हरियाली बचाने का संकल्प, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी संस्कृति को मिलेगा नया मंच
रांची: झारखंड की राजधानी रांची में पहली बार ‘सखुआ महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य राज्य के सबसे महत्वपूर्ण वन वृक्ष सखुआ (साल) के संरक्षण, पर्यावरण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने और आदिवासी संस्कृति को नई पहचान देना है। आयोजन के माध्यम से लोगों को हरियाली बचाने, जंगलों के संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश दिया जाएगा।
झारखंड की पहचान उसके घने साल वनों से रही है। सखुआ का पेड़ केवल पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और आजीविका का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसके पत्तों से दोना-पत्तल बनाए जाते हैं, लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्यों में होता है और यह वन्यजीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास प्रदान करता है। यही कारण है कि इस वृक्ष के संरक्षण को लेकर विशेष पहल की जा रही है।
महोत्सव के दौरान वृक्षारोपण अभियान, पर्यावरण जागरूकता रैली, पारंपरिक लोक नृत्य, जनजातीय संगीत, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और स्थानीय वन उत्पादों की प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा पर्यावरण विशेषज्ञ, वन अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण और वन संपदा के महत्व पर अपने विचार साझा करेंगे।
आयोजकों का कहना है कि तेजी से हो रहे शहरीकरण, अवैध कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण सखुआ के जंगलों पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में समाज की भागीदारी के बिना जंगलों का संरक्षण संभव नहीं है। इसी सोच के साथ ‘सखुआ महोत्सव’ को एक जन आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया जा रहा है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, स्वयंसेवी संगठन, पर्यावरण प्रेमी, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक शामिल होंगे। इस दौरान लोगों को अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का संकल्प भी दिलाया जाएगा। स्कूल और कॉलेजों के विद्यार्थियों के लिए पर्यावरण आधारित प्रतियोगिताओं का भी आयोजन प्रस्तावित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सखुआ के जंगल सुरक्षित रहेंगे तो झारखंड की जैव विविधता, जल स्रोत और प्राकृतिक संतुलन भी मजबूत रहेगा। ऐसे आयोजनों से युवाओं में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित विरासत को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
‘सखुआ महोत्सव’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि हरियाली बचाने, जंगलों को संरक्षित रखने और प्रकृति के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का एक महत्वपूर्ण अभियान बनकर उभर रहा है।



