Tuesday, October 13

राजनीति में कुछ सफर ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ सत्ता, चुनाव और पदों के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। कुछ सफर निजी संघर्षों, परिवार के बिछड़ने और उन जिम्मेदारियों से बनते हैं, जिन्हें इंसान चाहकर भी किसी और के कंधे पर नहीं रख सकता। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है।
करीब 17 साल के अंतराल में हेमंत सोरेन ने अपने परिवार के तीन बेहद करीबी अभिभावकों को खोया। वर्ष 2009 में बड़े भाई दुर्गा सोरेन का निधन हुआ। इसके बाद 4 अगस्त 2025 को पिता और झारखंड आंदोलन के बड़े चेहरे शिबू सोरेन का निधन हुआ था । अब 7 अक्टूबर की शाम सोरेन परिवार में एक और शोक की लहर छा गयी , मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सर से उनकी माता का छांव भी उठ गया। जिन हाथों से कभी आँचल पकड़ कर खेला करते थे आज वही हाथ पार्थिव शरीर को कन्धा दे रहे है।

हेमंत सोरेन की माता रूपी सोरेन की तबियत पिछले कुछ दिनों से नासाज़ चल रही थी। 7 सितम्बर 2026 को उन्हें रुटीन चेकअप के लिए हैदराबाद ले जाया गया वहां करीब एक सप्ताह इलाज करवाने के बाद 14 सितम्बर को वापस रांची लौटी। इसके बाद उनकी तबियत में थोड़ी सुधार थी, पर 18 सितम्बर को उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी जिसके बाद उन्हें रांची के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनकी तबियत में उतार चढ़ाव बरकरार रहा। 7 अक्टूबर की शाम करीब 8 :30 बजे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सर से माता का साया उठ गया और मुख्यमंत्री के कंधो पर राजनीतिक जिम्मेदारियों के साथ- साथ राज्य के सबसे चर्चित सोरेन परिवार की जिम्मेदारियों ने भी दस्तक दे दी है ।

हालांकि, हेमंत ने इन जिम्मेदारियों को काफी पहले सम्हाल लिया था लेकिन सर पर पिता और मां का साया जब तक बना रहता है कहते हैं तब तक जिम्मदारियों का पता नहीं चलता। अब मां रुपी सेन की मृत्यु के बाद हेमंत सोरेन पर जिम्मदारियां और भी ज्यादा बढ़ गयी हैं। उनके कंधों पर परिवार के साथ-साथ पार्टी और राज्य की जिम्मेदारियां भी हैं।

2009 में खोया था बड़े भाई का प्यार 

 

सोरेन परिवार के लिए 2009 का साल एक बड़े सदमे के साथ आया। हेमंत सोरेन के बड़े भाई दुर्गा सोरेन, जो झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और जामा से विधायक रह चुके थे, का निधन हो गया। दुर्गा सोरेन सिर्फ परिवार के बड़े बेटे नहीं थे, बल्कि झामुमो की राजनीति में भी उनकी अपनी पहचान थी। उनके निधन के बाद परिवार को एक ऐसा नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई संभव नहीं थी।

यहीं से हेमंत के जीवन में परिवार के भीतर जिम्मेदारियों का एक नया दौर शुरू हुआ। आने वाले वर्षों में वह धीरे-धीरे पिता शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत के सबसे प्रमुख उत्तराधिकारी के रूप में सामने आए।

14 माह पहले उठा था पिता का साया

हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। 2009 में वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे और बाद में झारखंड की सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका लगातार मजबूत होती गई। वह उपमुख्यमंत्री रहे, नेता प्रतिपक्ष बने और फिर 2013 में पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2019 में वह दोबारा मुख्यमंत्री बने और 2024 में सत्ता में उनकी वापसी हुई। वर्तमान में भी वह झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। इस सफर में उनके साथ सबसे बड़ी छाया उनके पिता शिबू सोरेन की रही। ‘दिशोम गुरु‘ के नाम से पहचाने जाने वाले शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन और झामुमो की राजनीति के केंद्रीय चेहरों में रहे। 1972 में झामुमो के गठन से लेकर राज्य की राजनीति तक उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।

लेकिन 4 अगस्त 2025 को वह छाया भी हमेशा के लिए उठ गई।शिबू सोरेन के निधन के बाद हेमंत के सामने एक साथ दो जिम्मेदारियां थीं—एक बेटे की और दूसरी मुख्यमंत्री की। पिता के निधन के बाद हेमंत सोरेन ने नेमरा में रहकर अंतिम संस्कार और पारिवारिक रस्में निभाईं, लेकिन इसी दौरान सरकारी कामकाज भी जारी रखा। अधिकारियों के साथ बैठकें हुईं, जरूरी फाइलों पर निर्णय लिए गए और प्रशासन को लगातार संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए। हेमंत ने उस समय पिता के अधूरे संकल्पों और झारखंड के लिए उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात कही थी।

‘ बाबा के बाद माँ ही मेरी सबसे बड़ी छाव थी ‘

मां के निधन के बाद हेमंत सोरेन की भावनाओं में इस रिश्ते की गहराई सामने आई। उन्होंने अपनी मां को पिता के निधन के बाद अपनी सबसे बड़ी ‘छांव’ बताया। रूपी सोरेन की भूमिका सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की सदस्य की नहीं थी, शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक संघर्ष के दौरान उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं। जब शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन और राजनीति में सक्रिय रहे, तब घर और बच्चों की जिम्मेदारी बड़े स्तर पर रूपी सोरेन के हिस्से रही।

उनका खुद का राजनीतिक अध्याय भी रहा। 1999 में उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और बाबूलाल मरांडी से महज 4,648 मतों से चुनाव हार गई थीं।

निजी दुःख के बीच राज्य की जिम्मेदारियां

दुर्गा सोरेन के जाने के बाद, फिर पिता और अब मां के निधन ने हेमंत के निजी जीवन में एक के बाद एक बड़े खालीपन पैदा हुआ हैं। परिवार में छोटे भाई बसंत सोरेन और बहन अंजनी सोरेन भी हैं, लेकिन सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर हेमंत अब सोरेन परिवार और झामुमो की सबसे प्रमुख जिम्मेदारियों का चेहरा हैं। झामुमो ने अप्रैल 2025 में उन्हें पार्टी का पूर्णकालिक केंद्रीय अध्यक्ष भी बनाया था।

यानी अब उनके सामने सिर्फ सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं है। उनके पिता की राजनीतिक विरासत, झामुमो का संगठन, झारखंड की जनता का भरोसा और परिवार की विरासत इन सबको साथ लेकर चलने की चुनौती भी है। पिता के निधन के समय भी उन्होंने निजी शोक के बीच शासन की जिम्मेदारी निभाई थी। अब मां के जाने के बाद फिर वही परीक्षा उनके सामने है। निजी दर्द को संभालते हुए सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाना।

नेमरा में आज जब रूपी सोरेन को अंतिम विदाई दी गई, अपनों को खोने का दर्द शायद कभी खत्म नहीं होगा, लेकिन इसी दर्द के बीच आगे बढ़ना ही अब हेमंत सोरेन की सबसे बड़ी परीक्षा है ।

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