रांची। झारखंड भाजपा की कमान संभालते ही नए प्रदेश प्रभारी गजेंद्र सिंह पटेल ने सरकार पर हमलों की शुरुआत कर दी है। कोर कमिटी की बैठक के बाद हुई प्रेस वार्ता में भ्रष्टाचार से लेकर घुसपैठ और कानून व्यवस्था तक के मुद्दे पर उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार को घेरा। सरकार पर विकास नहीं करने, जमीन-जंगल-खनिज की लूट और राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। यानी नई जिम्मेदारी, नया प्रभारी और निशाने पर वही पुरानी सरकार। सवाल बस इतना है कि आरोपों की यह पुरानी पटकथा 2029 में भाजपा के लिए कोई नया राजनीतिक परिणाम लिख पाएगी या नहीं?
झारखंड की राजनीति में भाजपा और हेमंत सोरेन के बीच आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। 2019 और 2024 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने हेमंत सोरेन के खिलाफ दोषारोपण की राजनीति को ही एक बड़े आधार के तौर पर इस्तेमाल किया। लेकिन चुनावी नतीजों ने भाजपा की इस रणनीति को वह सफलता नहीं दी, जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।
जमीन घोटाले में हेमंत जेल क्या गए, बन गए राजनीतिक हीरो
हेमंत सोरेन की राजनीति में एक बड़ा मोड़ उस वक्त आया, जब जमीन घोटाले से जुड़े मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा। भाजपा की ओर से लगातार हेमंत सोरेन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे थे, लेकिन जेल जाने के बाद राजनीतिक कहानी कुछ अलग ही दिशा में जाती दिखाई दी।
जिस हेमंत सोरेन को भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही थी, वही हेमंत सोरेन राज्य की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक चेहरे के तौर पर और मजबूत होकर सामने आए। उनकी गिरफ्तारी का मुद्दा राजनीतिक तौर पर उनके पक्ष में जाता दिखाई दिया और राज्य की जनता ने उन्हें अपना हीरो बना दिया।
इतना ही नहीं, हेमंत सोरेन की गैरमौजूदगी में कल्पना सोरेन भी एक बड़े चेहरे के रूप में उभरकर सामने आईं। उन्होंने राजनीतिक मैदान में सक्रिय भूमिका निभाई और झामुमो के लिए एक मजबूत चेहरा बनकर उभरीं।
अब सवाल यह है कि जब पहले की रणनीति का राजनीतिक परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आया, तो क्या नए भाजपा प्रभारी भी उसी पुराने रास्ते पर चलकर 2029 की चुनावी लड़ाई जीत पाएंगे?
2029 की तैयारी में फिर वही मुद्दे !
गजेंद्र सिंह पटेल ने अपने पहले ही संवाददाता सम्मेलन में जिन मुद्दों को उठाया, उनमें भ्रष्टाचार, घुसपैठ और कानून व्यवस्था प्रमुख रहे। उन्होंने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए और भाजपा की ओर से आंदोलन के जरिए सरकार को घेरने की बात कही।
लेकिन भाजपा के सामने असली चुनौती आरोप लगाने के बाद शुरू होती है। सवाल यह है कि इन मुद्दों को जनता के बीच किस तरह राजनीतिक समर्थन में बदला जाएगा। क्योंकि 2019 और 2024 के चुनावी अनुभव यह बता चुके हैं कि केवल सरकार पर हमला करना अपने आप में सत्ता तक पहुंचने की गारंटी नहीं है।
2014 में मिला था पांच साल की स्थिर सरकार का मौका….
झारखंड की राजनीति में वर्ष 2014 भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। पहली बार राज्य की जनता को पांच साल की स्थिर सरकार मिली थी। भाजपा ने रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाकर पूरे पांच साल सरकार चलाई।
उस समय भाजपा के पास यह बताने के लिए पांच साल का शासन था कि उसने झारखंड के लिए क्या किया। पार्टी ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियां भी जनता के सामने रखीं। लेकिन इसके बावजूद 2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड की जनता ने भाजपा को सिरे से नकार दिया और हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री का ताज सौंप दिया।
यानी भाजपा के सामने एक बार फिर वही सवाल खड़ा हुआ कि सत्ता में रहते हुए किए गए काम जनता को प्रभावित क्यों नहीं कर पाए?
2024 में भी हेमंत पर भरोसा, आदिवासी इलाकों में भाजपा कमजोर?
2019 के बाद पांच साल तक हेमंत सोरेन की सरकार रही और 2024 में एक बार फिर झारखंड की जनता ने हेमंत सोरेन में ही राज्य का भविष्य देखा। भाजपा की सीटों में भारी गिरावट आई और ग्रामीण तथा आदिवासी इलाकों में पार्टी पूरी तरह उखड़ती नजर आई।
यह आंकड़ा भाजपा के लिए सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक आधार को लेकर भी बड़ा संकेत था। खासकर आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ कमजोर होना उसके लिए बड़ी चुनौती बन गया।
अब नए प्रदेश प्रभारी के सामने यही सवाल सबसे बड़ा है कि आखिर उस राजनीतिक जमीन को कैसे वापस हासिल किया जाए, जो 2019 और 2024 के चुनाव में भाजपा के हाथ से निकलती चली गई।
मैया सम्मान योजना और नियुक्ति पत्र के सामने भाजपा के आरोप कितने असरदार?
आज भाजपा के सामने सिर्फ हेमंत सरकार पर भ्रष्टाचार, घुसपैठ और कानून व्यवस्था को लेकर हमला करने की चुनौती नहीं है। उसके सामने सरकार की उन योजनाओं और फैसलों का भी मुकाबला है, जिनके जरिए हेमंत सरकार जनता के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।
मैया सम्मान योजना हो या युवाओं को नियुक्ति पत्र देने का मुद्दा, ये ऐसे विषय हैं जिनका सीधा असर जनता के बीच राजनीतिक धारणा बनाने पर पड़ सकता है।
ऐसे में सवाल यह है कि भाजपा का आक्रामक होना इन योजनाओं और सरकार की ओर से किए जा रहे कामों पर कितना भारी पड़ेगा? क्या भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था के मुद्दे जनता को ज्यादा प्रभावित करेंगे या सरकार की योजनाएं भाजपा के हमलों पर भारी पड़ेंगी?
क्या भाजपा फिर अपने ही जाल में उलझेगी?
झारखंड भाजपा के नए प्रभारी ने आते ही यह साफ कर दिया है कि पार्टी हेमंत सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाएगी। भ्रष्टाचार, घुसपैठ, कानून व्यवस्था और युवाओं के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी है। भाजपा अपने आंदोलन के जरिए सरकार को घेरने की बात भी कह रही है।
लेकिन 2029 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करने का चुनाव नहीं होगा। पार्टी को यह भी बताना होगा कि वह सत्ता में आएगी तो झारखंड के लिए क्या अलग करेगी।
क्योंकि 2019 में भाजपा सरकार बदली, 2024 में भी जनता ने हेमंत सोरेन पर भरोसा जताया। ऐसे में 2029 के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हेमंत सरकार कितनी कमजोर है, बल्कि यह भी है कि भाजपा खुद कितनी मजबूत हुई है।
अगर भाजपा एक बार फिर सिर्फ दोषारोपण को ही अपनी चुनावी रणनीति का आधार बनाती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—क्या इस बार कहानी बदलेगी या फिर भाजपा अपने ही बनाए राजनीतिक जाल में एक बार फिर उलझकर रह जाएगी?


