रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी पर कड़ा रुख अपनाते हुए पलामू जिले के जिला खनन पदाधिकारी (DMO) और छतरपुर थाना प्रभारी पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने दोनों अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताते हुए कहा कि कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी भी अधिकारी को अपने अधिकारों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामला पलामू जिले में एक व्यावसायिक वाहन की जब्ती से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, जिला खनन पदाधिकारी और छतरपुर थाना प्रभारी ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए एक व्यावसायिक वाहन को जब्त कर लिया था। वाहन मालिक का आरोप था कि जब्ती की पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं अपनाई गई और बिना पर्याप्त कानूनी आधार के वाहन को अपने कब्जे में ले लिया गया।
इस कार्रवाई के खिलाफ मेसर्स सिंह मर्चेंट की ओर से अधिवक्ता हिमांशु रंजन ने झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना वाहन जब्त किया, जिससे व्यवसाय प्रभावित हुआ और अनावश्यक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। याचिकाकर्ता ने अदालत से वाहन जब्ती की कार्रवाई को अवैध घोषित करने तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई में गंभीर प्रक्रियागत खामियां थीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक कार्रवाई करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। यदि अधिकारी नियमों की अनदेखी कर कार्रवाई करेंगे तो इससे आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने जिला खनन पदाधिकारी और छतरपुर थाना प्रभारी पर 50-50 हजार रुपये का आर्थिक दंड लगाया। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सरकारी अधिकारियों से निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। यदि वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करते हैं, तो न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगा।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि खनन, परिवहन या अन्य किसी भी मामले में कार्रवाई करते समय विधिक प्रक्रिया का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। केवल संदेह या प्रशासनिक अधिकार के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस आदेश से यह संदेश जाता है कि यदि किसी नागरिक के साथ नियमों के विपरीत कार्रवाई की जाती है, तो न्यायालय उसके अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करेगा और दोषी अधिकारियों को जवाबदेह भी ठहराएगा।
