जब खेलने- कूदने की उम्र में बेटियां मैदान से दूर होने लगती है, उसी उम्र में माताओं ने मैदान में उतरने का सोचा। प्रतिज्ञा संस्था की ओर से शुरू किया गया मातृ शक्ति फुटबॉल टूर्नामेंट अब अपने सातवें सीजन तक पहुंच गया है। वर्ष 2018 में महज छह टीमों से शुरू हुआ यह सफर आज 32 टीमों और 480 माताओं तक पहुंच चुका है। इस साल जलवायु परिवर्तन और लैंगिक समानता की थीम पर आयोजित रविवार को मातृ शक्ति फुटबॉल टूर्नामेंट सीजन-7 का घुनसुली में आगाज हुआ। मुखिया बंधना उरांव ने इसका उद्घाटन किया। प्रतिज्ञा की ओर से आयोजित इस प्रतियोगिता में 32 टीमें हिस्सा ले रही हैं। हर टीम में 21 से 45 वर्ष की 15 माताएं हैं, यानी कुल 480 खिलाड़ी। प्रतिज्ञा वर्ष 2018 से लगातार यह टूर्नामेंट करा रही है।
उद्घाटन मैच में तुमना ने घाघरा को पेनाल्टी शूटआउट में 4-3 से हराया। घाघरा की जसिन्ता सांगा मदर ऑफ द मैच रहीं।दूसरे मैच में घाँसीबाड़ी ने गुटजोड़ा-1 को गोल्डन शॉट पर मात दी। गुटजोड़ा-1 की सरिता सांगा को मदर ऑफ द मैच चुना गया।मेजबान घुनसुली ने सिरका को 2-0 से हराया। हार के बावजूद सिरका की पूजा तिर्की मदर ऑफ द मैच बनीं।चौथे मुकाबले में गुटजोड़ा-2 ने चाँपी को शूटआउट में 4-3 से हराया। चाँपी की सुनीता बखला को मदर ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला।
यहीं से शुरू हुई पहल
जब झारखंड डिजिटल की टीम प्रतिज्ञा NGO के Secretary अजय कुमार से बातचीत की तब उन्होंने इस पहल के पीछे बहुत सारे रोचक कहानियां हमारे साथ साझा की।वह कहते है यह सफर इतना आसान नहीं था। इसके पीछे काफी सालों की कड़ी मेहनत है। संस्था पहले किशोर-किशोरियों के साथ खेल के क्षेत्र में काम करती थी। इसी दौरान यह देखा गया कि करीब 11-12 वर्ष की उम्र के बाद लड़कियों की खेल गतिविधियों में भागीदारी कम होने लगा है।इसके कारणों को समझने पर मासिक धर्म, शरीर में होने वाले बदलाव, सुरक्षा को लेकर परिवार की चिंता और सामाजिक रूढ़ियों जैसी बातें सामने आईं। कई परिवारों को आशंका रहती थी कि मैदान में लड़कियों के साथ कोई असुरक्षित घटना न हो जाए। धीरे-धीरे इन चिंताओं के कारण कई लड़कियां खेल से दूर होने लगीं।
ऐसे में संस्था के सामने सवाल था कि सिर्फ लड़कियों को समझाकर इस सोच में बदलाव कैसे लाया जाए। इसी दौरान संस्था से जुड़ी एक टीम मेंबर ने सुझाव दिया कि क्यों न माताओं को ही मैदान में उतारा जाए। अगर मां खुद खेलेंगी और खेल के महत्व को समझेंगी, तो वे अपनी बेटियों को भी खेल के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं। इसी विचार से मातृ शक्ति फुटबॉल टूर्नामेंट की शुरुआत हुई।
पहली बार साड़ी-सलवार में मैदान पर उतरीं माताएं
वर्ष 2018 में जब प्रतियोगिता शुरू हुई, तब इसका उद्देश्य पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी तैयार करना नहीं था। मकसद था महिलाओं को मैदान तक लाना और उन्हें यह अनुभव कराना कि मां बनने या उम्र बढ़ने के बाद भी खेल उनके जीवन का हिस्सा हो सकता है।
पहले साल केवल छह टीमों ने हिस्सा लिया। प्रत्येक टीम में 15 माताएं थीं, यानी कुल 90 महिलाएं मैदान पर उतरीं। शुरुआती दौर में कई महिलाएं साड़ी और सलवार में ही फुटबॉल खेलने पहुंचीं। यह अपने आप में उस समय एक अलग तस्वीर थी, क्योंकि महिलाओं के लिए खेल के मैदान में उतरना ही कई परिवारों और समुदायों के लिए नया अनुभव था।
छह टीम से 26 और फिर 32 टीमों तक पहुंचा सफर
पहले साल के अनुभव के बाद 2019 में आयोजकों को उम्मीद थी कि शायद 10-12 टीमें ही आएंगी। लेकिन रजिस्ट्रेशन के दौरान 26 टीमों ने आवेदन किया। सत्यापन के बाद 24 टीमों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इस दौरान कई जगह सास और बहू भी एक ही टीम में खेलती नजर आईं।
मैदान पर साथ खेलने की इन कहानियों ने टूर्नामेंट को सिर्फ खेल प्रतियोगिता से आगे बढ़ाकर परिवार और समुदाय के बीच संवाद का माध्यम भी बनाया। वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना महामारी के कारण प्रतियोगिता आयोजित नहीं हो सकी। इसके बाद 2022 से 32 टीमों के साथ टूर्नामेंट आयोजित किया जा रहा है। पिछले साल 54 टीमों ने पंजीकरण कराया था, लेकिन अंतिम प्रतियोगिता के लिए 32 टीमों का चयन किया गया।
फुटबॉल के साथ सामाजिक मुद्दों पर भी काम
मातृ शक्ति फुटबॉल टूर्नामेंट की खासियत यह है कि इसमें सिर्फ मैदान पर मैच खेलना ही उद्देश्य नहीं है। हर साल एक सामाजिक थीम तय की जाती है। इस वर्ष जलवायु परिवर्तन और जेंडर जस्टिस को केंद्र में रखा गया है।
टूर्नामेंट में शामिल महिलाओं के साथ करीब छह महीने तक अलग-अलग सत्र आयोजित किए जाते हैं। उन्हें घर और समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यों के टास्क भी दिए जाते हैं। इन गतिविधियों के बाद फुटबॉल प्रतियोगिता को उनके सामूहिक प्रयासों के उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता है।
पिछले वर्षों में सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ, घरेलू हिंसा और बाल विवाह जैसे मुद्दों को भी टूर्नामेंट की थीम बनाया गया है। इस तरह फुटबॉल को सामाजिक जागरूकता से जोड़ने की कोशिश की गई है।
जिस मैदान पर महिलाओं को जगह नहीं मिलती थी, अब वहीं बच्चे लेकर पहुंचते हैं पुरुष
इस पहल के शुरुआती वर्षों में महिलाओं के लिए खेल का मैदान हासिल करना भी आसान नहीं था। आयोजकों के मुताबिक कई जगह यह कहा गया कि मैदान पुरुषों के लिए है और महिलाओं को नहीं दिया जा सकता। कुछ स्थानों पर मैदान उपलब्ध कराने के लिए 10 से 12 हजार रुपये तक की मांग की गई।
समय के साथ इस सोच में बदलाव देखने को मिला। आयोजकों के अनुसार, अब उन्हीं समुदायों के कुछ पुरुष अपने बच्चों को लेकर महिलाओं के मैच देखने पहुंचते हैं। यानी जिस मैदान में कभी महिलाओं के खेलने पर सवाल उठते थे, वही मैदान अब परिवार और समुदाय की भागीदारी का केंद्र बन रहा है।
घरेलू हिंसा झेल रही खिलाड़ी ने अगले दिन दागे दो गोल
इस पहल से जुड़ी एक घटना वर्ष 2023 की है। अजय बताते है एक टीम की प्रमुख खिलाड़ी घरेलू हिंसा की स्थिति से गुजर रही थीं। टीम के सदस्यों ने उन्हें प्रतियोगिता से बाहर करने के बजाय उनके परिवार से बातचीत करने का फैसला किया।
अगले दिन वह महिला मैदान पर उतरीं। उन्होंने दो गोल किए और ‘मदर ऑफ द मैच’ बनीं। इसके बाद उनके पति को बुलाकर उन्हीं के हाथों पत्नी को पुरस्कार दिलाया गया। आयोजक इस घटना को इस पहल के सामाजिक असर के उदाहरण के तौर पर बताते हैं।
फुटबॉल से आगे बदलाव की कहानी
मातृ शक्ति फुटबॉल टूर्नामेंट का सफर दिखाता है कि खेल सिर्फ प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रहता। यहां फुटबॉल महिलाओं को मैदान तक लाने, परिवारों के नजरिए पर संवाद शुरू करने और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा का माध्यम बना है।
2018 में छह टीमों और 90 माताओं से शुरू हुआ यह सफर आज 32 टीमों और 480 महिलाओं तक पहुंच चुका है। मैदान पर उतरती ये माताएं सिर्फ फुटबॉल नहीं खेल रहीं, बल्कि अपनी बेटियों और समाज को यह संदेश भी दे रही हैं कि खेल का मैदान उम्र, वैवाहिक स्थिति या मां बनने के बाद बंद नहीं होता।
