी को अखिलेश सिंह के खिलाफ भरोसेमंद साक्ष्य मानने का आधार नहीं मिला। अदालत के निष्कर्ष का केंद्र यही था कि आरोप साबित करने के लिए प्रस्तुत सामग्री पर्याप्त नहीं थी।
सरकार की अपील खारिज, बरी करने का फैसला बरकरार
राज्य सरकार ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। लेकिन हाईकोर्ट को अपील में ऐसा ठोस आधार नहीं मिला, जिसके आधार पर बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप किया जा सके। अदालत ने अपील की अनुमति और देरी माफ करने से जुड़े आवेदन भी खारिज कर दिए।
इसके साथ ही 12 अगस्त 2021 को निचली अदालत द्वारा सुनाया गया बरी करने का फैसला बरकरार रहा। इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि अभियोजन पक्ष की ओर से बरामदगी का दावा और पुलिसकर्मियों की गवाही होने के बावजूद दोषसिद्धि के लिए जरूरी साक्ष्यगत आधार स्थापित नहीं हो पाया।
इस मामले का अहम पहलू: हाईकोर्ट का फैसला हथियार बरामदगी के दावे को अपने आप में दोषसिद्धि का आधार मानने के बजाय आरोपी से उसके संबंध और अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर केंद्रित रहा।


