एशियन गेम्स के कुश्ती मैट पर भारत ने एक ऐसा ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है, जिसका इंतजार देश पिछले 64 लंबे वर्षों से कर रहा था। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स में भारतीय पहलवान नितेश सिवाच ने पुरुषों की ग्रीको-रोमन 97 किग्रा स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत (सिल्वर) पदक अपने नाम किया। फाइनल मुकाबले में भले ही उन्हें कड़े संघर्ष के बाद हार का सामना करना पड़ा और स्वर्ण पदक से चूक गए, लेकिन उनका यह रजत पदक भारतीय कुश्ती इतिहास के सबसे स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज हो गया है।

स्वर्ण के करीब पहुंचकर चूके नितेश, जापानी पहलवान ने दी कड़ी टक्कर
गुरुवार को खेले गए खिताबी मुकाबले में नितेश सिवाच का मुकाबला जापान के मजबूत पहलवान यूरी नकाजातो से था। मुकाबले की शुरुआत से ही दोनों के बीच गजब की रस्साकसी देखने को मिली। जापानी पहलवान ने रणनीति के तहत नितेश को मैट पर आगे धकेलकर शुरुआती बढ़त हासिल की। इसके बाद स्थानीय समर्थन और आक्रामक दांव-पेंच का फायदा उठाते हुए यूरी नकाजातो ने नितेश का संतुलन बिगाड़ा और स्कोर 4-0 कर दिया। मैच के अंतिम पलों में नितेश ने जोरदार वापसी की कोशिश की और आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन जापानी डिफेंस को भेदना आसान नहीं था। अंततः नितेश को 0-4 से हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा। इस हार के बावजूद पूरे देश में उनके इस प्रदर्शन की सराहना हो रही है, क्योंकि उन्होंने भारत के ग्रीको-रोमन सूखे को समाप्त कर दिया है।
सफर जो प्रेरणा बन गया: क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल का सफर
फिनाले तक पहुंचने का नितेश का सफर बेहद शानदार और तूफानी रहा था। क्वार्टर फाइनल मुकाबले में उन्होंने तुर्कमेनिस्तान के अमानबर्दी अगमाममेदोव को 7-1 के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी थी। इसके बाद सेमीफाइनल में उन्होंने मंगोलिया के मजबूत पहलवान गंखुयाग गानबातार के खिलाफ ऐतिहासिक मैट प्रदर्शन किया और मुकाबले के शुरुआती मिनटों में ही 9-0 से एकतरफा जीत दर्ज कर फाइनल का टिकट कटाया था।
64 साल पुराना वो इतिहास, जिसे नितेश ने दोहराया
भारतीय कुश्ती के इतिहास में ग्रीको-रोमन शैली हमेशा से एक कठिन चुनौती रही है। एशियाई खेलों में भारत की ओर से ग्रीको-रोमन शैली में अंतिम बार स्वर्ण पदक साल 1962 में आए थे। तब दिग्गज पहलवान मालवा सिंह (52 किग्रा) और गणपत अंडालकर (97 किग्रा से अधिक) ने देश के लिए गोल्ड मेडल जीते थे।
इसके बाद के दशकों में भारतीय पहलवान फ्री-स्टाइल कुश्ती में तो लगातार चमक बिखेरते रहे, लेकिन ग्रीको-रोमन स्पर्धा में पोडियम तक पहुंचना देश के लिए एक अधूरा सपना बन गया था। साल 1962 के बाद यह पहला मौका है जब किसी भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान ने एशियन गेम्स के फाइनल में कदम रखा और देश के लिए सिल्वर मेडल जीता।
संघर्षों से भरी रही है नितेश की यह कहानी
हरियाणा के सोनीपत जिले के छोटे से गांव जगसी के रहने वाले नितेश सिवाच का यहां तक का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनके पिता आनंद सिवाच दूध का छोटा सा कारोबार करते हैं। शुरुआती दिनों में क्रिकेट के प्रति झुकाव रखने वाले नितेश ने बाद में प्रताप स्पोर्ट्स School में कोच ओम प्रकाश दहिया के मार्गदर्शन में कुश्ती के दांव-पेंच सीखे। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने और पिता का हाथ बंटाने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर दूध बांटने का काम भी किया था।
चोटों और तमाम संघर्षों को मात देते हुए उन्होंने साल 2019 की कैडेट एशियन चैंपियनशिप में सिल्वर, 2022 की अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज और 2025 तथा 2026 की सीनियर एशियन चैंपियनशिप में भी पदक जीते। अब एशियन गेम्स में यह ऐतिहासिक रजत पदक जीतकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि पक्के इरादों के आगे बड़े से बड़ा पहाड़ भी बौना साबित हो जाता है।


