Tuesday, October 13

लातेहार। जिला मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर की दूरी पर अगर किसी गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क के बजाय बांस की पुलिया का सहारा लेना पड़े, तो यह सिर्फ एक गांव की बदहाली नहीं, बल्कि विकास के दावों पर बड़ा सवाल है। लातेहार के बेंदी पंचायत का ठेकीटांड़ इसी विरोधाभास की तस्वीर पेश कर रहा है। करीब 500 आदिवासियों की आबादी वाला यह गांव आज भी सड़क, पुल और सुगम आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों ने सरकारी व्यवस्था का इंतजार छोड़कर खुद बांस की पुलिया तैयार कर ली है।

चारों तरफ प्राकृतिक बाधाएं, बीच में फंसा गांव

ठेकीटांड़ की भौगोलिक स्थिति ही इसकी सबसे बड़ी मुश्किल है। गांव के एक तरफ रेलवे लाइन है, दूसरी ओर औरंगा नदी, पीछे डैम और चारों तरफ पहाड़ व जंगल का घेरा है। यही वजह है कि गांव तक पहुंचना सामान्य दिनों में भी आसान नहीं है। बारिश शुरू होते ही समस्या कई गुना बढ़ जाती है।

ग्रामीणों के मुताबिक, साल के करीब आठ महीने गांव की स्थिति ऐसी हो जाती है कि वह मुख्य आबादी से लगभग कट जाता है। जरूरी सामान लाने से लेकर बच्चों के स्कूल जाने और मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में ग्रामीणों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

जब सरकारी रास्ता नहीं मिला तो ग्रामीणों ने खुद बनाया पुल

सड़क और पुल की मांग ग्रामीणों के लिए कोई नई बात नहीं है। कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने समस्या रखी गई। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि उनकी समस्या का स्थायी समाधान होगा और गांव तक सड़क तथा पुल की सुविधा पहुंचेगी। लेकिन वर्षों गुजरने के बाद भी तस्वीर में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

आखिरकार ग्रामीणों ने खुद ही अपनी समस्या का रास्ता निकालने का फैसला किया। डैम के पास बांस जोड़कर अस्थायी पुलिया तैयार की गई। आज यही पुलिया ठेकीटांड़ के लोगों के लिए गांव से बाहर निकलने का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बनी हुई है।

बांस की पुलिया सिर्फ रास्ता नहीं, जिंदगी की मजबूरी

यह पुलिया ग्रामीणों के लिए महज आने-जाने का साधन नहीं है। इसी के सहारे बच्चे स्कूल पहुंचते हैं, ग्रामीण बाजार जाते हैं और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं। किसी घर में अचानक कोई बीमार पड़ जाए तो मरीज को भी इसी रास्ते से बाहर ले जाने की चुनौती सामने आती है।

सबसे बड़ा खतरा बारिश के दिनों में रहता है। पानी का दबाव बढ़ने पर बांस की पुलिया पर चलना जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे में हर कदम सावधानी से रखना पड़ता है। ग्रामीणों के सामने सवाल यह नहीं होता कि रास्ता सुरक्षित है या नहीं, बल्कि सवाल यह होता है कि जरूरत पड़ने पर इस रास्ते के अलावा दूसरा विकल्प क्या है।

ग्रामीणों का सवाल- आखिर कब बनेगा स्थायी रास्ता?

ग्रामीण मनोज उरांव, दशरथ उरांव समेत अन्य लोगों का कहना है कि सड़क और पुल की समस्या को लेकर कई बार गुहार लगाई जा चुकी है। इसके बावजूद अब तक स्थायी समाधान नहीं हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि वे कोई बड़ी सुविधा नहीं मांग रहे, सिर्फ इतना चाहते हैं कि गांव तक ऐसा रास्ता बने, जिससे बरसात में भी उनका संपर्क जिला मुख्यालय और आसपास के इलाकों से बना रहे।

आठ किलोमीटर की दूरी ने खड़ा किया बड़ा सवाल

ठेकीटांड़ की कहानी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह कोई सुदूर, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र नहीं है, बल्कि जिला मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव है। सवाल यही है कि जब जिला मुख्यालय इतनी नजदीक है, तो फिर करीब 500 लोगों तक सड़क और सुरक्षित आवागमन की सुविधा क्यों नहीं पहुंच सकी?

एक तरफ शहरों और कस्बों में सड़क, पुल और कनेक्टिविटी के विस्तार की बात होती है, वहीं ठेकीटांड़ में ग्रामीणों को अपने पैसे, श्रम और स्थानीय संसाधनों से बांस की पुलिया बनाकर जिंदगी आगे बढ़ानी पड़ रही है।

ठेकीटांड़ की यह तस्वीर सिर्फ एक पुलिया की कहानी नहीं है। यह उस दूरी की कहानी है, जो किलोमीटर में भले महज आठ हो, लेकिन सुविधाओं और विकास के मामले में ग्रामीणों के लिए आज भी बहुत लंबी है।

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