पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर धनरूआ प्रखंड के विजयपुरा गांव में स्थित ‘कन्हैया स्थान’ को ‘बिहार का वृंदावन’ कहा जाता है। इस गांव को पहले ‘ब्रिजपुरा’ के नाम से जाना जाता था। यहां के पशुपालकों का दावा है कि आज भी हवा में स्वतः बांसुरी की धुन और पायलों की छन-छन की आवाज सुनाई देती है। ग्रामीणों के अनुसार यह अलौकिक धुन हर साल नहीं, बल्कि केवल उसी वर्ष सुनाई देती है जब गांव में रासलीला का आयोजन होता है, और वह भी केवल सच्चे कृष्ण भक्तों को ही।
द्वापर युग से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों का मानना है कि द्वापर युग में जरासंध को हराकर लौटते समय भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ इसी स्थान पर रात्रि विश्राम किया था, इसके बाद वे वृंदावन के लिए रवाना हुए थे। इसी ऐतिहासिक ठहराव के कारण गांव का नाम ब्रिजपुरा से बदलकर विजयपुरा पड़ गया। मंदिर से भक्त बंगाली दास की कथा भी जुड़ी है, जिनकी भक्ति की परीक्षा स्वयं भगवान ने कुष्ठ रोगी का रूप धरकर ली थी। परीक्षा में सफल होने पर बंगाली दास वृंदावन से पवित्र मिट्टी लाए और यहीं पिंडी बनाकर पूजा शुरू की, जो आज भी जारी है।
1872 से चली आ रही रासलीला परंपरा
इस मंदिर में रासलीला की परंपरा बेहद पुरानी है। 1872 से यहां रासलीला का आयोजन होता रहा है, वहीं 1942 से हर तीन वर्ष पर इसका मंचन किया जाता है, जिसमें कलाकार खासतौर पर वृंदावन से बुलाए जाते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर यहां लगातार 53 दिनों तक रासलीला होती है, जो देश के गिने-चुने स्थानों में से एक है जहां इतने लंबे समय तक यह आयोजन होता है।
मनोकामना पूर्ति का स्थल
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद कन्हैया अवश्य पूरी करते हैं, जिस कारण जन्माष्टमी पर दूर-दूर से भक्त यहां पहुंचते हैं।
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