नई दिल्ली: विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के संवैधानिक अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण चर्चा हुई है। अदालत ने पत्रकारिता के पेशे की प्रकृति और पत्रकारों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के संकेत दिए हैं। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि पत्रकार एक साथ दो अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार या पेशा करने का अधिकार। इस वजह से पत्रकारों को मिलने वाली सुरक्षा का महत्व और बढ़ जाता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणियों के लिए उपलब्ध सुरक्षा के स्तर पर विचार करने की आवश्यकता बताई। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने डिजिटल दौर में पत्रकारों की पहचान तय करने से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों को सामने रखा।
पत्रकारों के पास दो संवैधानिक अधिकार: CJI सूर्यकांत
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि पत्रकारिता केवल विचार व्यक्त करने तक सीमित नहीं है। पत्रकार अपने पेशे के तहत घटनाओं की जानकारी जुटाते हैं, तथ्यों की पड़ताल करते हैं और उन्हें आम लोगों तक पहुंचाते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। वहीं, अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई पेशा अपनाने, व्यवसाय या व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। पत्रकारिता के संदर्भ में ये दोनों अधिकार महत्वपूर्ण हैं।
प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को घटनाओं की जानकारी जुटाने, मौके की स्थिति समझने और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने लाने के लिए काम करना पड़ता है। ऐसे में उनके काम की स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अहम हो जाते हैं।
हालांकि, इन अधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि पत्रकार कानून से ऊपर हैं या उन्हें हर परिस्थिति में बिना किसी प्रतिबंध के काम करने की छूट मिल जाती है। संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कानून के दायरे में ही किया जाता है।
मान्यता प्राप्त पत्रकारों और फ्रीलांसरों के लिए क्या होगा नियम?
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने पत्रकारों की विभिन्न श्रेणियों को मिलने वाली सुरक्षा के स्तर की जांच करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस चर्चा में मान्यता प्राप्त पत्रकारों, फ्रीलांस पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच अंतर का सवाल सामने आया।
मान्यता प्राप्त पत्रकारों की पहचान अक्सर संस्थागत या सरकारी मान्यता के माध्यम से की जा सकती है। इसके विपरीत, फ्रीलांसर और स्वतंत्र पत्रकार किसी एक मीडिया संस्थान से जुड़े बिना भी समाचार संकलन और रिपोर्टिंग कर सकते हैं। कई पत्रकार डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी अपना काम करते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या पत्रकारों को मिलने वाली सुरक्षा का निर्धारण केवल उनकी आधिकारिक मान्यता के आधार पर होना चाहिए या उनके वास्तविक काम, रिपोर्टिंग की प्रकृति और पेशेवर गतिविधियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए?
अदालत की चर्चा इसी व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करती है। हालांकि, उपलब्ध विवरण के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने इन श्रेणियों के लिए कोई अंतिम नियम या अलग-अलग सुरक्षा व्यवस्था तय कर दी है।
डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान करना चुनौती: तुषार मेहता
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पत्रकारों की पहचान तय करने में आ रही कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाया। उनका तर्क था कि डिजिटल युग में पत्रकार और सामान्य सोशल मीडिया उपयोगकर्ता के बीच अंतर करना पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है।
आज विरोध-प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोग मोबाइल फोन से वीडियो बनाते हैं, तस्वीरें साझा करते हैं और रील्स अपलोड करते हैं। ऐसे में केवल वीडियो रिकॉर्ड करने या उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आधार पर किसी व्यक्ति को पत्रकार मानने में व्यावहारिक कठिनाई हो सकती है।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचार संकलन और प्रसार के तरीकों को बदल दिया है। कई स्वतंत्र पत्रकार बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़े घटनास्थल पर रिपोर्टिंग करते हैं, जबकि अन्य लोग केवल अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर सामग्री साझा करते हैं।
इस परिस्थिति में पत्रकार की पहचान के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक मानदंडों की जरूरत का सवाल उठता है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि पहचान तय करने की प्रक्रिया स्वतंत्र पत्रकारिता के रास्ते में अनावश्यक बाधा न बने।
कुछ पत्रकारों को मिल सकती है अतिरिक्त सुरक्षा
सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि पत्रकारों की कुछ श्रेणियों को सुरक्षा का अतिरिक्त स्तर देने की आवश्यकता हो सकती है। यह टिप्पणी प्रदर्शन स्थलों पर काम करने वाले पत्रकारों की परिस्थितियों और उनकी पेशेवर जिम्मेदारियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
विरोध-प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को घटनाओं की रिपोर्टिंग, संबंधित लोगों से बातचीत और मौके की स्थिति का दस्तावेजीकरण करना पड़ सकता है। ऐसे माहौल में उनके अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न सामने आ सकते हैं।
हालांकि, अतिरिक्त सुरक्षा का स्वरूप क्या होगा, यह किन पत्रकारों पर लागू होगी और इसके लिए क्या मानदंड अपनाए जाएंगे—इन सवालों पर अंतिम निर्णय के बारे में उपलब्ध विवरण में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। इसलिए अदालत की टिप्पणी को अंतिम आदेश या स्थापित कानूनी नियम के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन का सवाल
सुप्रीम कोर्ट में हुई यह चर्चा पत्रकारिता की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और डिजिटल दौर में उनकी पहचान से जुड़े व्यापक सवालों को सामने लाती है।
एक ओर, पत्रकारों को घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने के लिए उपयुक्त परिस्थितियां मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, पत्रकार होने के दावे की पहचान और पेशेवर गतिविधियों की प्रकृति को लेकर स्पष्टता भी आवश्यक है।
इस पूरे मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अदालत की अंतिम व्यवस्था यह स्पष्ट कर सकती है कि प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करने वाले विभिन्न प्रकार के पत्रकारों के संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा का आकलन किन आधारों पर किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने पत्रकारों के संवैधानिक अधिकारों और प्रदर्शन स्थलों पर उनकी सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण बहस को रेखांकित किया है। फिलहाल, उपलब्ध विवरण के अनुसार अदालत ने अलग-अलग श्रेणियों के पत्रकारों को मिलने वाली सुरक्षा पर विचार करने के संकेत दिए हैं; इसे किसी अंतिम फैसले या लागू हो चुके नए नियम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।


