आज करम एकादशी है। प्रकृति पर अधिकार नहीं, प्रकृति के साथ सहभागिता—यही करम का दर्शन है। झारखण्ड की धरती पर करम पर्व यानी प्रकृति, मनुष्य और जिजीविषा का उत्सव। अगर आप झारखण्ड की माटी को- माँदर की थाप को महसूस कर सकते हैं तो आप करम पर्व में निहित प्रकृति और जिजीविषा की व्यथा-कथा और इसके संदेश तक पहुँच सकते हैं।
करम पर्व- आँगन में सजे जावा, अखरा में स्थापित करम की डाल, मांदर की थाप, एक-दूसरे का हाथ थामकर नृत्य करते लोग और अपने भाइयों की मंगलकामना करती बहनें। भव्य है यह आयोजन और इसके पीछे छिपा जीवन-दर्शन। उक्त बातें बोकारो डीसी अजय नाथ झा ने करम पर्व के अवसर पर स्वामी विवेकानंद मैदान में मंगलवार को कहीं। उन्होंने कहा कि बोकारो में रहते हुए, यहाँ के गाँवों और लोगों के बीच जाते हुए, मुझे बार-बार अनुभव होता है कि हमारी लोकसंस्कृति में जीवन के वे उत्तर छिपे हैं, जिन्हें आधुनिक दुनिया आज बड़ी-बड़ी पुस्तकों और विमर्शों में खोज रही है। करम पर्व भी ऐसा ही एक उत्तर है। जरा सोचिये, कैसे करम की एक डाल हमारी सामूहिक आस्था का केंद्र बन जाती है। परिवार, कृषि और समाज की समृद्धि की कामना की जाती है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संरक्षण का कितना सहज मार्ग चुना था। आज हम पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन की चर्चा करते हैं। ये हमारे समय की अनिवार्य चिंताएँ हैं। लेकिन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का विचार हमारी लोकपरंपराओं में सदियों से जीवन्त है।
मांदर की थाप और करम गीतों से गूंजा बोकारो थर्मल, पारंपरिक अंदाज में मनाया गया करम महोत्सव
बोकारो थर्मल का स्वामी विवेकानंद मैदान मंगलवार को झारखंडी लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। बेरमो प्रखंड में आयोजित करम महोत्सव 2026 में मांदर की थाप, पारंपरिक गीत-संगीत और रीति-रिवाजों ने पूरे माहौल को उत्सवमय बना दिया। महोत्सव में बड़ी संख्या में ग्रामीण, जनप्रतिनिधि, स्थानीय लोग और अधिकारी शामिल हुए।
कार्यक्रम में उपायुक्त अजय नाथ झा, पुलिस अधीक्षक नाथू सिंह मीणा, प्रशिक्षु आईएएस अरविंद राधाकृष्णन, बेरमो एसडीओ मनोज कुमार, बीडीओ मुकेश कुमार और सीओ संजीत कुमार समेत अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।
अधिकारियों ने बजाया मांदर, पारंपरिक अंदाज में हुआ स्वागत
करम महोत्सव में झारखंड की लोक परंपरा की खूबसूरत झलक देखने को मिली। कार्यक्रम के दौरान उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, प्रशिक्षु आईएएस समेत अन्य पदाधिकारियों ने मांदर बजाकर महोत्सव में अपनी भागीदारी निभाई। ग्रामीणों ने भी अतिथियों का स्वागत पारंपरिक लोटा-पानी की परंपरा के साथ किया।
कार्यक्रम की शुरुआत भगवान बिरसा मुंडा की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करने के साथ हुई। इसके बाद पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार करम यानी करमी पेड़ की डाली की पूजा-अर्चना की गई। गीत-संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में लोक संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश की।
करम पर्व का दूसरा पक्ष है—मानवीय संबंध और हमारी जिजीविषा
महोत्सव को संबोधित करते हुए डीसी अजय नाथ झा ने जिलेवासियों और विशेष रूप से बहनों को करम पर्व की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि करम पर्व झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और प्रकृति के साथ लोगों के गहरे जुड़ाव का प्रतीक है।
करम पर्व का दूसरा पक्ष है—मानवीय संबंध और हमारी जिजीविषा। हम दूर बैठे व्यक्ति से क्षणभर में जुड़ सकते हैं, पर, अपने पास बैठे व्यक्ति से संवाद नहीं कर पाते। ऐसे समय में करम का अखरा हमें कुछ याद दिलाता है। वहाँ लोग एक-दूसरे का हाथ थामते हैं। एक लय में आगे बढ़ते हैं। कोई अकेला नहीं होता। यह केवल नृत्य नहीं है। यह समाज को जीने का दर्शन देता है। जहाँ सबके कदम एक-दूसरे के साथ चलते हैं, वहाँ जीवन केवल व्यक्तिगत यात्रा नहीं रह जाता।
हमारी युवा पीढ़ी जिनके सामने तकनीक, विज्ञान और ज्ञान के नए क्षितिज हैं। उनसे कहना है कि आप आगे बढ़िए, दुनिया देखिए, नए सपने देखिए। लेकिन, कभी अपने गाँव के अखरा में भी बैठिए। मांदर की थाप सुनिए। अपने बुजुर्गों से करम की कथा पूछिए। जावा जगाने वाले गीतों के अर्थ समझिए। संभव है, वहाँ आपको जीवन का कोई ऐसा सत्य मिल जाए, जो किसी आधुनिक पुस्तक, इंटरनेट और एआई में न मिल सके।
हमारे सांस्कृतिक विरासत संग्रहालयों में नहीं ; हमारे जीवन में जीवित रहना चाहिए।
बोकारो की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। यहाँ आधुनिक उद्योग हैं, शिक्षा के बड़े संस्थान हैं, विकास की नई संभावनाएँ हैं। लेकिन इसी बोकारो में हमारे गाँव, जंगल, खेत, लोकगीत और जनजातीय परंपराएँ भी हैं। हम ऐसा बोकारो बनाएँ, जहाँ उद्योग भी आगे बढ़ें और जंगल भी सुरक्षित रहें; जहाँ हमारे गाँवों के अखरा में मांदर की थाप कभी मौन न हो।
समस्त बोकारोवासियों को करम एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जल-जंगल-जमीन के संरक्षण की परंपरा से सीखने की जरूरत
उपायुक्त ने कहा कि आदिवासी समाज की जीवनशैली और परंपराओं में जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश छिपा है। उन्होंने लोगों से अपनी लोक संस्कृति, भाषा, परंपराओं और पर्व-त्योहारों को संरक्षित रखने के साथ युवा पीढ़ी को भी इससे जोड़ने की अपील की। करम जैसे आयोजन समाज में भाईचारे, आपसी सहयोग और सामुदायिक एकजुटता को मजबूत करने का काम करते हैं। ऐसे आयोजनों के जरिए लोक संस्कृति केवल मंच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नई पीढ़ी तक भी पहुंचती है।
उपायुक्त ने करम महोत्सव के सफल आयोजन के लिए आयोजकों और ग्रामीणों को शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम के दौरान पूरे मैदान में पारंपरिक उत्साह और उल्लास का माहौल बना रहा।
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