Friday, October 2

रांची: करम हो या सरहुल, झारखंड के पारंपरिक पर्व-त्योहारों में मांदर की थाप के बिना तस्वीर अधूरी लगती है। लोकनृत्य और सामुदायिक आयोजनों से लेकर आदिवासी जीवन की सांस्कृतिक परंपराओं तक मांदर की अपनी अलग जगह है। अब इसी पारंपरिक वाद्य यंत्र को उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए GI टैग मिल गया है। करीब पांच साल तक चली कोशिशों के बाद भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने गुमला की ओर से किए गए दावे को स्वीकार कर लिया है।

मांदर को मिली यह मान्यता सिर्फ एक वाद्य यंत्र को GI पहचान मिलने तक सीमित नहीं है। इसके साथ झारखंड की उस पारंपरिक कला और निर्माण प्रक्रिया को भी आधिकारिक पहचान मिली है, जिसे स्थानीय कारीगर पीढ़ियों से आगे बढ़ाते आए हैं।

गुमला से शुरू हुई कोशिश पहुंची मुकाम तक

मांदर को GI टैग दिलाने की पहल करीब पांच साल पहले गुमला से शुरू हुई थी। इस दिशा में तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने अहम भूमिका निभाई। वे 28 जुलाई 2023 से 27 मई 2025 तक गुमला के उपायुक्त रहे। इस दौरान मांदर की पारंपरिक पहचान, इसके निर्माण से जुड़े कारीगरों और आदिवासी संस्कृति में इसके महत्व को सामने लाने के प्रयास किए गए।

इसके बाद GI टैग के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ी। आवेदन से लेकर जरूरी दावों और दस्तावेजी प्रक्रिया तक कई चरणों से गुजरने के बाद अब मांदर को GI मान्यता मिल गई है।

सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं, आदिवासी जीवन का हिस्सा है मांदर

झारखंड में मांदर का इस्तेमाल सिर्फ संगीत के लिए नहीं होता। यह यहां के आदिवासी समाज के पर्व-त्योहार, लोकगीत, नृत्य और सामुदायिक आयोजनों का हिस्सा रहा है।

करम और सरहुल जैसे पारंपरिक पर्वों में मांदर की थाप आज भी सांस्कृतिक आयोजनों की पहचान बनी हुई है। पीढ़ियों से लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों के साथ इसका इस्तेमाल होता रहा है। यही सांस्कृतिक जुड़ाव मांदर को झारखंड की पहचान से जोड़ता है।

कारीगरों की पारंपरिक कला को भी मिली पहचान

GI टैग की प्रक्रिया में मांदर के पारंपरिक निर्माण की विधि, स्थानीय कारीगरों की भूमिका और झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं के साथ इसके संबंध को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया।

GI मान्यता के बाद मांदर की इसी विशिष्टता को औपचारिक पहचान मिली है। इससे पारंपरिक तरीके से मांदर बनाने वाले कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों के लिए आगे नए अवसर बनने की उम्मीद है।

हिमानी पांडे की भी रही अहम भूमिका

मांदर को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया में झारखंड कैडर की 1998 बैच की IAS अधिकारी हिमानी पांडे का भी योगदान रहा। उन्होंने संबंधित विभागों और अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।

हिमानी पांडे वर्तमान में भारत सरकार के उद्योग विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं।

अब मांदर की पहचान झारखंड की सीमा से आगे ले जाने की उम्मीद

GI टैग मिलने के बाद मांदर की विशिष्टता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद है। साथ ही इसके पारंपरिक निर्माण और इससे जुड़ी स्थानीय कला को संरक्षित करने में भी मदद मिल सकती है।

करीब पांच वर्षों की कोशिश के बाद मिली यह मान्यता उन कारीगरों और कलाकारों के लिए भी अहम है, जिनकी मेहनत से मांदर की परंपरा आज तक कायम है। अब झारखंड की पहचान से जुड़ी मांदर की यह थाप आधिकारिक GI पहचान के साथ नई जगह बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।

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