झारखंड की पुलिस व्यवस्था इन दिनों एक गंभीर कैडर संकट से जूझ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है आईपीएस अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के प्रति बढ़ता रुझान, और उससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि जो अधिकारी एक बार केंद्र में जा चुके हैं, वे राज्य में वापस लौटने के इच्छुक नहीं दिख रहे। इसका सीधा असर राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक दक्षता पर पड़ रहा है। हालांकि, राज्य में पदस्थ आईपीएस अधिकारियों का केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना अनिवार्य नहीं है, यह अधिकारी की इच्छा पर निर्भर है कि वह केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना चाहते हैं या नहीं. लेकिन इसके बावजूद आईपीएस अधिकारियों का केन्द्र सेवा के प्रति मोह अधिक देखा जा रहा है। फिलहाल , जमशेदपुर के पूर्व एसएसपी पियूष पांडेय और सरायकेला की पूर्व एसपी निधि द्विवेदी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं. दोनों ही अधिकारियों को कुछ दिनों पूर्व राज्य सरकार ने कार्य में लापरवाही बरतने के लिए निलंबित कर दिया था।
केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का क्या है नियम
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने SP और DIG रैंक के IPS अधिकारियों के लिए केंद्र में IGP पद पर नियुक्ति हेतु पात्र होने के लिए न्यूनतम 4 वर्षों की केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति की अवधि निर्धारित की है । 4 वर्षों के बाद इसे बढ़ाकर अधिकतम 7 साल तक के लिए किया जा सकता है. उसके बाद गृह कैडर में लौटना अनिवार्य हो जाता है। गृह कैडर में लौटने के बाद 3 वर्षों की कूलिंग आफ पीरियड मानी जाती है जिसका मतलब है कि कम से कम तीन साल तक गृह कैडर में काम करना जरुरी है, उसके बाद अधिकारी चाहें तो फिर से केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं । 2011 बैच से पहले के आईपीएस अधिकारी अगर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं गए हैं तो आईजी रैंक के बाद केन्द्र में उनका इम्पैनलमेंट एडीजी या डीजी रैंक पर नहीं हो सकता है । लेकिन इसका कोई प्रभाव राज्य के प्रमोशन पर नहीं पड़ता. अधिकारी अगर केन्द्र में नहीं जाना चाहते हैं तो वह मनोभाव से राज्य की सेवा कर सकते हैं।
2011 बैच से बदल गए नियम ?
गृह मंत्रालय (MHA) ने 2011 बैच के आईपीएस अधिकारियों SP और DIG रैंक के लिए केंद्र में IGP पद पर नियुक्ति हेतु पात्र होने के लिए अब दो साल की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति अनिवार्य कर दी है। यह नियम 2011 बैच और उसके बाद के अधिकारियों पर लागू होता है। 28 जनवरी को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए पत्र में MHA ने इसे “एंपैनलमेंट दिशानिर्देशों में संशोधन” बताया और राज्यों से कहा कि इसकी जानकारी सभी संबंधित अधिकारियों को दी जाए।
आईपीएस अधिकारियों की कमी से जूझ रहा झारखंड
वर्तमान में झारखंड कैडर में कुल 146 आईपीएस अधिकारी हैं। इनमें से 26 अधिकारी पहले से ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं, जबकि 4 अन्य अधिकारी जल्द ही केंद्र जाने की तैयारी में हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कम से कम 9 आईपीएस अधिकारी ऐसे हैं जो पिछले पांच साल से भी अधिक समय से केंद्र में जमे हुए हैं, जबकि कई अन्य अधिकारी भी जल्द ही इस सीमा तक पहुंचने वाले हैं।इस स्थिति का सबसे बुरा असर राज्य के भीतर प्रशासनिक ढांचे पर पड़ रहा है। झारखंड में कई महत्वपूर्ण पद नियमित नियुक्ति के बजाय अतिरिक्त प्रभार के सहारे चलाए जा रहे हैं, जहां एक ही अधिकारी को दो से तीन अलग-अलग जिम्मेदारियां एक साथ संभालनी पड़ रही हैं। इससे न सिर्फ निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो रही है, बल्कि जमीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था की निगरानी भी प्रभावित हो रही है।
आशीष बत्रा और नवीन सिंह जैसे आईपीएस कूलिंग के बाद फिर वापस चले गए
राज्य के दो ऐसे आईपीएस अधिकारी जिन्हें तेज तर्रार और प्रभावशाली आईपीएस माना जाता रहा है उनमें आशीष बत्रा और नवीन सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. लेकिन दोनों ही पदाधिकारियों ने केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटने के बाद तीन साल की सेवा राज्य में की और उसके बाद फिर वापस लौट गए.
आईपीएस को गृह कैडर में वापस आने के लिए क्या करना पड़ता है ?
सामान्य तौर पर, किसी IAS/IPS अधिकारी को उसका होम कैडर (गृह राज्य कैडर) नहीं मिल पाता। हालांकि, इसकी बहुत ही कम संभावना जरूर होती है। यह तभी संभव है जब उम्मीदवार को बहुत ऊंची रैंक मिले और उस वर्ष उसकी श्रेणी (कैटेगरी) के लिए उसके गृह राज्य में रिक्तियां (vacancies) मौजूद हों। इसके अलावा, उम्मीदवार को अपनी पहली प्राथमिकता (first preference) के तौर पर अपने गृह राज्य का ही चुनाव करना होगा। इन सबके ऊपर, सरकार किसी राज्य में IAS अधिकारियों का आउटसाइडर-टू-इनसाइडर अनुपात (outsider to insider ratio) 2:1 बनाए रखती है। हालांकि कुछ ऐसे उदाहरण जरूर हैं जिनमें कोई अधिकारी अपना कैडर बदलवा सकता है।
व्यवहार में प्रक्रिया इस तरह होती है:
IPS अधिकारी आवेदन करता है → गृह मंत्रालय (MHA) मामले पर विचार करता है → संबंधित कैडर/राज्य सरकारों से NOC/सहमति ली जाती है → DoPT की नीति के अनुसार पात्रता देखी जाती है → केंद्र सरकार अंतिम निर्णय लेती है।
एक वास्तविक उदाहरण में IPS अधिकारी अक्षत गर्ग के कैडर ट्रांसफर मामले में MHA ने West Bengal, Assam और Meghalaya सरकारों से उनकी राय/NOC मांगी थी। बाद में केंद्र सरकार ने Rule 5(2) के तहत उनका West Bengal से Assam-Meghalaya कैडर में ट्रांसफर किया।
क्यों नहीं वापस गृह कैडर में आना चाहते अधिकारी?
दरअसल, केंद्रीय एजेंसियों में बेहतर संसाधन, प्रभावशाली पद और अपेक्षाकृत कम दबाव वाला कार्य वातावरण अधिकारियों को लंबे समय तक वहीं बनाए रखता है। नतीजा यह है कि राज्य, जहां इन अनुभवी अधिकारियों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहीं नेतृत्व का अभाव गहराता जा रहा है। झारखंड के संदर्भ में जो बड़ी बात कानाफूसी के गलियारे में गरमा रही है वह यह है कि राज्य में प्रमोटी आईपीएस अधिकारियों और डाएरेक्ट आईपीएस अधिकारियों के बीच मतभेद हो रहा है. कई आईपीएस अधिकारी वर्षों से शंटिंग पोस्टिंग में ही काम कर रहे हैं जबिक कुछ चुनिंदा पदाधिकारियों को लागातार शानदार जिले मिलते रहे हैं ।
अभी राज्य के इतने IPS अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर
1. डीजी संपत मीणा
2. एडीजी संजय ए लाठकर
3. एडीजी नवीन कुमार सिंह
4. एडीजी बलजीत सिंह
5. एडीजी आशीष बत्रा
6. आईजी साकेत कुमार सिंह
7. आईजी होमकर अमोल वेणुकांत
8. आईजी कुलदीप द्विवेदी
9. आईजी अभिषेक
10. आईजी ए विजया लक्ष्मी
11. आईजी अनूप टी मैथ्यू
12. डीआईजी अनीश गुप्ता
13. डीआईजी एम तमिलवाणन
14. डीआईजी पी मुरुगन
15. डीआईजी सुरेन्द्र कुमार झा
16. डीआईजी शिवानी तिवारी
17. डीआईजी चंदन कुमार झा
18. डीआईजी जया रॉय
19. एसपी अखिलेश बी वारियर
20. एसपी अंशुमन कुमार
21. एसपी प्रियंका मीणा
22. एसपी प्रांजल रुंडला
23. एसपी आर रामकुमार
24. एसपी विनीत कुमार
25. एसपी के विजय शंकर
26. एसपी शुभांशु जैन
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