देवघर में 14 वर्षीय अक्षत केसरी की मौत ने जसीडीह के एक निजी नशा मुक्ति केंद्र की कार्यप्रणाली, वहां नाबालिगों की सुरक्षा, संचालकों की जवाबदेही और पुलिस जांच को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का आरोप है कि जिस बच्चे को नशे की लत छुड़ाने के लिए नाबालिग केन्द्र में भर्ती कराया वहां ऐसी मारपीट और प्रताड़ना हुई, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
अक्षत के परिवार के अनुसार, यह महज एक बच्चे की मौत का मामला नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम में ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब पुलिस और प्रशासन को देना चाहिए – अक्षत को केंद्र में भर्ती करने से लेकर उसकी मौत तक क्या हुआ? केंद्र में मौजूद कर्मचारियों और बाउंसरों की भूमिका क्या थी? सीसीटीवी फुटेज कहां है? परिजनों को समय पर सूचना क्यों नहीं दी गई? और सबसे अहम – जब दो आरोपियों को हिरासत में लिया गया, तो केंद्र के संचालक कृष्णा मुखर्जी को किस भूमिका के आधार पर PR बाउंड पर छोड़ा गया ? दरअसल, इसके पीछे बंगाल के दो विधायकों का नाम सामने आ रहा है जिनके संरक्षण में इस फाउंडेशन की संचालिका कृष्णा बनर्जी हैं. यही कारण है कि पुलिस उनपर कारर्वाई करने से कतरा रही है.
गलत संगति से नशे की गिरफ्त में था अक्षत
परिवार के अनुसार, अक्षत केसरी गलत संगति में पड़ गया था। वह अपनी उम्र से बड़े बच्चों के संपर्क में आया और उनके साथ नशा करने लगा। एक-दो बार वह नशे की हालत में घर भी पहुंचा। इसके बाद परिवार को चिंता हुई कि आसपास के कम उम्र के बच्चे भी नशीले पदार्थों की गिरफ्त में आ रहे हैं और उन्हें नशीले पदार्थ उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
परिवार ने इस संबंध में नजदीकी थाना जाकर शिकायत की और मदद मांगी। प्रशासन द्वारा उन्हें अक्षत को नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराने की सलाह दी गई तथा सरकारी नशा मुक्ति केंद्र का पता बताया गया। जब परिवार सरकारी केंद्र पहुंचा तो वहां उन्हें बताया गया कि नाबालिगों को वहां नहीं रखा जाता। इसी दौरान उन्हें जसीडीह स्थित रूद्र फाउंडेशन नशा मुक्ति केंद्र की जानकारी दी गई।
यहीं से अक्षत की जिंदगी का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसका अंत कुछ ही दिनों बाद उसकी मौत के रूप में हुआ।
17 जुलाई को सिर्फ जानकारी लेने पहुंचे थे, उसी दिन भर्ती कर लिया गया
परिवार के अनुसार, 17 जुलाई को वे रूद्र फाउंडेशन नशा मुक्ति केंद्र की स्थिति और व्यवस्था की जानकारी लेने पहुंचे थे। अक्षत भी उनके साथ था। परिवार ने केंद्र को देखा, वहां की व्यवस्था के बारे में जानकारी ली और ऑनलाइन उपलब्ध रिव्यू भी देखे। उन्हें केंद्र भरोसेमंद लगा। इसी दौरान केंद्र के लोगों ने परिवार से कहा कि बच्चा अभी साथ आया है, इसलिए उसे उसी दिन भर्ती कर देना बेहतर होगा। यह भी कहा गया कि अगर बच्चा वापस चला गया तो उसे दोबारा केंद्र लाने में परेशानी हो सकती है।
केंद्र के संचालक और कर्मचारियों की बात तथा वहां दिखाई गई व्यवस्थाओं पर भरोसा करते हुए परिवार ने अक्षत को उसी दिन भर्ती करा दिया। भर्ती के समय 9,000 रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर किए गए। राशि कृष्णा मुखर्जी के खाते में भेजी गई थी।

उन्हें यह भरोसा दिया गया कि लगभग एक महीने तक बच्चे की परिजनों से फोन पर बातचीत नहीं कराई जाएगी और केंद्र की ओर से फोटो और वीडियो के माध्यम से बच्चे की स्थिति की जानकारी दी जाती रहेगी। परिवार का कहना है कि केंद्र में सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी भी दिखाई गई और उन्हें बच्चे की सुरक्षा का भरोसा दिया गया।
इन्हीं आश्वासनों के आधार पर परिवार ने अपने इकलौते बेटे को वहां छोड़ दिया।
18 जुलाई को पिता को बेटे से मिलने से रोका गया
अगले ही दिन यानी 18 जुलाई को अक्षत के पिता उसके लिए जरूरी सामान लेकर केंद्र की ओर जा रहे थे। परिवार के मुताबिक, रास्ते में केंद्र का एक कर्मचारी उन्हें मिला और उसने कहा कि अगर अक्षत अपने पिता को देखेगा तो भावुक हो जाएगा। कर्मचारी ने कहा कि सामान उसे दे दिया जाए, वह स्वयं केंद्र लेकर जा रहा है। इस तरह अक्षत के पिता अपने बेटे से मिले बिना वापस लौट गए और सामान कर्मचारी को सौंप दिया गया।
परिवार का कहना है कि 21 जुलाई तक केंद्र से अक्षत के बारे में फोटो और वीडियो के माध्यम से जानकारी मिलती रही। इसलिए उस समय तक परिवार को किसी गंभीर अनहोनी का अंदेशा नहीं था।

22 जुलाई को अचानक बदला व्यवहार
22 जुलाई को परिवार ने केंद्र से संपर्क किया। परिवार के अनुसार, उन्हें बताया गया कि अक्षत खाना खाकर सो चुका है और किसी दूसरे बच्चे की तबीयत खराब होने के कारण कर्मचारी उस पर ध्यान दे रहे हैं। इसके बाद बातचीत समाप्त कर दी गई। उनके अनुसार उन्हें अक्षत की वास्तविक स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
अगले दिन यानी 23 जुलाई को केंद्र की ओर से उन्हें फोन आया कि अक्षत की तबीयत खराब है और वे आकर उससे मिल लें। परिवार ने फोन पर स्थिति के बारे में और जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कथित तौर पर उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला। इसके बाद वह तुरंत केंद्र पहुंचे ।
केंद्र पहुंचते ही सामने आया भयावह दृश्य
परिवार के अनुसार, जब वे रूद्र फाउंडेशन पहुंचे तो वहां काफी भीड़ थी और पुलिस भी मौजूद थी।
मिली जानकारी के अनुसार उन्होंने केंद्र के संचालक कृष्णा मुखर्जी के साथ एक पुलिस अधिकारी के चाय पीने की स्थिति उन्होंने देखी। जब परिजन अंदर गए तो उन्होंने अक्षत को कमरे में जमीन पर बेजान हालत में पड़ा देखा। जब परिजन सवाल करने लगे और अपनी आवाज उठाई तो परिवार के मुताबिक वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें शांत रहने और पुलिस को अपना काम करने देने को कहा।
अस्पताल ले जाया गया, लेकिन मौत पहले ही हो चुकी थी?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 23 जुलाई को रूद्र फाउंडेशन के लोग अक्षत को गंभीर हालत में जसीडीह सीएचसी लेकर गए थे। वहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद उसे वापस केंद्र लाया गया और लगभग दोपहर 1 बजे परिवार को फोन कर बताया गया कि उसके बेटे की तबीयत खराब है और वे आकर मिल लें।

यह घटनाक्रम अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है – यदि अक्षत को अस्पताल ले जाया गया था और वहां उसे मृत घोषित किया जा चुका था, तो परिवार को उसकी मौत की सूचना तत्काल और स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दी गई?
संचालक का बयान आश्चर्यजनक
परिवार के अनुसार, केंद्र के संचालक कृष्णा मुखर्जी ने यह बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि अक्षत छत से गिर गया है और गंभीर रूप से घायल हुआ है। लेकिन जब वह मौके पर पहुंचे तो अक्षत की मौत हो चुकी थी। दूसरी ओर, बाद की जांच में सामने आए बयानों और परिवार को मिली जानकारी के अनुसार, अक्षत के साथ 22 जुलाई को मारपीट किए जाने की बात सामने आई।
यहीं से मामले की कहानी में सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
अगर अक्षत छत से गिरा था, तो उसके शरीर पर चोटों की प्रकृति क्या कहती है?
अगर उसकी मौत मारपीट के बाद हुई, तो 22 जुलाई से 23 जुलाई तक केंद्र में क्या हुआ?
और यदि केंद्र में मौजूद लोगों को उसकी गंभीर हालत की जानकारी थी, तो परिवार को समय रहते क्यों नहीं बताया गया?
इन सवालों का जवाब जांच एजेंसियों को देना होगा।
दो आरोपी हिरासत में, लेकिन संचालक PR बाउंड पर बाहर
मामले में बाद में दो लोगों – अभिरभाव मुखर्जी और अंकित को हिरासत में लिया गया। अभिरभाव मुखर्जी केंद्र संचालक कृष्णा मुखर्जी का पुत्र है। वहीं अंकित पहले स्वयं इस नशा मुक्ति केंद्र में मरीज के रूप में आया था और बाद में वहीं स्टाफ के तौर पर काम करने लगा।
यही व्यवस्था अब जांच के घेरे में है।
क्या किसी पूर्व मरीज को नशा मुक्ति केंद्र में स्टाफ की जिम्मेदारी देने से पहले उसकी पृष्ठभूमि और मानसिक एवं शारीरिक स्थिति की विधिवत जांच की गई थी? क्या यह सुनिश्चित किया गया था कि वह नशा मुक्ति के बाद पूरी तरह स्वस्थ और जिम्मेदारी संभालने के योग्य है? क्या उसके पास नाबालिग बच्चों की देखभाल या उनके साथ व्यवहार करने का कोई प्रशिक्षण था?
इन सवालों का जवाब सिर्फ रूद्र फाउंडेशन ही नहीं, बल्कि संबंधित विभाग की भी जिम्मेदारी है।
अभद्र भाषा बर्दास्त नहीं: अभिरभाव मुख़र्जी
परिवार को मिली जानकारी के अनुसार, आसनसोल से गिरफ्तार किए गए अभिनव मुखर्जी के कथित कबूलनामे में यह बात सामने आई कि अक्षत काफी गाली-गलौज करता था और इसी वजह से उसके साथ मारपीट की गई। 22 जुलाई को सुबह करीब 10 बजे से शाम 5 बजे तक अक्षत के साथ मारपीट की गई और उसे गंभीर हालत में छोड़ दिया गया। समाये पर इलाज नहीं होने के कारन नाबालिक ने अपना दम तोड़ दिया। 24 जुलाई को मिली पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स के अनुसार अक्षत की मौत तक़रीबन 24 घंटे पूर्व ही हो गयी थी। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो अक्षत ने अपना दम 22 जुलाई को ही तोड़ दिया था।
सिर्फ अक्षत नहीं, दूसरे बच्चें भी किये गए प्रताड़ित
अक्षत की मौत के बाद केंद्र में मौजूद अन्य बच्चों के संबंध में भी गंभीर जानकारी सामने सामने आये है।
परिवार और प्राप्त जानकारी के अनुसार, वहां मौजूद करीब 11 अन्य लोगों की स्थिति भी गंभीर बताई गई। उनसे पूछताछ में यह जानकारी सामने आई कि अभिरभाव मुखर्जी और अंकित द्वारा उनके साथ भी मारपीट और प्रताड़ना की जाती थी।

रूद्र फाउंडेशन में लंबे समय से बच्चों और मरीजों के साथ हिंसक व्यवहार हो रहा था और इसकी जानकारी किसी जिम्मेदार अधिकारी को थी या नहीं?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर परिवार का दावा
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अक्षत के शरीर पर गंभीर चोटों के संकेत मिले हैं। परिवार का दावा है कि उसके सीने के पास ब्लड क्लॉटिंग थी और उसे करंट दिए जाने की बात भी सामने आई है। यदि पोस्टमार्टम रिपोर्ट वास्तव में शरीर पर गंभीर चोटों और विद्युत प्रवाह से संबंधित चोटों की पुष्टि करती है, तो ‘छत से गिरने’ की कहानी पर मुख्या संचालक के बयान का क्या?
मौत वाले दिन अचानक 12 से 15 हजार लीटर पानी क्यों आया?
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र में सामान्य दिनों में करीब 2 से 3 हजार लीटर पानी प्रतिदिन आता था। लेकिन जिस दिन अक्षत की मौत हुई, उस दिन करीब 12 से 15 हजार लीटर पानी मंगाया गया था।
परिवार को आशंका है कि कहीं यह किसी संभावित साक्ष्य को मिटाने की कोशिश तो नहीं थी।
सीसीटीवी फुटेज की जांच कहां तक पहुंची?
परिवार का सबसे बड़ा सवाल केंद्र के सीसीटीवी कैमरों को लेकर है। उनका कहना है कि भर्ती के समय उन्हें केंद्र में कैमरों की निगरानी दिखाई गई थी। ऐसे में 22 और 23 जुलाई की घटनाओं को समझने के लिए सीसीटीवी फुटेज बेहद महत्वपूर्ण है।
22 जुलाई सुबह से 23 जुलाई तक का फुटेज सुरक्षित किया गया या नहीं? अक्षत को किसने कमरे में ले जाया? उसके साथ कौन-कौन लोग थे? किस समय उसकी हालत बिगड़ी? उसे अस्पताल कौन लेकर गया? केंद्र से बाहर निकलने और वापस आने का पूरा रिकॉर्ड कहाँ है? परिवार का आरोप है कि अब तक उन्हें सीसीटीवी जांच के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।
केंद्र में बाउंसर थे तो उनकी भूमिका की जांच क्यों नहीं?
परिवार के अनुसार, रूद्र फाउंडेशन में बाउंसर भी मौजूद रहते थे। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि केंद्र में सुरक्षा के लिए बाउंसर तैनात थे, तो 14 वर्षीय बच्चे के साथ कथित तौर पर इतनी गंभीर घटना कैसे हुई? 22 जुलाई को कौन-कौन बाउंसर ड्यूटी पर थे?
क्या उनसे पुलिस ने पूछताछ की?
परिवार का आरोप है कि इन बिंदुओं पर उन्हें अब तक संतोषजनक जानकारी नहीं मिली है।
कृष्णा मुखर्जी को PR बॉन्ड पर छोड़े जाने पर सवाल
मामले में अभिरभाव मुखर्जी और अंकित के हिरासत में होने की जानकारी के बीच परिवार का सवाल केंद्र के मुख्य संचालक कृष्णा मुखर्जी को लेकर है। कृष्णा मुखर्जी को PR बॉन्ड पर छोड़ दिया गया। जब घटना उसी केंद्र में हुई, जिसका संचालन कृष्णा मुखर्जी करते थे, तो उनकी भूमिका की गहन जांच क्यों नहीं की गई?

परिवार की मांग है कि कृष्णा मुखर्जी की भूमिका की भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो।
सवाल सिर्फ अक्षत की मौत का नहीं, केंद्र की पूरी व्यवस्था का है
नशा मुक्ति केंद्र वह जगह होती है जहां परिवार अपने सबसे कमजोर दौर में अपने बच्चों और परिजनों को लेकर पहुंचते हैं। वहां आने वाला मरीज पहले से ही मानसिक, शारीरिक और सामाजिक परेशानियों से जूझ रहा होता है। ऐसे में उसके साथ संवेदनशील और प्रशिक्षित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।
अगर किसी मरीज के गाली देने, व्यवहार में आक्रामकता या अनुशासन संबंधी समस्या होने पर उसके साथ मारपीट की जाती है, तो यह इलाज नहीं बल्कि एक और गंभीर हिंसा है।
अक्षत के मामले में कथित तौर पर यह कहा गया कि वह गाली-गलौज करता था। लेकिन सवाल है कि क्या किसी 14 वर्षीय बच्चे का गाली देना उसके साथ घंटों मारपीट करने का कारण बन सकता है? क्या नशा मुक्ति केंद्र में अनुशासन बनाए रखने का तरीका हिंसा है?क्या कर्मचारियों को बच्चों को नियंत्रित करने के लिए मारपीट की अनुमति थी? और यदि नहीं, तो ऐसी घटना को रोकने के लिए केंद्र में क्या व्यवस्था थी?
क्या मानसिक रूप से पीड़ित है अभिरभाव मुख़र्जी?
परिवार और झारखंड डिजिटल को प्राप्त बताए गए कुछ साक्ष्यों के अनुसार, अभिनव मुखर्जी के संबंध में महिलाओं के साथ अभद्र भाषा के इस्तेमाल, ब्लैकमेलिंग और पैसों की मांग जैसे आरोप हैं।
प्रस्तुत कॉल रिकॉर्डिंग में अभिरभाव मुखर्जी, उनकी मां कृष्णा मुखर्जी और एक महिला के बीच बातचीत होने की जा रही है। इस बातचीत में बेहद आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है।
[Video Link]:- नाबालिग हत्याकांड का खौफनाक सच….
इसके अलावा कुछ महिलाओं की ओर से यह आरोप लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है कि उन्हें निजी तस्वीरों के नाम पर ब्लैकमेल किया गया, पैसे की मांग की गई और तस्वीरें सार्वजनिक करने की धमकी दी गई।

कुछ आरोपों में शारीरिक प्रताड़ना, एसिड अटैक और बेचने जैसी धमकियाँ भी शामिल है।
परिवार का आरोप है कि अक्षत के साथ मारपीट पहली घटना नहीं थी। केंद्र में मौजूद अन्य लोगों के संबंध में भी प्रताड़ना और मारपीट की शिकायतें सामने आने की बात कही गई है।
नशा मुक्ति केंद्र जैसी संवेदनशील संस्था का संचालन केवल एक भवन, कुछ कमरे और कर्मचारियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसी जगहों पर मरीजों की सुरक्षा, प्रशिक्षित स्टाफ, मेडिकल व्यवस्था, रिकॉर्ड, निगरानी, आपातकालीन प्रोटोकॉल और शिकायत निवारण की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए अब प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि रूद्र फाउंडेशन को किस प्रक्रिया के तहत संचालन की अनुमति मिली थी।
क्या लाइसेंस या अनुमति देने से पहले संचालक और कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांच हुई थी? क्या वहां प्रशिक्षित काउंसलर और मेडिकल स्टाफ मौजूद थे? क्या पूर्व मरीज को स्टाफ के रूप में नियुक्त करने से पहले कोई सत्यापन किया गया था? क्या केंद्र का नियमित निरीक्षण होता था?
अक्षत को नशे से बचाने के लिए परिवार ने उसे केंद्र में छोड़ा था। सवाल अब यह है कि जिस जगह को उसके लिए सुरक्षा और सुधार का स्थान होना था, वहीं उसकी मौत का कारन बन गई।
अक्षत अब वापस नहीं आएगा। लेकिन एक निष्पक्ष जांच यह जरूर तय कर सकती है कि उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन था, घटना को रोकने में किस स्तर पर चूक हुई और क्या किसी अन्य परिवार के बच्चे को भविष्य में ऐसी जगह पर भेजना सुरक्षित है।
न्याय सिर्फ दोषी को सजा देने का नाम नहीं है। न्याय यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी दूसरे परिवार को अपने बच्चे को खोने के बाद ऐसे सवालों के जवाब के लिए दर-दर न भटकना पड़े।


