‘साहब’ कहलाते हैं हीरो हीरालाल… आखिर किस क्रशर कारोबारी के खासमखास होने की चर्चा?
रांची के जिला खनन पदाधिकारी मो. अबु हुसैन इन दिनों फिर सवालों के घेरे में हैं। सवाल सिर्फ अवैध खनन पर कार्रवाई का नहीं है, बल्कि सवाल यह भी है कि जिस अधिकारी की कार्यशैली को लेकर लगातार शिकायतें और आरोप सामने आ रहे हैं, उनके लिए जिम्मेदारियां कम होने के बजाय बढ़ती क्यों जा रही हैं?
और अब चर्चा इससे भी आगे की है – क्या रांची के बाद पलामू या साहेबगंज DMO की कुर्सी पर नजर है? जी हां, जानकारों की माने तो DMO अबू हुसैन का नाम एक बार सुर्खियों में है. इस बार उनका तबादला पलामू या साहिबगंज DMO की कुर्सी पर हो सकता है । दोनों ही पद राजधानी से भी ज्यादा मलाईदार बताए जाते हैं ।
बालू गायब होने का मामला और बढ़ते सवाल
मई 2026 में रांची के रातू थाना क्षेत्र के चटकपुर में करीब 90 हजार घनफीट जब्त बालू को रातों-रात हटाए जाने का मामला सामने आया था।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, 12 मई को खनन विभाग की टीम ने बालू जब्त कर उसे रातू थाना पुलिस को सुपुर्द किया था। इसके अगले ही दिन रात में कई हाईवा और जेसीबी के जरिए बालू हटाए जाने की बात सामने आई। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि मौके पर DMO अबु हुसैन मौजूद थे और पूरे घटनाक्रम की निगरानी कर रहे थे।
मामले में रातू थाना पुलिस द्वारा कुछ वाहनों को जब्त किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई। सबसे बड़ा सवाल यही था – जब बालू जब्त था और कानूनी प्रक्रिया के तहत उसके निस्तारण या नीलामी की प्रक्रिया होनी थी, तो इतनी बड़ी मात्रा में बालू रात के अंधेरे में आखिर हटाई क्यों गई?
अब सवाल यह भी है कि अगर पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत थी, तो उसे लेकर इतनी गोपनीयता क्यों रही?
और फिर आई नीलामी की खबर…
मामले को और दिलचस्प बनाने वाली बात यह रही कि बाद की रिपोर्ट में उसी करीब 90 हजार CFT बालू की नीलामी से जुड़ा मामला सामने आया।
18 मई 2026 को रांची जिला प्रशासन उसी 90 हजार CFT बालू की नीलामी करने वाला था , जिसके गायब होने को लेकर DMO अबु हुसैन पर आरोप लगाए गए थे।
यानी बालू अगर गायब हुई थी तो नीलामी किस स्टॉक की हो रही थी? और अगर बालू सुरक्षित थी तो फिर रात में उसे हटाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
इन सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब सार्वजनिक होना जरूरी है।
‘साहब की मेहरबानी’ वाला सवाल भी उठा
मामला सिर्फ बालू तक सीमित नहीं रहा।
19 मई 2026 को रांची DMO कार्यालय की कार्यशैली को लेकर एक रिपोर्ट मीडिया में सार्वजनिक हुई थी। इसमें कुछ स्टॉकयार्ड संचालकों के आरोपों का हवाला देते हुए कहा गया कि DMO जिन लोगों पर ‘मेहरबान’ होते हैं, उनका माइनिंग चालान संबंधी काम जल्दी हो जाता है, जबकि दूसरे लोगों के काम लंबित रखे जाते हैं।
अब इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और विभागीय रिकॉर्ड से पुष्टि होना बाकी है।
लेकिन सवाल तो बनता है: खनन कार्यालय में काम नियम से होता है या ‘मेहरबानी’ से?
अगर सभी के लिए नियम समान हैं, तो फिर किसी का काम तुरंत और किसी का महीनों लंबित रहने की शिकायत क्यों?
लोहरदगा का अतिरिक्त प्रभार भी सवालों में
रांची DMO अबु हुसैन को लोहरदगा DMO का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। प्रभार मिलने के बाद वहां बॉक्साइट खनन और परिवहन से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी सवाल उठे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व DMO राजाराम प्रसाद के सेवानिवृत्त होने के बाद अबु हुसैन को अतिरिक्त प्रभार मिला और उन्होंने 8 मई को पदभार ग्रहण किया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि जरूरी स्वीकृति और अनुमति नहीं मिलने के कारण बॉक्साइट खनन एवं मालगाड़ियों से परिवहन प्रभावित हुआ।
रांची से लोहरदगा तक DMO की कार्यशैली को लेकर उठ रहे सवालों की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, रांची के बालू विवाद के बाद विभागीय स्तर पर शो-कॉज की बात सामने आई थी, इसके बावजूद उन्हें लोहरदगा का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
तो सवाल यह है कि जिस अधिकारी की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हों, उसे अतिरिक्त जिले की जिम्मेदारी देने के पीछे विभाग की मजबूरी क्या थी?
क्रशर का खेल… और कथित ‘फिक्स रेट’ की चर्चा
अब आते हैं उस हिस्से पर, जिसकी चर्चा खनन कारोबार से जुड़े लोगों के बीच होने का दावा किया जा रहा है।
कुछ जानकारों के हवाले से यह आरोप सामने आता है कि रांची के बड़े क्रशरों से कथित तौर पर मासिक रकम वसूली जाती है, जबकि छोटे क्रशरों के लिए अलग ‘रेट’ तय होने की बात कही जा रही है।
बड़े क्रशरों के लिए 1 से 1.25 लाख रुपये और छोटे क्रशरों के लिए करीब 50 हजार रुपये मासिक की कथित वसूली का दावा भी किया जा रहा है।
रांची में 200-250 TPH क्षमता वाले करीब 25 से अधिक क्रशर हैं जबकि 50 से ज्यादा छोटे क्रशर लिस्टेड हैं। जानकारों के दावों को अगर माना जाए तो महीना 80 लाख से लेकर 1 करोड़ तक की वसूली की जाती है।
अवैध खनन की जांच कर रही ED के रडार पर आखिर कौन ?
झारखंड में ED यानी प्रवर्तन निदेशालय अवैध खनन की जांच कर रही है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अवैध खनन की जांच के दौरान DMO स्तर के अधिकारियों की संपत्ति पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है जबकि यह सार्वजनिक है कि बिना DMO की जानकारी के अवैध खनन संभव ही नहीं है । चाहे वह पत्थर का खनन हो या कोयले, बालू , बॉक्साइट समेत अन्य खनिजों का । अब देखना यह है कि ED की रडार पर आखिर ये बड़े पदाधिकारी क्यों नहीं आ रहे ? अगर कुछ DMO की जांच हो जाए तो कई मामलों का पर्दाफाश हो सकता है।
रिकॉर्ड का एक पक्ष यह भी कहता है कि ज्यादातर विवाद DMO अधिकारी समय समय पर आईवाश करने के लिए कार्रवाई भी करते रहे हैं। दूसरा पक्ष कहता है कि उन्हीं की कार्यशैली को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। तो असली तस्वीर क्या है? यही तो जांच का विषय है।
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