नई दिल्ली/रांची। खनिज संपदा से जुड़े राजस्व को लेकर केंद्र और राज्यों के अधिकारों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। लोकसभा ने बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच ‘खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया। विधेयक में राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर अपनी ओर से अतिरिक्त कर, उपकर यानी सेस या अन्य शुल्क लगाने से रोकने का प्रावधान किया गया है। विधेयक के कानून बनने की स्थिति में इसका असर खनिज संपदा वाले राज्यों, खासकर झारखंड, के राजस्व पर पड़ सकता है।
हंगामे के बीच लोकसभा से पारित हुआ विधेयक
बुधवार को सदन में विपक्ष का विरोध लगातार जारी रहा। दोपहर करीब 2 बजे एफसीआरए विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति भेजने का प्रस्ताव पारित होने के बाद पीठासीन सभापति जगदंबिका पाल ने सदन की कार्यवाही 3 बजे तक स्थगित कर दी।
कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने विपक्षी सदस्यों के विरोध के बीच खान एवं खनिज संशोधन विधेयक को चर्चा और पारित करने के लिए सदन में रखा। आरएसपी सांसद एनके प्रेमचंद्रन समेत कुछ विपक्षी सदस्यों ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे संविधान और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया। हालांकि, हंगामे के बीच विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इसके बाद विपक्ष के लगातार विरोध के चलते सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई।
खनिज वाली जमीन पर भी केंद्र के नियम होंगे प्रभावी
विधेयक में केवल राज्यों की अतिरिक्त शुल्क लगाने की शक्ति को सीमित करने का प्रावधान ही नहीं है। इसके तहत खनिज संपदा से जुड़ी भूमि के विनियमन को भी निर्धारित केंद्रीय मानकों और प्रावधानों के दायरे में लाने की बात कही गई है।
यानी कानून लागू होने के बाद खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी तरह का कर या शुल्क लगाने का अधिकार राज्यों के स्तर पर पहले जैसा नहीं रहेगा। ऐसे शुल्क केंद्र द्वारा तय शर्तों, सीमाओं और रॉयल्टी से जुड़े प्रावधानों के अनुरूप होंगे।
झारखंड के खनन राजस्व पर पड़ सकता है असर
इस बदलाव का झारखंड पर खास असर इसलिए पड़ सकता है, क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन और खनिज राजस्व की महत्वपूर्ण भूमिका है।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में झारखंड के खनन विभाग को 18,730.91 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। इसमें 7,487.91 करोड़ रुपये सेस के रूप में शामिल थे।
वहीं, वित्तीय वर्ष 2024-25 में खनन विभाग की कुल वसूली 11,848.15 करोड़ रुपये थी। इसमें सेस से करीब 1,380 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे।
इन आंकड़ों से साफ है कि खनिजों से मिलने वाला सेस राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत रहा है।
मंईयां सम्मान योजना पर भी वित्तीय दबाव की आशंका
खनिज सेस में बदलाव का असर झारखंड की प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इनमें मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना प्रमुख है।
महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग की इस योजना के तहत राज्य की 51 लाख से अधिक महिलाओं को प्रतिमाह 2,500 रुपये की सहायता दी जा रही है।
सरकार ने योजना के लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में 14,065.57 करोड़ रुपये और 2026-27 में 13,363.35 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया था।
दिए गए विवरण के अनुसार, झारखंड मिनिरल बेयरिंग लैंड सेस एक्ट, 2024 के तहत खनिजों से मिलने वाले सेस से प्राप्त राशि का इस्तेमाल राज्य सरकार मंईयां सम्मान योजना सहित अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में करती है।
ऐसे में अगर प्रस्तावित केंद्रीय कानून के लागू होने के बाद राज्य के सेस संबंधी अधिकार और राजस्व प्रभावित होते हैं, तो सरकार के सामने इन योजनाओं के वित्तपोषण को लेकर अतिरिक्त चुनौती खड़ी हो सकती है।
क्या कहता है प्रस्तावित प्रावधान?
विधेयक में मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण बदलाव बताए गए हैं-
1. अतिरिक्त कर पर रोक: राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर अपनी ओर से नया कर, सेस या अन्य शुल्क नहीं लगा सकेंगी।
2. केंद्रीय प्रावधानों के तहत शुल्क: खनिज भूमि से जुड़े कर या शुल्क केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों, सीमाओं और रॉयल्टी व्यवस्था के अनुरूप होंगे।
3. पुराने बकाये पर प्रावधान: कानून लागू होने से पहले राज्यों द्वारा लगाया गया लेकिन वसूल नहीं किया गया ऐसा कर या शुल्क, विधेयक के प्रावधानों के तहत अवैध माना जा सकता है।
अब आगे क्या?
लोकसभा से पारित होने के बाद विधेयक को अब राज्यसभा से पारित होना और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद ही यह कानून का रूप लेगा।
यदि प्रस्तावित प्रावधान लागू होते हैं, तो झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए राजस्व प्रबंधन और सामाजिक कल्याण योजनाओं के वित्तपोषण को लेकर नई परिस्थितियां बन सकती हैं। खासकर मंईयां सम्मान योजना जैसी बड़ी योजनाओं के लिए वैकल्पिक राजस्व स्रोत जुटाना राज्य सरकार के सामने अहम चुनौती हो सकती है।
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